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मिली साहा

Abstract Inspirational

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मिली साहा

Abstract Inspirational

दौड़ रहा इंसान

दौड़ रहा इंसान

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बड़े ही भाग्य से मिला है हमें यह मानव तन,

पर हम थोड़ा भी नहीं कर रहे इसका जतन,

कागज़ के टुकड़ों के पीछे भाग रहे हैं सभी,

व्यर्थ गंवा रहे हैं हम अपना अनमोल जीवन,


पैसे से मिलता सब, भ्रम में जी रहा है इंसान,

आज पैसे को खुशियों से तौल रहा है इंसान,

सागर सा विशाल ख्वाहिशों का समंदर लिए,

दौड़ रहा अंधी दौड़, खो रहा अपनी पहचान,


एक दूसरे से बस आगे निकलने की होड़ है,

अपनों के लिए समय नहीं, कैसी यह दौड़ है,

आज हर इंसान, समाता जा रहा है सन्नाटे में,

मतलबी हो गई दुनिया ये कैसा आया मोड़ है,


अपनों से कर रही दूर, ज्यादा पैसों की चाहत,

कह रहा इंसान पैसा ही शांति, पैसा ही राहत,

मन की शांति, स्वास्थ्य से बढ़कर नहीं है कुछ,

स्वास्थ्य नहीं, शांति नहीं तो बेकार है ये दौलत,


बच्चे पढ़ लिखकर बस रहे हैं अब विदेशों में,

माता- पिता को छोड़कर वे जी रहे हैं पैसों में,

हमने ही तो आखिर बच्चों को ये शिक्षा दी है,

पहले हम दौड़े, अब वो दौड़ रहे ख्वाहिशों में,


थक जाता तन-मन जीवन भर पैसा कमाने में,

जिंदगी बीत जाती है दुनिया को ही दिखाने में,

पैसे तो कमाएं पर जिंदगी जीने का वक्त कहां,

वक्त तो बीत गया बस ताल से ताल मिलाने में,


जब जीने का वक्त था आंखें बंद कर चल रहे थे,

सब भागे पैसे के पीछे किसके लिए कमा रहे थे,

बच्चे बैठे परदेस में हाल- चाल पूछे भी तो कौन,

पैसा ही हलचल मचाता, पैसा ही कर देता मौन,


ईश्वर की बनाई दुनिया में पैसा बन गया भगवान,

पैसों से आंकता औकात, भटक रहा है हर इंसान,

पैसा है तो इज्जत है, सम्मान है खुशियां है मान है,

इन्हीं गलतफहमियों में जी रहा आज हर इंसान है।



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