सफर
सफर
तू आज फिर बहुत याद आ रहा है अजनबी
वो पहली और आखिरी मुलाकात और तेरी वो आंखें
मुझे लग रहा है जैसे कि तू कहीं आस पास ही है
हवा की महक तेरा संदेशा बार बार दे रही हैं
तितलियां तेरा पता बात रही हैं
सूरज पहले से ज़्यादा चमकीला हैं
पेड़ सरगोशियां कर रहे हैं
शाखों के पत्ते हिल रहे हैं
मुंडेर पर बैठा कबूतर गुटरगुं कर रहा है
ख्वाहिशें मचल गई है और मै कर रही हूं
खुद को पहचानने की कोशिश कि क्या मैं वहीं हूं
जिसने सारी उम्र लगा दी तुझे जानने में
खुद को पहचानने में
काश तुझे पहले जान लिया होता
तू मुझे फिर मिला होता तो सच कहती हूं अजनबी
तो ज़िन्दगी के सफर में हम साथ होते।

