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Harsh Singh

Abstract

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Harsh Singh

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हँसते रहो, चलते रहो

हँसते रहो, चलते रहो

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रुकना नहीं थकना नहीं

बस चलते चले जाना है


एक दिन ये दुनिया छोड़कर

हम सबको चले जाना है


किसके लिए आँसू बहाये

किसके लिए हम रोयें


कोई नहीं है हमारा ना

हम हैं किसी के अपने


क्यों करें हम उनके लिए श्रम जिनको

परिश्रम की जानकारी ही नहीं


बचाकर क्या करेंगे सब धन दौलत जो

ऊपर ना मिलेगा खर्च करने का मौका सही


फिर क्यों रखते हैं हम उनसे मतलब

जो हमारे मतलब का होता ही नहीं


क्यों मानें हम उनके नियम

जिनको बनते हमने देखा ही नहीं


तो चलो बनाये एक नयी दुनिया

जहाँ बसता हो सबका जान


फिर शुभारम्भ करते हैं इस नेक

काम की खाके सब मीठा पान।


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