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Prakash Chavhan

Tragedy Fantasy

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Prakash Chavhan

Tragedy Fantasy

तन झाकलं रे

तन झाकलं रे

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*तन झाकलं रे

मन झाकलं

उघड्या रात्री थंडीत 

वस्त्रानं प्रेम दावलं*

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 *विचार चादरं कशी ही 

उशी मनाशी पावली 

गार गारव्याचे दिसं हे 

कणकणात तारुण्य भरती*

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*जगण्यातं नवीन वाटली 

सकाळची ती गोड किरण 

ऊबेची ती भूक कशी 

हवी हवीशी घावें वाटे*

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*नयनी कशी नव दिसे

थंडी थंडीचा मोसम 

उदय नवं कल्पनेच 

चार चॊघाच्या शेकोटीत*

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*जीव जीवान चिटकतं 

कसा शेक तो मनाला 

हुदडते भावना तया 

गरमागरम चहा घेत*

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*थरथरलं जीव तरी 

जीव वस्त्रात लपवतं 

मग उघडं तन कुठं 

झाकून जगण्यात मजा गं *

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*अशी ही थंडी तशी ही थंडी 

सौंदर्य कुणा कुणाचं वाढवी

भरल्या भरल्या अंगी शहारे 

विचार दव छान दिसे*

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*ऊब मिळवण्याचं संघर्ष हा 

जग जगण्यात ऊब भरते

शेकोटी कशी ही तनामनाची 

थंडी थंडीमुळं पेटते*

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