तन झाकलं रे
तन झाकलं रे
*तन झाकलं रे
मन झाकलं
उघड्या रात्री थंडीत
वस्त्रानं प्रेम दावलं*
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*विचार चादरं कशी ही
उशी मनाशी पावली
गार गारव्याचे दिसं हे
कणकणात तारुण्य भरती*
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*जगण्यातं नवीन वाटली
सकाळची ती गोड किरण
ऊबेची ती भूक कशी
हवी हवीशी घावें वाटे*
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*नयनी कशी नव दिसे
थंडी थंडीचा मोसम
उदय नवं कल्पनेच
चार चॊघाच्या शेकोटीत*
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*जीव जीवान चिटकतं
कसा शेक तो मनाला
हुदडते भावना तया
गरमागरम चहा घेत*
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*थरथरलं जीव तरी
जीव वस्त्रात लपवतं
मग उघडं तन कुठं
झाकून जगण्यात मजा गं *
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*अशी ही थंडी तशी ही थंडी
सौंदर्य कुणा कुणाचं वाढवी
भरल्या भरल्या अंगी शहारे
विचार दव छान दिसे*
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*ऊब मिळवण्याचं संघर्ष हा
जग जगण्यात ऊब भरते
शेकोटी कशी ही तनामनाची
थंडी थंडीमुळं पेटते*
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