मोरो कविता का रंग
मोरो कविता का रंग
काव्यशास्त्र व्याकरण, येकी नही मोला जान |
लिखु कल्पनाको सार, बन कविता सुजान ||धृ||
मोरो कवितामा जुळ्या, शब्द शब्दकाच मोती |
सुच्या यमक श्रृंगार, कृपा वाग्देवीकी होती ||
लेखनीला मिली धार, येकी नही मोला जान |
लिखु कल्पनाको सार, बन कविता सुजान ||१||
मोरो कविताका सुर, जसी बोली कोयलकी |
गुंज सबको कानमा, खण खण पायलकी ||
सारेगामा कसा आया, येकी नही मोला जान |
लिखु कल्पनाको सार, बन कविता सुजान ||२||
पसरसे कवितामा, गंध धरनी मायको |
देसे सुगंध मनला, घीव बखल सायको ||
कसी महक भरीसे, येकी नही मोला जान |
लिखु कल्पनाको सार, बन कविता सुजान ||३||
पशु पक्षी रव्ह सेती, सदा निसर्ग को संग |
असा साधासुधा सेती, मोरो कविताका रंग ||
कसो बनेव मी कवी, येकी नही मोला जान |
लिखु कल्पनाको सार, बन कविता सुजान ||४||
