DEEPTI KUMARI

Drama Romance Others


4.1  

DEEPTI KUMARI

Drama Romance Others


याद सहारे

याद सहारे

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रेलवे स्टेशन की भीड़ और वहां का बेहिसाब शोर विधि के अकेलेपन और खामोशी को बहुत तंग कर रहे थे । दुप्पट्टे को शॉल की तरह लपेट विधि बैग लेकर ट्रेन की ओर बढ़ी कि निगाहें एक शख्स की तरफ रुक गयी ट्रेन से उतरा ये शख्स शायद टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था और विधि को ये किसी की याद दिला रहा था।

"ये तो पीछे से बिल्कुल उसी की तरह लग रहा है वही हाइट वही चाल ….." विधि ने खुद से सवाल किया ।

तभी उस शख्स का चेहरा विधि को दिखा तो चौक गयी अनायास उसके मुँह से निकला "विधान….ये तो सच में विधान ही हैं….ये यहाँ इतने साल बाद " इन शब्दों से उसके चेहरे पर एक चमकदार मुस्कान आ गयी और कदम उस शख्स की ओर बढ़े मगर अगले पल ही मुस्कान और उसके बढ़े कदम पीछे हट गये। अतीत की कुछ जंजीरों ने उसे जकड़ लिया और पुरानी यादों ने उसे पीछे खींच लिया। विधि वही छिप गयी 

" कहीं उसने मुझे देख तो नही लिया…"

इतने देर में टैक्सी आ गयी और वो शख्स यानि विधान अपना सामान उस टैक्सी में रखने लगे उधर ट्रेन ने भी रुकसती का सिग्नल दे दिया। विधि नजर बचा कर ट्रेन पर चढ़ गयी। वो खुद तो ट्रेन में आ गयी थी मगर अपने साथ विधान की सारी यादें बिना टिकट ले आई थी। खिड़की के पास जाकर निगाहें उसे ढूंढ रही थी मगर टैक्सी शायद जा चुकी थी, विधि अपनी सीट से सर टिकाए पुरानी यादों और नम होती आँखो से जूझ रही थी।

विधान…..ये वो नाम है जिसे सुन विधि का चेहरा हमेशा लाल हो जाता था। उसकी एक झलक देखने को वो हमेशा क्लास टाईम से 15 मिनट पहले पहुँच जाती थी ताकी वो उसे मुस्कुराते हुए किताबों से खेलते हुए क्लास में घुसते हुए देख सके ओटो में हमेशा साइड में बैठती थी ताकी चाय की टपरी पर बैठा विधान उसे देख सके और वो विधान को….कोशिश करती थी कि वो विधान की बाइक से टकराने से बचे ताकी वो उसका हाल चाल पूछ ले उसके लिये फिक्रमंद हो….और आज वो दिन है कि वो उसे अनदेखा कर रही है। वो उसकी आँखो के सामने था….पूरे 5 साल बाद। हां 5 साल बीत गये थे विधि को विधान से मिले हुए। विधि ने अपने बैग से 'तन्हाई और मैं ' गजल संग्रह विधान सिंह….की किताब निकाल उसके कवर पर हाथ फेर किताब के पन्ने पर छपी विधान की तस्वीर को निहारने लगी...और खुद को उसके ख्यालों में जाने से रोकने की नाकामयाब कोशिश करने लगी।

ग्रेजुऐशन का पहला साल था जब विधि की मुलाकात विधान से हुई थी कॉलेज में हुई थी। फ्रेशर पार्टी में जब विधि को मिस फ्रेशर का खिताब और विधान को मिस्टर फ्रेशर का खिताब मिला तो सब हँसने लगे थे दोनो के नाम पर ...तब कनखियों से विधि ने विधान को देखा था लम्बा कद गहरी काली आंखे सांवला सा मगर आकर्षक व्यक्तित्व वो लड़का उसे कुछ प्यारा सा लगा। फिर बाद मे सहेलियों का उन दोनो के नाम को लेकर मज़ाक बनाने लगी ...ये मज़ाक कब विधि को अच्छा लगने लगा पता ही नहीं चला। शेरों-शायरी का शौकीन विधान हर महफिल की शान था और पढ़ाई में भी अव्वल था। शुरुआत में विधि को उससे जलन होती थी क्योंकि पढ़ाई में वो उसका प्रतिद्वंदी था वो उसे किसी भी कीमत पर आगे नहीं निकलने देना चाहती थी लेकिन उसे हराकर भी उसे खुशी नहीं मिलती थी।

पहली बार जब दोनो की बात हुई थी तब कोई नोटस को लेकर हुई थी विधान ने विधि से नोटस लिया था..वापस करते समय उसके thanks कहने पर वो पूरा दिन मुस्कुराती रही। अच्छा लगने लगा था उसे विधान...उसकी आंखे बन्द कर हँसने वाली मुस्कान उसकी शायरी और अदब से बात करना ये सब पसंद था उसे।

वो 2nd ईयर था जब दोनो की दोस्ती हुई...फ्रेशर पार्टी की जिम्मेदारी थी दोनो पर तभी एक दूसरे से थोड़ा ज्यादा बात करने लगे थे दोनो की बातें पढ़ाई के इतर भी होने लगी थी….नोटस शेयर करने के साथ साथ दोनो कुछ सुख दुख भी साझा करने लगे थे। हंसमुख विधि मस्त मौला विधान की दोस्ती कॉलेज की कैन्टीन से बाहर भी रंग दिखाने लगी थी ।

विधान की शायरियों में विधि खुद को खोजने लगी... उसे एक डर भी था कहीं विधान ये सब महसूस न कर ले और एक बेसब्री भी कि काश विधान ये सब महसूस कर ले।

होता है न अजीब ये.. प्यार

उसी से उसी को छिपाना है

जिससे कहनी हो दिल की बात 

उसे देख न जाने क्यूँ चुप हो जाना है!!

विधि का ये प्यार एक तरफा था या विधान भी कुछ महसूस कर रहा था ।


विधि अपनी फीलिंग्स को लेकर श्योर हो चुकी थी मगर विधान खुद से और विधि की भावनाओं से अंजान था। मगर हमारे जो दोस्त होते है न वो बिल्कुल जाम्वंत की तरह होते है हमारी अदृश्य भावनाओं से हमारा परिचय करवाते है।

एक दिन अतुल विधान से पूछ बैठा 

"यार कॉलेज में आये दो साल हो गये तुझे..handsome भी है इंटेलीजेंट भी है मगर सिंगल….सिंगल क्यों है?"

"तो ये जिज्ञासा है या जलन" विधान ने मजाकिया लहजे में कहा।

"चिंता है यार...तेरी एक भी गर्लफ्रेंड नहीं है...बता तो कैसी चाहिए मैं ढूंढ दूंगा।"

"अच्छा...तेरे पास बहुत स्टॉक है उन्ही में से दे दे एक….."

"जलन...सही बेटा बहुत सही जा रहे हो….वैसे मेरा स्टॉक क्यो चाहिए तेरे पास भी तो है न कोई"

"वैसे ये कोई कौन है …..मुझे भी तो पता चले"

"विधि और कौन" अतुल ने तपाक से कहा

"विधि और गर्लफ्रेंड …..तुम पगला गये हो" विधान ने हाथ को हिलाते हुए कहा।

"लो इसमे पागल जैसी क्या बात है ….इत्ती अच्छी दोस्त है वो तेरी…" अतुल कुछ और कहता उससे पहले ही विधान ने उसे टोका 

"बेटा गलती तम्हारी नहीं DDLJ की है बहुत सारी भ्रांतिया व्याप्त है लड़कों में इस मूवी की वजह से... लड़का और लड़की दोस्त नहीं हो सकते...लड़की पलटी तो प्यार है और हर लड़की भी राहुल का और पापा से जा सिमरन कहने का इंतज़ार करती है.."विधान ने मज़ाक उड़ाते हुये कहा।

"बको जो बकना है…अब सच क्या है वो तू जाने या विधि" 

"बेटा ऐसा कुछ नहीं है और वैसे भी विधि गर्लफ्रेंड नहीं शादी मटेरियल है" ये सब उसने सोचा नहीं मगर उसके मुँह से अचानक से निकल गया।

"अच्छा ...तो ये बात है" कहकर अतुल हँस पड़ा और विधान झेप गया। लेकिन इस मज़ाक में ही वो शायद अपना दिल टटोल गया था उस दिन अचानक से उसके मुँह से निकली बात पूरा दिन उसके दिमाग में घूमती रही। अपने दिल की कशमकश में कॉलेज का वो साल निकल गया।

वो लास्ट ईयर था अगले साल विधान पोस्ट ग्रेजुएशन के दिल्ली जा रहा था ये बात सबको पता थी मगर एहसास सिर्फ विधि को था। ये सोचने भर से उसका दिल बैठा जा रहा था कि उसका और विधान का साथ बस कुछ महीनों का ही था । किसी घटना को घटित होने से ज्यादा उसकी आशंका इंसान को तकलीफ़ देती ह। विधि के साथ भी यही था ...वो दिन भी आया जब विधान दिल्ली चला गया। तीन साल की दोस्ती अनकहा प्यार सबकी याद विधि के दिल मे छोड़। अक्सर कॉलेज का आई कार्ड विधान का पेन उसकी handwriting में लिखी उसकी कुछ शायरी, कम चीनी की चाय ,जगजीत सिंह की गजल और चोरी से खींची उसकी तस्वीर ये सब उसकी आंखे भिगो देती थी। जब भी विधान से बात होती तो दोनो का गला रुंध जाता था। विधि के लिये मुश्किल हो रहा था अपनी भावनाओं पर काबू पाना वो सब कह देना चाहती थी विधान से मगर समय हमारे हिसाब से नहीं चलता है उसे तो अपनी धूनी रमानी है।

एक दिन कॉलेज से वापस आते समय उसके कान में कुछ आवाज़े पड़ी।

"अरे नाक कटवा दी उसने हमारी गली की ...जरा सी आज़ादी मिली हवा में फुर्र" माँ ने पालक काटते हुए कहा।

"घर से निकाल बाहर किया रामप्रकाश ने उसे…." चाची भी सहयोग देते हुए बोली।

"घर से निकाला...हुह मैं होता तो सर काट के अलग कर देता पहले अपनी बेटी का काटता फिर उस लड़के का" पापा ने गुस्से में लाल होते हुए कहते जा रहे थे मगर विधि की आहट सुन चुप हो गये। विधि ने माजरा जानना चाहा मगर सबने टाल दिया।

शाम को खबर आग की तरह फैली तो पता चला पड़ोस में रहने वाली सुधा ने किसी लड़के से प्रेम विवाह कर लिया लड़का उसकी ही जाति का था मगर घर वाले राजी नहीं थे दोनो ने कोर्ट मैरिज कर ली। ये शादी हुये 2 महीने बीत गये थे मगर मोहल्ले में खबर अभी फैली थी। ये खबर और पापा के कहे शब्द विधि के कान में गूंज रहे थे। अभी तक विधि सिर्फ एक दुनिया में जी रही थी जो एक ख़्वाब की तरह थी लेकिन ये भी एक दुनिया थी जो हकीक़त थी।

विधि को अचानक से विधान का ख्याल आया ….वो कैसे भूल गयी वो सिर्फ विधान की विधि नहीं बल्कि इस परिवार का भी हिस्सा थी। विधान….शर्मा और विधि सक्सेना...कैसे भूल गयी वो...डर गयी वो कहीं वो अपने प्यार के चक्कर में विधान के लिये कोई मुसीबत तो नहीं खड़ी कर रही थी उसके कान में पापा के शब्द और विधान का चेहरा घूम रहा था वो धम्म से बिस्तर पर बैठ गयी। हकीक़त और ख़्वाब की खाई उसे साफ साफ नजर आ रही थी।


पूरा दिन विधि के दिमाग में वही बातें घूमती रही शाम को जब विधान का फोन आया तो उसने रिसीव नहीं किया ये शायद उसने पहली बार किया था कि विधान का फोन न उठाया हो वर्ना उसका फोन आते ही मोबाइल की स्क्रीन की तरह उसका चेहरा भी चमक जाता था। 1 बार 2 बार 3 बार फोन आया मगर विधि ने नही उठाया।

उधर विधान बहुत बेचैन था…. उसे हमेशा विधि की कमी महसूस होती बहुत याद कर रहा था उसे और इधर विधि फोन नहीं उठा रही थी।

उस दिन के बाद विधि विधान से कटने लगी उसका फोन आने पर रिसीव नहीं करती और बाद में काम था….फोन पास में नहीं था….पढ़ाई कर रही हूँ...फोन सायलेंट पर था ऐसे बहाने बनाकर हां हम्म्म कहकर फोन काट देती। विधि का उसे यूं नजर अंदाज़ करना विधान को अखर भी रहा था और बहुत ही ज्यादा बेचैन कर रहा थ । एक दिन विधान ने लगातार कॉल किया विधि ने फोन उठाया …..

"क्या बात है विधि तुम नाराज़ हो क्या मुझसे…" विधान ने बेचैनी से भरी आवाज़ में कहा।

" नहीं " विधि ने टका सा जवाब दिया।

"अच्छा ….. फिर कोई बात हुई है क्या घर पे कोई प्रॉब्लम"

"नहीं सब ठीक है"

"विधि"

"हाँ ….बताओ जल्दी मुझे थोड़ा….."

" तुम्हें थोड़ा काम है जानता हूँ" विधान ने बीच में टोक कर कहा फिर कुछ देर रुक अपनी बात को जारी रखा।

"तुम मुझे इग्नोर क्यो कर रही हो विधि क्या बात है साफ साफ बताओ मुझे ….पिछ्ले कई दिन से देख रहा हूँ तुम मुझसे बात नही कर रही हो...नाराज़ हो क्यूँ हो बताओ तो…."

"ऐसा कुछ भी नहीं है विधान…"

"विधि क्या मैं तुम्हें नहीं जानता हूँ बताओ क्या बात है क्या परेशानी है ...मैं हूँ न तुम मुझसे शेयर कर सकती हो"

"कोई परेशानी नहीं ….अब मैं रखती हूँ बाद में बात करूंगी"

"नहीं बिल्कुल नहीं रखोगी पहले बताओ मुझे…"जिद्दी बच्चे की तरह विधान ने कहा।

"विधान….क्या है यार क्यो बिना बात के पीछे पड़े हो...तुम्हारी वजह से मैं पढ़ नहीं पा रही हूँ यूँ बार बार फोन करके इरिटेट न करो ...exam है पढ़ने दो मुझे " विधि ने झल्ला कर कहा तो विधान शाँत हो गया कुछ देर की खामोशी के बाद बोला

"लास्ट कब है एग्ज़ाम"?

"17 को…"

"Ok…" इतना कहकर विधान ने फोन रख दिया । फोन कटते ही विधि की आंखे छलक आय। वो जानती थी कि वो क्या खो रही है। उस दिन के बाद विधान का फोन नहीं आया न ही कोई मैसज। हर रोज विधि बेचैनी के साथ फोन देखती मगर…।

विधि के चेहरे की खुशी कहीं खो सी गयी थी इतना आसान नहीं होता है न किसी को भूलना….कुछ बातें भुलाए नहीं भूलती। उस दिन आखिरी पेपर था विधि घर आयी थी कि फोन बज उठा देखा तो विधान का था…काफी दिन बाद स्क्रीन पर ये नाम देख वो चहक उठी बिना सोचे उसने फोन उठा लिया….और उठाते ही अपनी ग़लती का एहसास हुआ।

"कैसी हो…"?

"हम्म ठीक हूँ" उसका स्वर कुछ रुखा हो गया

"एग्ज़ाम कैसे हुए"?

"ठीक"

"चलो अच्छा हुआ अब तो फ़्री हो न...जानती हो इतने दिन तुमसे बात नहीं हुई मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा...आदत हो गयी है तुम्हारी"

विधि ने कोई जवाब नही दिया तो विधान बोलता गया ।

"24 को मैं आ रहा हूँ कानपुर...फिर हम सब मिलेगे मस्ती करेगें "

विधान की आने की खबर सुन विधि खुश हो गयी और अगले पल ही उदास विधान से मिलना उसके लिये मुश्किल था उसे डर था कही विधान उसके दर्द को भांप न ले।

"मैं कानपुर में नही होऊँगी 24 को ...भाई लखनऊ जा रहे है उन्ही के साथ जा रही हूँ….."विधि ने बहाना बनाया।

"विधि नाराज़ हो क्या मुझसे...तुम बार बार मुझे इग्नोर क्यो कर रही हो कोई प्रॉब्लम हो तो बताओ...।

"नहीं ऐसा नहीं है"

"तो फिर कैसा है जो विधि सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक की खबर मुझे देती थी मैने क्या किया क्या नहीं सब पूछती थी आज उसके पास बातें नहीं है या या मेरे पास वो विधि नहीं है"

" विधान तुम ज्यादा सोच रहे हो " विधि ने अपनी आह को निगलते हुए कहा।

"हां ज्यादा सोच रहा हूँ...पता है हर रोज घर आता हूँ तो सोचता हूँ तुमसे बात करूँगा.. लडूंगा..शिकायत करूँगा.. मगर तुम मौका ही नहीं देती ..जब से दिल्ली आया हूँ मन भर के तुमसे बात नहीं की तुमसे लड़ाई नहीं की...तुम्हारी कमी खलती है मुझे। सोचा था कानपुर आऊंगा तुमसे मिलूंगा बातें करूँगा मगर तुम तो.." विधान ने भावनाओं का प्याला उडेल दिया।

"लड़ने को बात करने को पूरी उम्र हैं न विधान" विधि ने हल्के से कहा।

"तो क्या पूरी उम्र मेरे साथ रहोगी विधि...मुझसे लड़ने को बात करने को शिकायतें करने को"विधान ने एकदम कहा तो विधि समझ नहीं आ पाई।

"आई लव यू विधि…..तुमसे दूर होने के बाद तुम्हारी अहमियत का एहसास हुआ है" इतना सुन विधि का दिल धक्क रह गया जो बात वो इतने सालों से सुनना चाहती थी आज जब वो बात विधान ने कही तो…..विधान अपने जज्बात कहता गया मगर विधि के कान मे कभी पापा के तो कभी विधान के शब्द गूंजते फोन हाथ से छूट गया और आँखो से आँसू बह निकले। घंटो रोती रही उसी तरह आज प्यार का मिलना और खोना एक साथ हुआ।

उस दिन के बाद विधान ने कई बार विधि से बात करने की कोशिश की मगर उसने तो मानो खुद को कैद सा कर लिया हो जहाँ विधान की आवाज़ नहीं पहुँच पाती। बहुत बार मन हुआ विधि का कि कह दे की वो भी उससे प्यार करती है मगर…. । ये विधि का विधान है की विधान विधि का नहीं हो सकता इतनी हिम्मत नहीं थी कि सबसे बगावत करे। महीनों बीत गये….इधर विधि की शादी की बात होने लगी और कुछ समय बाद तय भी हो गयी उधर विधान हताश था परेशान था उसकी हर कोशिश बेकार हो गयी, विधि की शादी की बात उसे पता चली तो टूट गया बुरी तरह… एक खालीपन भर गया दोनो में। सगाई के दिन सबके तोहफों के बीच काव्या ने एक तोहफ़ा विधि को लाकर दिया " तन्हाई और मैं गजल सग्रह विधान सिंह"

" उसकी पहली किताब प्रकाशित हुई है...तुम्हारे लिये भिजवाई है" काव्या ने किताब थमाते हुये कहा।

"काव्या….." 

"एक चिट्ठी भी है बाद में पढ़ लेना"

अकेलेपन के दर्द से भरी वो गजलें विधि के लिये किसी तीर की तरह थी मानो ये ताना हो उसके लिए वो गजलें कह रहीं थी इन सबकी वजह तुम हो तुम....।

"विधि नहीं जानता तुम क्यो मुझसे दूर हो गयी...एक प्यार ने दोस्ती भी खत्म कर दी क्या ? पागल शादी कब है बताया तक नहीं ..बददुआ नहीं देता यार...गुस्सा थी तो लड़ लेती मगर यूं खामोश रहकर कौन सी सजा दी तुमने...नफरत हो गयी प्यार शब्द से...मैने तो अपना सब कुछ खो दिया यार दोस्त भी हमदर्द भी। अब मेरे पास मेरी गजलों के अलावा कुछ नहीं है। सोचा था कभी मेरी पहली किताब आयेगी तब तुम मेरे साथ होगी… लेकिन आज तुम्हारे साथ न होने की वजह से पहली किताब आयी।

हो सके तो मुझे माफ़ कर देना और अपने दोस्त को हमेशा याद रखना। नये जीवन की हार्दिक शुभकामनायें पगली...हमेशा खुश रहना"

                            ' तुम्हारा विधान'

तुम्हारा लिख उसे काट दिया था विधान ने क्योकि ये हक वो खो चुका था। खत पढ़ विधि की आँखो से आँसू बह निकले और खत पर गिर गये। उसके हाथ से किताब गिर गयी और गिरने की आवाज़ से विधि का ध्यान टूटा और अतीत के पन्नों से वो वापस वर्तमान में आ गयी। हवा खिड़की से हवा हल्की बह रही थी विधि ने दुप्पट्टे को कस के शॉल की तरह लपेट लिया और खुद को समेट उस किताब को उठाने झुकी….तभी किसी शख्स ने उस किताब को उठाया और विधि के चहरे के आगे कर दिया।

"Thanks…" विधि ने किताब लेते हुए उस अजनबी के चेहरे की ओर देखा तो आंखे आश्चर्य से खुली रह गयी...वक़्त वही थम गया।

"आपकी किताब….." अजनबी ने मुस्कुराकर कहा।

"विधान……" विधि के मुँह से बस इतना निकल पाया।


विधान को सामने देख उसे ऐसा लगा जैसे उसके ख्यालों को किसी ने उसके सामने लाकर खड़ा कर दिया हो। उसे देख वो एक पल के लिये रुक सी गयी। विधान बिल्कुल उसके सामने की सीट पर आकर बैठ गया।

"पहचाना नहीं क्या…." विधान ने सामान्य तरीके से मुस्कुराकर कहा उसके हाव भाव से कहीं भी ये नहीं लग रहा था की वो विधि से इतने सालों बाद और इस तरह अचानक से मिल रहा है।

"अरे नहीं ऐसा नही पहचाना क्यो नहीं बस ऐसे अचानक तुम्हें यहाँ मिलने की उम्मीद नहीं थी" विधि ये कहते हुए अभी भी उसके चेहरे की ओर देख रही थी।

"और बताओ कैसी हो…घर पे सब कैसे हैं " विधान अभी भी मुस्कुरा रहा था

"हाँ ठीक हूँ….तुम बताओ"

"मैं तो मस्त हूँ फ़र्स्ट क्लास तुम्हारे सामने हूँ….हां थोड़ा मोटा हो गया हूँ " विधान ने बहुत ही सरल भाव से कहा।

विधि विधान को गौर से देख रही थी आज से पहले उसके मन मे एक ही डर था कि जब कभी वो विधान से मिलेगी तो उसका सामना कैसे करेगी कैसे उसकी नफरत भरी आँखो को देख पायेगी मगर यहाँ तो उसकी आँखो में न तो नफरत दिख रही थी और शायद प्यार भी नहीं न ही सालों बाद मिलने की तडप…. ।

"और अकेली आयी हो...सिद्धार्थ नहीं आया साथ में" यहाँ विधान उस लड़के की बात कर रहा था जिसके साथ विधि की सगाई हुई थी।

"नहीं …..वो….सिध्द...सिद्धार्थ... नहीं आये"

"कहाँ है वो…सोचा था मिलूंगा ...अब तुमने न तो सगाई मे बुलाया न शादी में अब ऐसे ही मिलवा दो" विधान ने हँसकर कहा। विधि बस उसे देखे जा रही थी विधान की ये बेफिक्री भरी बातें उसका बदला अंदाज़ उसे भीतर ही भीतर जला रहा था। क्यो वो उससे नाराज़ नहीं है क्यो उसकी आँखों में वो इंतज़ार नहीं है क्या सारे हक सारी उम्मीदें फीकी पड़ गयी थी इन 5 सालों में क्या सच में विधान बदल गया है या ये उसकी नफरत का ही एक रूप है।

"कहाँ है सिद्धार्थ…" विधान ने फिर सवाल किया।

" वो लखनऊ हैं कुछ काम से गये हैं अगले हफ्ते आयेंगे" विधि ने खिड़की की ओर देख कर कहा।

"और बढ़िया चल रही है शादीशुदा जिंदगी….बच्चे भी होंगे" विधान ने शरारत से कहा।

" नहीं अभी नहीं ….तुम बताओ तम्हारी शादि वादी हो गयी" विधि ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

" शादी...न...मुझे किसी की जरुरत महसूस ही नहीं होती जब होगी तब कर लूँगा..वैसे भी लड़कियों की कमी नहीं है" विधान ने कहा तो विधि उसकी ओर ऐसे देखने लगी मानो उसके सामने विधान नहीं कोई और हो। दोनो काफी देर तक बातें करते रहे। इस बीच कभी विधि को ऐसा नहीं लगा की विधान को बीती कोई भी याद उसे कचोट रही हो वो बस मस्त हो कर बात कर रहा था।

" मेरी किताब पढ़ रही हो….मतलब याद हूँ मैं मुझे लगा भूल गयी होगी 5 सालों में "

"अरे नहीं ...कैसे भूल जाऊंगी.."कहकर विधि ने अपने दुप्पट्टे को शॉल की लपेट लिया और उसे दाहिने हाथ से कस लिया। दोनो के बीच कभी एक दूसरे के काम को लेकर कभी और किसी बात को लेकर बातचीत होती रही मगर एक बार भी विधान ने प्यार का जिक्र नहीं किया न उस घटना का। बातों में समय बीत गया..विधि के मन मे खटक रहा था विधान का व्यवहार इतने मे स्टेशन आ गया गाड़ी रुक गयी।

"तम्हारी तो मंज़िल आ गयी विधि…." विधि को ओर देख 

विधान ने एक हल्की आह से कहा जो उसने अब तक छिपा रखी थी।

" हाँ ..और तुम..तुम कहाँ तक जाओगे"

" मैं वापस इलाहाबाद…अरे प्रयागराज...भूल जाता हूँ कुछ चीजे बदल गयीं हैं..." हल्का तंज था इस बात में

"क्यों...अभी तो आये हो वही से फिर…."?

" मैं अभी इसी ट्रेन से गया था लेकिन स्टेशन पर तुम्हें देखा इस ट्रेन मे चढ़ते हुए तो वापस लौट आया तुमसे मिलने….अब इतने साल बाद तुम्हारे दर्शन हुये थे मौका हाथ से कैसे जाने देता" कहकर विधान हँस दिया इस हँसी में वो हल्का सा दर्द उभर आया।

विधि उसे एकटक देखने लगी ढूंढने लगी उसमें पुराना विधान...इतने में किसी ने आवाज़ दी

"Hii मिस विधि...आप यहाँ" ये आवाज़ विधि के colleague की थी जो उसी ट्रेन में था।

"अरे गौतम सर आप यहाँ " विधि मुखातिब होकर बोली।

"तो आ गयी वापस छुट्टी से ...बिना काम के रह नहीं पाती" गौतम हँस दिया और सामान लेकर ट्रेन से उतर गया। विधि ने एक बार फिर विधान की ओर देखा और दुप्पट्टे को संभालते हुए सामान ले चलने को हुई तभी विधान ने उसे रोका।

"विधि…...ये तुम्हें कब से जानते है" विधान ने गौतम की ओर इशारा कर कहा।

"गौतम सर….2 साल से मेरे सीनियर है"

"अच्छा….तो तुमने मुझसे झूठ क्यो कहा" विधान ने शिकायती लहजे में कहा।

"झूठ कैसा झूठ…."विधि सकपका गयी।

"यही की तम्हारी शादी हो गयी…..गौतम सर ने तुम्हें मिस विधि क्यो कहा मिसेज विधि क्यो नहीं।" विधान का सवाल सुन विधि के चेहरे का रंग उतर गया।

"वो...उन्हें ….मैं चलती हूँ मुझे देर हो रही है" विधि नजर बचाकर हड़बड़ी में चलने को हुई कि विधान ने फिर रोका।

" बताओ विधि…..जवाब दो तुमने झूठ क्यो कहा"

"अभी मेरे पास इन सब बातों का टाईम नहीं है ...मुझे देर हो रही है" नज़रअंदाज़ कर विधि ने कहा तो विधान के सब्र का बाँध टूट गया।

"क्यो करती हो विधि ऐसा...क्यो हर बार मुझे एक सवाल के साथ छोड़ जाती हो जिसमें मैं उलझ के रह जाता हूँ"

"मुझे जाने दो विधान...फिर बात करेंगे"

"हां चली जाऔ...वैसे ही जैसे 5 साल पहले चली गयी थी बिना किसी को बताये...मुझे मेरे अंधेरो में सवालों मे अकेलेपन में छोड़ कर...एक बार भी ये जानने की कोशिश नहीं की कि कैसा हूँ मैं जिन्दा हूँ या नहीं ..5 साल मैने तुम्हें कहाँ कहाँ नही ढूंढा लेकिन तम्हारी कोई खबर नहीं ...प्यार नहीं था तो मना कर देती जबरन नहीं थोपता मैं मगर तुम तो...क्यो विधि क्यो...ऐसी क्या ग़लती हो गयी मुझसे जिसकी तुम मुझे सजा दे रही हो और बार बार दे रही हो...आज तुम्हें देखा तो भगा चला आया सोचा था तुमसे सबका हिसाब मांगूंगा….मगर हिम्मत नहीं हुई….." विधान की आंखे डबडबा आयी और स्वर तेज हो गय ।

"तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब देना मैं जरुरी नहीं समझती हूँ विधान….और अपनी हद में रहो कोई हक नहीं तुम्हें इस तरह सवाल पूछने का " 

"विधि हाँ नहीं है कोई हक...लेकिन क्यो नहीं है ये भी बता दो..मैं तुम्हें इस तरह नही जाने दूँगा। " विधान ने चीख कर कहा तो आसपास के सब लोग दोनो की तरफ देखने लगे।

" तमाशा मत बनाओ मेरा विधान शर्मा…" विधि ने आंखे भिगोकर कहा तो विधान कुछ नर्म पड़ गया...विधि ने सामान उठाया और जल्दी से ट्रेन से उतर गयी विधान उसे आवाज़ देता रहा….विधि के उतरते ही विधान सीट पर धम्म से बैठ गया और सर पकड़ लिया। उसका हाथ उसकी ही किताब पर पड़ा...गुस्से और खीझ मे विधान ने किताब फेंक दी लेकिन उसमे से कुछ कागज निकल कर विधान के पास गिर गया उसने उन्हे फेंकने के लिये उठाया मगर वो वही खत था जो 5 साल पहले उसने विधि को दिया था और साथ मे था एक आई कार्ड जो विधि का ही था..जिसपर लिखा था….दिव्यांग पास। 'दिव्यांग' ये शब्द विधान के दिमाग मे कौंध गये।

" विधि का पास...दिव्यांग का…." विधान हड़बड़ी में उठा और भाग कर ट्रेन के दरवाज़े तक आया विधि को देखने मगर वो कहीं नहीं दिखी...विधान की हालत पागलों जैसी हो गयी वो इधर उधर दौड़ने लगा ….प्लेटफॉर्म पर उसकी निगाहें विधि को ढूंढ रही थी...तभी सुदूर बेंच पर उसकी निगाह गयी जहाँ विधि बैठी सुबक रही थी और पानी की बोतल खोलने की कोशिश कर रही थी दाहिने हाथ से बोतल खोल रही थी और बाएं हाथ से जो हथेली से कटा था उससे बोतल पकड़े थी। ये देख विधान अन्दर तक हिल गया वो सीधा आकर विधि के पैरो के पास गिर गया।

"विधि…..तुम"

" विधान…..तुम…." दुप्प्ट्टे से अपने हाथ को छिपाकर विधि बोली। विधान बेह्ताशा किसी छोटे बच्चे की तरह फफक कर रोने लगा।

"विधि किस बात की सजा दी तुमने मुझे...क्यो सब छिपाती रही मुझसे...ये सब कैसे हुआ….कब हुआ" विधि ने मुँह फेर लिया और अपने आंसूओं को विधान से छिपाने लगी। सगाई के बाद विधि अपने परिवार के साथ लखनऊ चली गयी थी भाई ने नया घर ख़रीदा था तो सब वही रहने लगे थे विधि को भी मौका मिल गया था सब बातों से दूर जाने का वो सबसे दूर थी सोचा था शादी मे सबको बुलायेगी मगर...शादी के महज 15 दिन पहले ही विधि हादसे का शिकार हो गयी एक सड़क हादसे में वो बुरी तरह घायल हो गयी और गवां बैठी अपना बायां हाथ...उसने सिर्फ अपना हाथ नहीं अपना आत्मविश्वास अब ख़ुशियाँ सब खो दी। शादी टूट गयी उसकी और उसने अपने आप को एक कमरे में कैद कर लिया न किसी से वास्ता न किसी से कोई बातचीत शरीर का ज़ख्म भरने मे तो कुछ महीने लगे मगर मन के ज़ख्म हरे ही रहे। वो चंचल सी विधि खो गयी..आज विधान उसी विधि को तलाश रहा था।

"विधि क्या मेरा इतना भी हक नही था कि मैं तुम्हारा दुख बांट सकूँ ...सब अकेले सहती रही" विधान ने रोकर विधि से सवाल किया। विधि बिना जवाब दिये चुपचाप रही।

"अब चुप मत रहो….मैं अब ये खामोशी नहीं सह सकता...मुझे मेरी पुरानी विधि चाहिए।"

"तुम उसे ढूंढ रहे हो जो वर्षो पहले ही एक हादसे में मर गयी थी तुम्हारे सामने जो खड़ी है वो एक अपाहिज है" कराह उठी विधि।

"विधि….सारी ग़लती मेरी है मैने तुम्हें कभी समझा ही नहीं …..मुझे कल भी तम्हारी जरुरत थी और आज भी है..अब मत छोड़ जाओ मुझे..मुझे भी अपने दुख मे सुख मे शामिल कर लो हमेशा के लिये" विधान ने हाथ थाम कर कहा।

"ये सब तुम मुझ पर तरस खाकर कह रहे हो...मुझे इसी बात का डर था इसीलिए मैं कभी किसी से मिलना नहीं चाहती थी…"विधान से हाथ छुड़ा विधि ने कहा।

" तरस...तरस तुम पर नहीं खुद पर खा रहा हूँ तुम जितनी मजबूत हो उतना मैं कभी नहीं हो सकता..तुम अपना प्यार अपनी फीलिंग्स छिपाती रही सब सहती रही 5 साल सबसे दूर रही अकेले हर दर्द बर्दाश्त किया और मैं...मैं तो तुमसे दूरी और तुम्हारा इनकार सह नहीं पाया और प्रेम की कविताएं लिखने वाला मैं दर्द लिखने लगा...सबको बताने लगा कि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ ...विधि मुझे तम्हारी जरुरत है मैं नहीं रह सकता तुम्हारे बिना" विधान झुक गया विधि के पैरों में।

"विधान...भावनाओं में बहकर फैसला मत लो एक बार नजर उठाकर मुझे देखो..अब मैं वो विधि नही हूँ " विधि ने विधान का सर उठाकर कहा।

"विधि...5 साल की दूरी जब मेरा प्यार नही खत्म कर पाई तो ये...भी नहीं ..तुमने हमेशा दूसरों के बारे मे सोच अपनी भावनाओं को नजर अंदाज़ किया है...बस एक बार सिर्फ एकबार मेरे बारे और सिर्फ अपने बारे में सोचो स्वार्थी हो जाओ विधि"

"विधान….(उठाकर) ये मुमकिन नहीं "

"तुमने क्या छोड़ा यार मैं किसी का नहीं हो पाया ..आज इतने सालों बाद मिली हो और फिर मुझे छोड़ के जा रही हो विधि मुझे मेरी कविताओं को तम्हारी जरुरत है दोनो तन्हा है उस तन्हाई को अपने प्यार से भर दो मुझे फिर से..फिर से प्रेम लिखने की इजाज़त दे दो" कहकर विधान घुटनों के बल बैठकर रोने लगा। विधि की आंखे भी भर आयी मगर फिर भी वो आगे बढ़ी।

"प्यार करती हो या नहीं विधि…" विधान ने सवाल किया।

"नहीं "विधि ने कहा तो विधान आगे खड़ा हो गया।

"तो ये खत क्यो अब तक सम्हाल के रखा…."विधान ने खत दिखाया तो विधि ने निगाह नीची कर ली।

"ये लो इसके टुकड़े कर मेरे मुँह पर मार दो और कहो निकल जाओ मेरी जिंदगी से...आज तम्हारी आँख मे मैं अपने लिये नफरत देख लूँगा तो सुकून मिल जाएगा" विधान ने खत विधि के कांपते हाथों में थमाया।

"ये क्या पागलपन है.."

"मेरे लिये बस ये कर दो और सुकून दे दो मुझे तसल्ली होगी तुम्हारे दिल में मेरे लिये नफरत ही सही कोई फीलिंग तो थी इतना तो कर ही सकती हो..वादा करता हूँ आज के बाद कभी तुम्हें अपना चेहरा नही दिखाऊँगा कभी भी ये मनहूस शक्ल तुम्हें नहीं दिखाऊँगा कभी भी नहीं " विधान ने हाथ जोड़ लिये...उसकी आँखो के आँसू और उसकी रुंधी हुई आवाज़ ने विधि को तोड़ दिया...फफक पड़ीं वो।

" क्यो….विधान क्यो...मेरा इम्तिहान ले रहो हो जो मैने तुम्हारे साथ किया उसकी सजा मिल गयी मुझे अब….क्यों…"

"और जो मैने किया उसकी सजा बाकी है विधि आज मुझे अपनी नफरत दिखा साबित कर दो मैं कितना बुरा इंसान हूँ जो कभी तुम्हें समझ नहीं पाया...जाने अनजाने मैं तुम्हें दोष दे गया और उसकी वजह से ये सब हुआ तम्हारी हालत का जिम्मेदार हूँ मैं "

"विधान ….नहीं ऐसा नहीं …"विधि ने अपनी हथेली विधान के मुँह पर रख दी।

"मत जाओ विधि….इस बार गयी तो गिल्ट में मर जाऊँगा नहीं रह पाऊंगा मैं ….एक मौका दे दो बस एक" विधान ने हथेली थाम ली...उसकी आँखों में आँसू दर्द तन्हाई साफ छलक रहे थे...जो धीरे धीरे पिघला रहे थे विधि को...सालों का प्यार दोस्ती एक साथ आ खड़ी थी विधि को पिघलाने के लिये काफी थी।

"विधान…. " इतना कहकर विधि ने विधान को गले लगा लिया रो पड़े दोनो...और दोनो के आंसूओं में बह गयी सारी दूरियाँ सारी तकलीफें ….उधर गाड़ी ने होर्न दे दिया और इधर दोनो की गाड़ी चल पड़ी थी एक नये सफर पर…. । 


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