DEEPTI KUMARI

Drama


4.2  

DEEPTI KUMARI

Drama


तुम जो मिले

तुम जो मिले

18 mins 1.8K 18 mins 1.8K

मेरे हाथ में एक किताब है जिसका शीर्षक है भागे रेे मन......नीति शर्मा

नीति ये नाम सुनकर दिमाग में एक छवि उभर आती है ये नाम नहीं ये एक कहानी है ।...उस हताशा और निराशा के दौर में मुझे नीति के रूप में एक हमदर्द मिला।नीति कौन थी मैं उससे कैसे मिला ये जानने से पहले आप मेरे बारे में जान ले!

मेरा नाम अखिल है...बचपन से ही मैं थोडा कम बात करता हूँ मेरे कम बोलने को लोग अक्सर मेरा घमंड समझ लेते है ..और अब शायद हो भी गया हूं क्योंकि हम अक्सर बैसे ही बन जाते हैं जैसा दुनिया हमें देखना चाहती हैं। मेरे दोस्त बहुत  कम हैं मैं दोस्तो से हसी मजाक भी कम ही करता हूं और जब करता हूं तो मेरे दोस्त हसने के बजाय शॉक्ड हो जाते है कि मैंने कोई जोक मारा….खैर कुल मिलाकर  मैं बहुत बोरिंग हूं।मेरे इसी रूखे व्यवहार से तंग आकर आशी ने मुझसे रिश्ता तोड़ लिया।

आशी... मेरा पहला प्यार...मेरा बनावटी पन से दूर होना हमारे मिलने और बिछड़ने दोनों की वजह बना। मै उसकी केयर करता था प्यार करता था लेकिन इसका एहसास हर घंटे बताना जताना मुझे नहीं आया।इस रिश्ते ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया एक गुस्सा एक नफरत एक बेचैनी मेरे अंदर घर कर गई। मैं हर कीमत आशी से बात करना चाहता था मगर उसने...कभी न बात करने की कसम खाई थी।उसने अपने सारे नंबर बंद कर लिए... मैं हर रोज़ कोशिश करता शायद कभी उससे बात हो पाए...मगर सारी कोशिशें नाकाम।अब पहली बार प्यार भी मुश्किल होता है और पहले प्यार को भुलाना भी...एक दिन गुस्से में मैंने भी उसके सारे नंबर डिलीट कर दिए...और गुस्सा ठंडा होते ही वापस फिर से..और क्या करता।

हमेशा की तरह उस दिन भी मैंने उसका फोन लगाया मगर फोन बन्द था।लेकिन वो नंबर वॉट्सएप पर शो कर रहा था।उम्मीद की एक किरण जागी।मैंने हिम्मत जुटाकर मैसेज टाइप किया..

"कैसी हो तुम?बहुत नाराज़ हो मुझसे न ...बात नहीं करना चाहती"

अगला मैसेज...  "एक बार बात कर लो..."

"ऐसे ही मैंने उसे कई मैसेज किए।"

अब बेचैनी थी उन टिक के नीले होने की...हर दो मिनट बाद मैं मोबाइल चेक करने लगता।आखिरकार वो नीला रंग मेरे चेहरे पे मेरी लालिमा वापस लाया मगर वो भी कुछ देर का था...मैसेज रीड हुआ मगरजवाब नहीं आया।मैंने फिर मैसेज किया… ;एक बार बस एक बार बात कर लो!

उधर से फिर कोई जवाब नहीं अबकी बार मैंने अपने दिल के अंदर भरा गुबार मैसेज में उड़ेल दिया अपनी शिकायतें अपनी गलतियां अपना गुस्सा अपना प्यार बेचैनी सब जाहिर कर दी।और आखिर में लिखा..."आशी मेरा प्रेजेंटेशन है आज तुम तो जानती हो इस तरह बेचैनी में मैं अपने काम पर ध्यान नहीं लगा पा रहा हूं...तुम गुस्सा करो या माफ करो मगर बात करो"

मेरे इस मैसेज ने शायद उस पर असर कर दिया था स्क्रीन पर टाइपिंग लिख के आने लगा।उस दौरान मेरे अंदर संभावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पता नहीं क्या जवाब होगा उसका…?

जवाब आया…

"अगर तुम सच में सॉरी फील कर रहे हो तो मैंने तुम्हे माफ कर दिया"

क्या सच में…. पांच महीने की नाराज़गी को उसने इतनी जल्दी….कैसे? मैंने फिर मैसेज किया

"सच में"?

अब शायद उसने डाटा बन्द कर दिया था ...मैसेज नहीं पहुंचा..बहुत देर इंतज़ार किया मैंने। मन में कई सवाल थे...मगर एक खुशी थी उसने बात की मुझसे इस थोड़ी सी तसल्ली को मैंने अपने पास सहेज लिया।

प्रेजेंटेशन देने के बाद जब मैंने फोन देखा तो मैसेज पढ़ा जा चुका था।मैंने फिर मैसेज किया

"कैसी हो तुम"

मेरे उम्मीद के विपरीत जवाब आया 

"ठीक हूं और आप?...प्रेजेंटेशन कैसा गया?"

"आप" !….उसका मुझे आप कहना यूं मेरे बारे में पूछना क्या ये सच है!

"मैं ठीक हूं...प्रेजेंटेशन अच्छा गया…"मै कुछ और लिख नहीं पाया।

उधर से मैसेज आया "आप कौन है?"

मैं हैरान रह गया….आशी ऐसा क्यों कह रही हैं

"आशी मै अखिल….इतना नाराज हो कि पहचानना नहीं चाहती"

उसके जवाब ने मुझे विचार शून्य कर दिया

"मैं नहीं जानती आपको...माफ कीजिएगा आपने शायद गलत नंबर पे मैसेज किया है...आप एक बार चेक कर लीजिए"

उफ्फ….ये क्या हुआ..मैंने जब नंबर चेक किया को अपनी भूल मालूम हुई।मैंने एक डिजिट गलत सेव किया था।

ओह न…...ये किसे मैंने मैसेज कर दिया….अब मुझे समझ नहीं आया मै क्या करूं..हड़बड़ाहट में मैंने मोबाइल बन्द कर दिया…!

मुझे समझ नहीं आ रहा था मैं क्या करूं...आशी समझ़ उस अजनबी को मैंने पता नहीं क्या क्या कह दिया था।फिर सोचा एक माफी मांग बात को खतम करता हूं।शाम को मैंने फिर उस अजनबी को मैसेज करने के लिए WhatsApp खोला तो देखा उसने उस अजनबी के कुछ मैसेज पड़े थे।

"माफ कीजिएगा मेरा इरादा आपको बेबकूफ बनाना या आपकी परिस्थिति का मजाक बनाना नहीं था… मुझे लगा कि कोई मेरा अपना है जो मुझसे माफ़ी मांग रहा है..लेकिन जैसे ही मुझे इस ग़लतफहमी का पता चला मैं आपको सब बताने वाली थी..मगर आपने अपने प्रेजेंटेशन की बात की तो मुझे लगा अभी सही समय नहीं बताने का।बस इसीलिए मैंने…..i am sorry"

मुझे कुछ राहत हुई मैंने जवाब में लिखा 

"मुझे भी माफ कर दीजिए अनजाने में मैंने आपको परेशान किया है...और थैंक्स आपने मेरे अच्छे के लिए झूठ बोला"

"ओह मुझे लगा आप नाराज होंगे…. "उसका मैसेज था।

"नाराज कैसे होता गलती तो मेरी थी…." मैंने स्माइली के साथ जवाब भेजा।

"बस एक बात कहनी थी आपसे.. किसी को इतना भी महत्व न दे कि आप अपना वजूद ही खो बैठे" उसके इस मैसेज ने मुझे कुछ पल रुकने को मजबूर कर दिया!

"अगर आपका वजूद उस इन्सान से जुड़ा हो फिर...फिर क्या किया जाय"  मैने सवालिया लहजे में मैसज किया।

"हम किसी को प्यार करने से ज्यादा उसे प्यार करने के ख्याल से प्यार करते हैं.. हम अपनी दुनिया उस तक सीमित कर लेते हैं...और हमें ये लगता है हमारा वजूद बस इतना ही है"..उसके इस जवाब में कोई दर्द छिपा था। उसने आगे लिखा..

"प्यार एक रहस्य से भरे नॉवेल की तरह होता है जब तक रहस्य बना रहताहै हम उससे जुड़े रहते हैं जैसे ही रहस्य खत्म हमारा इंटरेस्ट उसमें कम होने लगता है…"

"लगता है आपको बहुत शिकायतें है प्यार से" मैंने सवाल किया।

"शिकायते कहें या अनुभव…और आपको?"

उसने यूं ही पूंछ लिया...मगर उस समय मैं ऐसे हालात से गुजर रहा था कि मैं चाहता था कोई मेरा हाल पूंछे मेरा दर्द साझा करें।एक समय होता है जब आप अपने अकेलेपन से ऊब जाते हो तब चाहिए होता है न कोई अपना कोई …..!

उस अजनबी से अपनी बातें साझा करना मुझे अपने दर्द को कम करने का सही तरीका लगा।मैंने उसके बारे में शुरआती जानकारी ली तो उसने सिर्फ अपना नाम बताया नीति शर्मा।मैंने भी अपना नाम बताया और थोड़ी औपचारिक बात चीत की।

वो हमारी बातचीत का पहला दिन था मगर आखिरी नहीं हम अक्सर बात करते कभी उसका गुड मॉर्निंग आता चाय के कप के साथ कभी मैं गुड नाइट भेज देता तारों के साथ...धीरे धीरे बातों का दायरा बढा मैं अब उसे अपने काम कभी अपनी परेशानियां अकेलेपन की ऊबन भी साझा कर लेता वो भी शायद कुछ मेरे जैसी ही थी..उससे बातचीत के दौरान मुझे पता चला वो एक हॉस्पिटल में काम करती है और एक अप्रकाशित लेखिका भी है वो अक्सर अपनी ग़ज़लों कविताओं और शायरियों को मुझे भेजती थी।हम दोनों ने एक दूसरे की कोई गहन जानकारी लेने की कोशिश नहीं की बस बात होती थी...शायद ये हम दोनों का अकेलापन था जो इक दूसरे से जोड़े था।इस ऑनलाइन दोस्ती को कई महीने गुजर गए। आप से तुम और तुम से तू पर कब आ गए पता ही नहीं चला।मैंने उससे एक बार मिलने की बात कही तो उसने कहा कि सही समय आने पर वो जरूर मिलेगी।

उन दिनों मै बहुत व्यस्त था और नीति से ज्यादा बात भी नहीं हो पाती थी लेकिन जब भी होती वो मुझसे कभी इसको लेकर शिकायत नहीं करती।तब एहसास हुआ कि दोस्ती का रिश्ता प्यार के रिश्ते से बहुत आगे है... उसे मेरी परेशानियों को हल करने का हुनर भी आता था।उसी बीच 8दिन उसका कोई मैसेज नहीं आया फिर उस दिन उसका मैसेज आया "मिलना है तुमसे….क्या हम कल मिल सकते है"

"सॉरी यार कल तो मैं शादी में जा रहा हूं…. वहां से फ्रीं होकर मिलता हूं…. अगर कुछ जरूरी हो तो मैं कल आ जाऊं"

"अरे नहीं इतना जरूरी भी नहीं है ...शादी के बाद मिलना…"

उसे मना करते हुए मुझे अच्छा तो नहीं लगा मगर मैं जा नहीं पाया हांलाकि इस मुलाकात का इंतज़ार मुझे कई महीनों से था।लेकिन एक सवाल भी था यूं अचानक से क्यू मिलना है उसे?

कुछ दिन तक उसका कोई मैसेज नहीं आया फिर एक दिन उसने अपने हॉस्पिटल का पता मैसेज किया लिखा समय निकालकर आ जाना।

उसका यूं अचानक मुझे बुलाना….वजह क्या होगी खैर वजह जो भी अब मुझे उससे मिलने जाना है तो खाली हाथ नहीं जाऊंगा कुछ न कुछ तो लूंगा मगर क्या लूं..यार ये लडकियों के लिए गिफ्ट लेना सबसे बड़ी समस्या है ऊपर से वो मेरी दोस्त है तो नही चाहता उसे कुछ भी ऐसा वैसा दूं।

बहुत सोचने के बाद मैने कुछ सफेद गुलाबी पीले फूल ले लिए बिलकुल उसकी तरह सतरंगी….सतरंगी तो है ही वो कभी लडती थी कभी समझदारी की बातें कभी बच्ची बन जाती एक नासमझ।वो कैसी दिखती थी मुझे नही पता मगर मेरी कल्पना में वो बहुत अच्छी थी….वो मेरे बारें मे ज्यादा कल्पना न करे इसलिये मैने उसे अपनी तस्वीर भेज दी थी...पता है मेरी वो गुलाबी शर्ट वाली पहली तस्वीर देख उसने लिखा…"पिंकी..बिल्कुल पिंकी लग रहे हो"

"अच्छा मैं पिंकी तो तुम क्या हो"

"मैं…..तो मैं ही हूं"

"तुम भी बतखिया….."

" अच्छा बतखिया क्यू?"

"वो नही बताऊंगा…..बस आज से हो तुम बतखिया हो"

हा हा हा…..तबसे मैने उसका नाम नीति से बदल बतखिया save कर दिया….उसने भी पिंकी कर दिया होगा।यूँ तो मैसज में चेहरे के भाव और बात करने का तरीका नही दिखता फिर भी उसका मैसज पढ समझ जाता था ये उसने कैसे लिखा होगा क्या भाव होंगे उसके चेहरे पर... और आंखो में कैसी शरारत।

वो एक अजनबी थी आज उससे मिलने मैं इतनी दूर जा रहा था फिर भी मेरे मन मे डर आशंका जैसा कुछ नही था...।

उससे बात करते वक़्त मै उससे अपने बारें में कोई झूठ बोल ही नही पाता था और शायद वो भी नही। जब हम किसी से छल कपट से दूर कोई रिश्ता बनाते हैं तो विश्वास अपने आप आ जाता है।मै दो किरदार जी रहा था एक वो जब मैं उससे बात करने से पहले का अखिल और एक बात करने के बाद का अखिल।पहला अखिल शान्त धीर गम्भीर और दुसरा मन्मौजी अल्हड़...बेफिक्र! एक आवरण चढ़ा रखा था मैने अपने ऊपर जिसे नीति ने मिटा दिया था….घुटन होती थी उस पहले किरदार में और उससे बात करने के बाद के किरदार में……!!

उसके बारें में सोचते हुए मैं उसके बताए पते पर पहुच गया….अब थोडी घबड़ाहट महसूस हुई,कैसे बात करूंगा उससे? पहली बार कैसे मिलूंगा? यूँ तो हम एक दुसरे को 7 महिने से जानते थे और खूब बात करते थे मगर आज आमने सामने उससे कैसे बात करूंगा। उंगलियाँ चलाने में और जुबां चलाने में फर्क होत है। मै सोचता हुआ हॉस्पिटल के रिसेप्शन पे जा पहुचा "मिस नीति शर्मा…..वो यही काम करती हैं मैं उनसे…." मैं इतना ही बोल पाया की पीछे से अवाज आयी "अखिल"

मैं बिजली की तेजी से पलटा वहां एक 26-27 साल की लड्की पीले सूट सफेद कोटमें खड़ी थी मैंने धीरे से कहा "नीति"

"आप आखिल हो न " उसने मेरी तरफ उंगली कर पूँछा।

"जी...जी हाँ मैं...अखिल हूं तुम...आप निति…" मैं हडबडी मैं कुछ बोल नही पाया।

"मै डाक्टर आस्था….नीति की दोस्त...आप नीति से मिलने आये है न"

"जी हाँ लेकिन नीति कहां है….."

"नीति यही है आप बस 5 मिनट रुकिये" इतना कहकर वो मुझे गेस्ट रूम में ले गयी और बैठने को बोला ।

"आप चाय नाश्ता किजिये मैं नीति को बताकर आती हूं"

वो मुझे वही बिठा चली गयी मैं सोचने लगा नीति ने मेरे बारे मे किस किस को बताया होगा….।चाय समौसे के बाद

Dr आस्था फिर आयी और साथ चलने को कहा।नीति से मिलूंगा….ये सोच मै खुश था और नर्वस भी।Dr आस्था मुझे रुम 17 में गयी।कमरे में प्रवेश से पहले मैं खुशी घबड़ाहट बेचैनी उत्साह न जाने कितने मिले जले भावो से भरा था।लेकिन कमरे में घुसते ही एक भाव रह गया ...भाव शून्य

"नीति कहाँ है….." ये कहते हुए मैं काँप गया शायद जवाब मुझे पता था.

Dr आस्था ने इशारा किया और मन्द आवाज में कहा "नीति… .यही है"

मैने जिस चंचल आँखो और शरारती चेहरे वाली नीति की कल्पना की थी वो....बन्द आंखों और शान्त और निस्तेज़ चेहरे वाली बिस्तर पर लेटी ज़िंदगी और मौत से जूझ रही लड़की के रुप में साकार हुई… .!

"नीति… ...क्या हुआ इसे… ."मैं बमुश्किल इतना ही कह पाया…..

समय मेरे लिये उतना ही मध्यम हो गया जितना उस ग्लुकोज की बोतल से टपक रही बूंदे.....

मैं अवाक रह गया..मै क्या सोच यहां आया था उससे बातें करूंगा शिकायते करूंगा मगर यहाँ तो..क्या हुआ है इसे?

"नीति को क्या हुआ है...कल तक तो सब ठीक था" मैने डाक्टर से शिकयती कुछ हैरानी के भाव से कहा।

"नीति पिछ्ले एक साल से यूं बिस्तर पे ही है अखिल" डाक्टर का यह जवाब मुझे सन्न कर गया।

"पिछ्ले एक साल से…?? मैं इसे 7 महिने से जानता हूं तब तो ऐसा कुछ नही था" मेरे अंदर की हैरानी बढती गयी।

"मैं जानती हूं आपके दिमाग में बहुत सवाल उठ रहे है...मैं आपके सभी सवालो का जवाब दूंगी आइये मेरे साथ"

मैं समझ नही पा रहा था कि यह सब हो क्या रहा है डाक्टर आस्था मुझे कमरे से बाहर लेकर आयी और सब बताना शुरु किया।

"मैं पिछ्ले 3 साल से नीति को जानती हूं वो यही नर्स थी...अपने चंचल हसमुख स्वभाव से वो सबको अपना बन लेती थी।सब ठीक था उसकी ज़िन्दगी में....पिछ्ले साल उसकी सगाई तय हुई अधिराज के साथ।अच्छा लड़का था अक्सर मिलने आता था जब भी वो आता पुरे हॉस्पिटल को खबर हो जाती...नीति चहकती ही इतना थी मगर वो शर्मिला सा बस मुस्कुरा देता।हम सबको खुशी थी कि नीति को एक अच्छा जीवनसाथी मिल रहा है।मगर इन खुशियों को किसी की नज़र लग गयी सगाई की शॉपिंग के लिए जा रही थी वो...हादसा हो गया।एक कार ने नीति के साथ साथ उसकी खुशियों को भी कुचल दिया।सब तहस नहस हो गया।उस हादसे में नीति का बचना मुश्किल लग रहा था हम सबने उम्मीद छोड़ दी मगर ये शायद उसी की जिजीविषा थी कि वो बच गयी।नीति को तो हम सबने बचा लिया मगर उसके दोनो पैरो की हड्डियां टूट गयी...वो दोबारा नही चल सकती थी दो महिने तक वो कोमा में रही।तब आया था अधिराज उससे मिलने….रोया भी बहुत अपने आंसू एक बार में ही खर्च कर दोबारा उसका दुख साझा करने नही आया...कभी नही।होश में आते ही उसकी आंखे अधिराज को तलाश रही थी मगर वो….वो तो सारा प्यार आसुओं मे बहाकर चल गया था।अपने पैरो को अपने प्यार को खोकर नीति पत्थर हो गयी...उसमें कोई हलचल नही रही निगाह दरवाजे पे रहती शायद वो आ जाये।

एक बार पुछा उसने अधिराज के बारेमें मगर मेरा जवाब न पाकर कहने लगी...क्या रिश्ते इतनी आसानी से टूट जाते हैं..मैं उसे कुछ नही कहती अगर वो मुझसे मना कर देता शादी को.. अरे मै खुद उससे प्यार करती थी मै क्यू उसकी जिन्दगी खराब करती...मगर उसे दोस्त मानती थी वो दोस्ती की खातिर ही सही आ जाता एक बार…" बहुत रोई उस दिन वो...मगर आखिरी बार फिर दोबारा उसने कभी अधिराज का नाम नही लिया।

उसका अकेलापन उसका दर्द हम सबसे सहन नही होता था..भाई भाभी के लिए वो एक ज़िम्मेदारी भर रह गई।घर पे अच्छे से देखभाल नही हो पायेगी कहकर यही रखा उसे हॉस्पिटल का बिल भरकर अपना रिश्ता निभा रहे थे। माँ पापा आते तो उसे देख कर बहुत रोते...।नीति के न शरीर के जख्म भर रहे थे न दिल के।वो चाहती थी कोई उसके पास बैठ उसका दर्द साझा करे न कि उसकी लाचारी का उसे एहसास कराए।उसके पिछ्ले जन्मदिन मैने उसे मोबाइल दिया था बस उसी में कुछ न कुछ लिखती रहती।उसे डायरी लिखने का शौक था..अब कलम पकड़ना मुश्किल था तो ये डिजिटल दुनिया में खुद को तराशने लगी।

एक दिन बताया तुम्हारे बारें में...पहले लगा की शायद तुम अधिराज हो फिर भूल मालूम होते ही उदास हो गई।लेकिन तुम्हारा दर्द उसे अपना सा लगा...उसकी तन्हाई भी बात करना चाहती थी।बस फिर तुमसे बात करने का सफर शुरु हुआ।बताती थी तुम्हारे बारे में….।

उस दौरान मैने मेहसूस किया कि वो अपना दर्द भूल रही है जब भी तुमसे बात करती या तुम्हारे बारेमें तो आखों मे चमक वो ही आ जाती जो पहले रहती थी…।तुम्हारा दर्द दूर करते करते उसकी तन्हाई भी दूर हो गई।

Dr आस्था नीति के बारे में बताती जा रही थी और मैं हैरान परेशान उनकी बातें सुन रहा था। उन्होंने आगे बताया 

"मैंने कहा था उससे कि तुम्हें सब बता दे...मगर उसने कहा अगर तुम्हें सब पता चला तो तुम भी उस पर तरस खाओगे...सहानुभूति दिखाओगे...और नहीं बताएगी तो दोस्ती निभाओगे।वो किसी भी कीमत पर यह दोस्ती खोना नहीं चाहती थी।उसकी ज़िंदगी फिर पटरी पर लौट रही थी…मगर पिछले हफ्ते ही उसका शरीर लकवाग्रस्त हो गया….दाहिने भाग ने काम करना बन्द कर दिया।उसका शरीर इतना कमजोर हो गया.. कि वो ठीक से बात भी नहीं कर पा रही हमने बहुत कोशिश की मगर सब नाकाम…..कुछ भी असर नहीं कर रहा है अब..कल से…." इतना कहकर डाक्टर आस्था का गला रूंध गया।

"कल से क्या…."

"हमने कोशिश तो बहुत की मगर कल से उसके शरीर के अंगो ने एक एक करके काम करना बन्द कर दिया है…." कहकर डाक्टरआस्था की आंखे छलक आईं। मैं खुद को रोक नहीं पाया मैंने दोनों हाथों से चेहरे को छिपा लिया और उन आंसूओं को रोकने की नाकाम कोशिश की जो न जाने कब से आखो के मुहाने बैठ ये सब सुन रहे थे।

"मै चाहती थी एक बार नीति तुमसे मिल ले और तुम उससे...इसलिए मैंने तुम्हे मैसेज कर दिया….अखिल.. ये कहकर थोड़ा रुकी शायद कुछ ऐसा बताने को थी जिसके लिए हिम्मत जुटा सके….अखिल…...नीति के पास बहुत कम समय है उसे कभी भी कुछ भी हो सकता.... " उनकी यह बात सुन मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई...मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ हुआ क्या है..।

"मैं चाहती हूं वो एक तुमसे मिले बात करे...अखिल अभी वो सो रही है उठते ही तुम उसके सामने जाओगे उससे मिलोगे...लेकिन नॉर्मल बिहेव करना उसे लगना नहीं चाहिए कि उसे कुछ हुआ है...ये करना मुश्किल है मगर तुम्हें करना होगा।" कुछ देर के लिए वहां खामोशी पसर गई इतने में नर्स ने नीति के जागने की खबर दी।

"मैं जा रही हूं कुछ देर बाद तुम भी आ जाना...अखिल"

आस्था इतना कह मेरे कंधे को थपथपा कमरे से बाहर चली गई। मैं अकेला वहां डबडबाई आंखों से बीते कल और आने वाले पल के बारे में सोच रहा था।कुछ देर बाद मुझे उससे मिलना है...मगर कैसे...मेरा दिल जोर जोर से रोने को कर रहा था मगर वक़्त इस बात की इजाजत नहीं दे रहा था।कुछ देर बाद मै नीति के कमरे में पहुंचा मुझे देख वो चौंक गई...हैरानी में बस वो मेरा नाम ही ले पाई...। मैं उसके पास जाकर बैठ गया।

"कैसी हो निति…..अपने पिंकी को कुछ बताया भी नहीं" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा।इतना सुन वो फफक कर रोने लगी मैंने अपनी आंखो को कसकर बंद किया ताकि मैं अपने आपको सम्हाल सकूं अपनी बतखिया के लिए।

"पगलिया….रो क्यों रही है इतना बुरा लग रहा हूं मै...नालायक दोस्त से मिलने पर रोते है कहीं"

"सॉरी अखिल …सॉरी."उसने इतना कहा और फिर रोने लगी।

"ऐ बतखिया क्या अखिल अखिल लगा रखा है..पिंकी हूं मैं और तुम बतखिया...कुछ नहीं होगा...सब ठीक होगा"

"तुमको तो बहाने बनाना भी नहीं आता पिंकी और एक्टिंग तो बिल्कुल नहीं आती….कबसे ओवरएक्टिंग किए जा रहे हो….सब जानती हूं मैं और समझती भी...अब कुछ नहीं हो सकता…" उसने मेरे चेहरे के भाव पढ़ कहा।

"चुप नालायक...उल्टी बातें क्यों करती है.. मैं इतनी दूर से आया हूं और तुम..पागल कहीं की"

"अच्छा इतनी दूर से आए और खाली हाथ...सच में बिल्लू रहोगे" उसकी बात सुन मुझे अपने उन सतरंगी फूलों का ध्यान आया मैंने वो फूलों को देते हुए कहा "रिटर्न गिफ्ट…?"

" मेरे बचे हुए दिन तुम्हारे" कहकर वो तो मुस्कुरा दी मगर मुझे उस सच का एहसास करवा दिया जिसे मै नज़रंदाज़ कर रहा था। मैं कुछ बोल नहीं पाया।इतनी देर में उसके घर से मां पापा आए मैं बाहर निकलने को हुआ तो उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ मुझे रोक लिया और वहीं बैठने का इशारा किया।वो लोग अजनबी एक तरह मुझे देख रहे थे तब नीति ने मेरी ओर देख कहा...पापा मेरा दोस्त है।वो लोग हैरान थे मगर कुछ कहा नहीं।

सब आते उससे मिलते और रह रहकर उसे याद दिलाते कि उसके पास कितना कम समय है वो कुछ घंटे बीते..अब उसके आराम का समय था सब बाहर निकलने लगे तब उसने मेरा हाथ पकड़ कहा "मै मरने से पहले मरना नहीं चाहती...आज मौत के करीब आ ज़िन्दगी की अहमियत पता चली...आज अफसोस होता है क्यों किसी के लिए रोकर अपनी ज़िंदगी के अहम लम्हे खर्च कर दिए...तुम मत रोना पिंकी…कुछ वक़्त है जीना चाहती हूं" कहकर मेरी ओर उम्मीद से देखा।

बाहर आकर मैं खुद को सम्हाल नहीं पाया आज सच में मुझे जिंदगी की अहमियत पता चली...मै उसे रोकना चाहता था मगर क्या करता जैसे रोकता उसे ….बीतता हर लम्हा मुझे उससे दूर कर रहा था मैं खूब रोया...।

शाम को फिर हमारी बात हुई मैं उसकी बात का मान रख नहीं रोया...हमने खूब बातें की बिल्कुल वैसे ही बात की जैसे हम मैसेज में करते थे उन चंद घंटों में मै खुद को भूल गया मै कौन था कहां से आया सब...बस मुझे मेरी बतखिया याद थी।उसने मुझे एक डायरी देकर कहा "ये तुम्हारा रिटर्न गिफ्ट….अपने पास रखना।"

"तुम….."मै कुछ बोल नहीं पाया।

"कद्दू...मै जा रही हूं...अब कभी नहीं मिलूंगी...मुझे तुम्हारी बहुत याद आएगी" बस फिर न मै खुद को रोक पाया न वो….फफक फफक कर रोये उसने मेरा हाथ कस के पकड़ लिया।काश मै कुछ कर पाता।

"तुमको कुछ नहीं होगा नालायक…"कहकर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

"मेरे सारे सपने अधूरे रह गए सोचा था तुमसे मिलेगी जब बिल्कुल ठीक हो जाऊंगी …..सोचा था अपनी पहली किताब के लॉन्च पर तुम्हे चीफ गेस्ट के तौर पे बुलाऊंगी….सब यही रह गया कुछ नहीं कर पाई।"

"तुम पागल हो …"

"सुन….मुझे चॉकलेट खानी है तुम अभी लेकर आओगे"

"हा क्यों नहीं...तेरे लिए कुछ भी"

मै चल दिया फिर उसने दोबारा आवाज दी 

"अखिल"

मैं रुक गया उसने मेरी ओर देखा फिर कहा

"कुछ नहीं तुम जाओ"

मै उसके लिए चॉकलेट लेने हॉस्पिटल से बाहर निकला रात काफी हो चुकी थी तो आसपास की दुकानें बन्द थी वापसी में मुझे 15 मिनट का समय लगा उन कुछ पलो की देरी ने सब छीन लिया।हॉस्पिटल में घुसते ही मुझे उस बात का एहसास हुआ कमरा लोगो की चीखों से भरा था मै सच समझ अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर पाया वही गिर गया अपने सिर को पकड़ कर बैठ रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाया जिसके लिए यहां आया वो वजह जा चुकी थी वो बतखिया…..अपनी पिंकी को छोड़ हमेशा हमेशा के लिए।

उफ्फ आज भी वो दिन मेरे लिए भुलाए नहीं भूलता….सब खो दिया।

मेरे पास उसका दिया आखिरी तोहफा था उसकी डायरी जिसमें उसके सपने उसकी कविताएं शेर ओ शायरी सब लिखी थी।वो अपना सपना मुझे सौंप गई थी….आज उसकी पहली किताब उसके गीतों शेरो शायरी का संकलन ..भागे रे मन.... प्रकाशित हुआ है….काश वो यहां होती तो देखती उसका कद्दू उसका सपना पूरा कर रहा है।

आज भी मोबाइल में अननोन नम्बर आता है तो लगता है उसी का होगा….उसकी कमी खलती है क्यों चली वो इस तरह..क्यों।

मुझे आखिरी शब्द याद है….किसी के लिए रोकर मै अपनी ज़िंदगी नहीं बरबाद करूंगा। मेरे लिए यही रिटर्न गिफ्ट होगा उसे...मेरी बतखिया को।वो आज भी है…. पता है मै उसे महसूस करता हूं अपनी बातों में अपनी आदतों में….वो मुझमें खुद को छोड़ गई है।। 

(कुछ लोग जाकर भी दुनिया से नहीं जाते और कुछ होकर भी दुनिया में नहीं होते…..ज़िंदगी बहुत हसीन है।जब तक हो इसे महसूस करो जियो इसे वरना मरते वक्त खुद को कोसने के अलावा कुछ नहीं रहेगा….खुशियों की वजह खतम नही होती बस बदल जाती हैं।



Rate this content
Log in

More hindi story from DEEPTI KUMARI

Similar hindi story from Drama