Savita Negi

Tragedy


4.5  

Savita Negi

Tragedy


वृंदा

वृंदा

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"सुप्रिया !!वृन्दा की बेटी बहुत सीरियस है। हॉस्पिटल ले गए उसे ,चले क्या ?"ममता का फ़ोन आया तो हम सब भी देखने के लिए दौड़ पड़े। वृन्दा के आँसू थम नहीं रहे थे। हमें देखते ही बोलने लगी।


"हार गई मैं ईश्वर से !!उसकी देखभाल में शायद कोई कमी रह गयी तभी देेेखो अभी डॉक्टर बोल के गए कि मुश्किल है कुछ सासें ही बची हैं।"


" तुझे पता भी है तूने उसे दो जन्मों का माँ का प्यार दिया है। उसके जन्म के समय ही डॉ ने तुझे बोल दिया था कि कुछ साल ही जीवित रह सकेगी लेकिन देख तेरी मेहनत और और एक माँ के प्रेम ने उसे चौदह साल का कर दिया। कुछ निर्णय ईश्वर के होते हैं उसके सामने हम कुछ नहीं हैं।"


वृन्दा एक सशक्त नारी दो जुड़वा बेटियों की माँ।जुड़वा बेटियों में रक्षा तो स्वस्थ थी परंतु मधु स्वस्थ नहीं थी । मल द्वार न होने की वजह से जन्म के साथ ही उसका एक आपरेशन हुआ। और मल त्याग के लिए पेट के ऊपरी भाग में एक थैली लगा दी। डॉक्टर ने ये भी बताया कि अभी बहुत आपरेशन करने होंगे उसके बाद भी जीवित रहने की गारंटी नहीं है।


 ईश्वर ने नारी को बहुत सहनशील बनाकर धरती पर भेजा है। ताकि वो आगे चलकर हर प्रकार के दर्द और तकलीफ के सामने शिला बनकर डटी रहे।

अपनी नन्ही सी जान को ऑपेरशन के बाद ऑक्सीजन लेते हुए देख सारी ममता उसी पर चली गयी।उसी क्षण उसने जैसे ठान ली की ईश्वर ने जन्म दिया है तो वो बचाकर ही रहेगी। वृन्दा ने अपना सारा ध्यान मधु की देखभाल में लगा दिया। हर हफ्ते हॉस्पिटल जाना ,पाँच साल की उम्र तक आठ ऑपेरशन हो चुके थे उसके।


अब वृन्दा की जिंदगी मधु के इर्द गिर्द ही रहती। दोनों बच्चो के हिस्से का प्यार भी उसी को मिलता। सास और रिश्तेदार कई बार उसे टोक देते थे कि इसके चक्कर में तुझे कुछ और दिखाई ही नहीं देता। पैसा ,समय ,मेहनत सब लुटा दी तूने इसके ऊपर।ऊपर से बचेगी भी की नही। वृन्दा मधु के लिए किसी से भी कुछ गलत नहीं सुन सकती थी।


"आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। मैं करती हूँ न सब। फिर क्या दिक्कत है किसी को भी ? मैं काफ़ी हूँ उसको देखने के लिए कोई और देखे न देखे। "


रात भर जागना, उसके पेट मे लगी थैली को साफ करना सब। मुझे याद है मोहल्ले की एक शादी में हम उसको जबरदस्ती ले गए। एक पूरे बैग के साथ वो चली। जिसमे मधु का सामना था। मैंने देखा पूरी शादी में वो एक ही जगह बैठी रही। उसके पति ने उसको वही खाने की प्लेट ला दी। बगल की चेयर में प्लेट रखकर एक हाथ से खाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। तभी मैंने थोड़ी देर के लिए बिटिया को पकड़ा और उसने जल्दी से बड़े बड़े निवाले मुँह में उड़ेल दिए। फिर जल्दी ही घर चली गयी। अपनी बेटी के लिए उसने सब कुछ त्याग दिया था। अपने शौक ,सजना सँवारना ,किट्टी पार्टी ,कीर्तन शादी ब्याह में जाना । यहाँ तक की अपनी जॉब भी । दिनभर एक गाउन डाल कर रखती । बालों को सुलझाने का समय भी न होता उसके पास। अपने लिए उसने इन सालो में शायद ही कुछ खरीदा हो ।बचत करी ताकि बिटिया के इलाज में लगा सके।

वो अक्सर बोलती थी कि कोई देखे न देखे उसे ,किसी को उस पर दया आए न आये , मैंने उसे नौ महीने गर्भ में रखा है ,मेरी ममता उसके लिए कम नहीं हो सकती । उसको सबसे ज्यादा मेरी जरूरत है। चाहे मुझे अपनी पूरी जिंदगी उस पर कुर्बान करनी पड़े।


उसका प्रयास ही था कि मधु पाँच साल के बाद थोड़ा ठीक होने लगी। कमज़ोर तो थी लेकिन धीरे -धीरे चलने लगी। बच्चों को स्कूल जाते देखती तो उसको भी मन करता । इसलिए वृन्दा ने तय किया कि वो मधु को भी स्कूल भेजेगी ।बच्चों के साथ उसका मन खुश होगा। घर मे सभी ने विरोध किया कि वो कैसे जाएगी? कौन एडमिशन देगा? उसके साथ एक इंसान हर वक्त चाहिए।


" चाहे उसकी जितनी भी जिंदगी हो मैं उसके सारे सपने पूरे करना चाहती हूँ। मैं देख लूंगी सब लेकिन वो जाएगी स्कूल।"


वृन्दा जहाँ पढ़ाती थी उसी स्कूल में उसने बात की तो उसे नर्सरी के बच्चों के साथ बैठने की इजाजत मिल गयी। बहुत खुशी के साथ वृन्दा उसे तैयार करती थी। अभी मधु पूरी तरह ठीक नही हुई थी। उसे कभी भी थोड़ा सा लूज़ मोशन हो जाता था इसलिए वृन्दा उसे डाइपर पहना कर भेजती। और एक घण्टे बाद खुद स्कूल लेने चली जाती।


सब वृन्दा को पागल बोलते कि कितना समय बर्बाद करती है बीमार बेटी के लिए । घर मे ही रखती उसे। लेकिन वृन्दा अडिग रही। समय बीता मधु तेरह साल की हो गयी। प्रकृति के नियमानुसार मधु को भी पीरियड शुरू हो गए। उससे संभाले नहीं जाते थे। उस वक़्त भी वृन्दा सब कुछ खुद ही देखती थी। डॉ ने भी कहा एक बार की मधु खुशकिस्मत है जो ऐसी माँ के पेट से जन्म लिया ।


परंतु पिछले एक साल से मधु की तबियत ज़्यादा खराब रहने लगी थी । उसके बाकी के अंदरूनी अंगो पर भी असर पड़ने लगा था। और उस दिन वृन्दा की मधु माँ का असीम प्यार भोगकर हमेशा के लिए विदा हो गयी।

वृन्दा ने सच मे कर दिखाया कि माँ अपने बच्चों के लिए चाहे तो क्या नहीं कर सकती।अपने दुख को भुलाकर अब दूसरे बच्चो को उनके हिस्से का प्यार देने के लिए तैयार खड़ी थी।



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