Kumar Vikrant

Fantasy Thriller


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वो कौन थी? भाग : ४

वो कौन थी? भाग : ४

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जब मैं लाशों के बीच से उठा तो मिथ्या उठ बैठी थी और अपने दोनों हाथो से खुद को छिपाने की कोशिश कर रही थी । मैंने अपनी शर्ट उतार कर उसकी तरफ फेंकी और मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया ।

कुछ पलों बाद मिथ्या लड़खड़ाते हुए मेरे पास आयी और अगले ही पल नीचे गिर पड़ी । मैंने उसे सहारा देकर उठाया और टूटी-फूटी कार की तरफ चल पड़ा । कार का हाल ख़राब था लेकिन सीधी खड़ी थी, सबसे पहले मैंने राहुल के मृत शरीर को बाहर निकाला और फिर ड्राइविंग सीट पर बैठ कर कार स्टार्ट करने की कोशिश की, कार थोड़ी देर में स्टार्ट हो गयी, तब तक मिथ्या भी आ गयी थी । उसके हाथ में उसका टूटा-फूटा लैपटॉप, सैटेलाइट फोन, मोबाइल फोन और लोडेड रिवाल्वर थे । रिवाल्वर के अलावा सब टूटे हुए थे जिन्हें उसने कार की पिछली सीट पर फेंक दिया । लोडेड रिवाल्वर उसकी गोद में रख उसने अपना सर सीट की पुश्त पर लगा लिया और सुबक कर रोने लगी ।

मुख्य सड़क तक पहुचने में आधा घंटा लगा । पूरे समय मुझे ऐसा लगता रहा की किसी की निगाह हम पर है, किसकी? शायद उस घुड़सवार की? पता नहीं ।

मुख्य मार्ग पर आकर थोड़ी राहत महसूस हुयी, आखिरकार हम मौत के मुंह से निकल आये थे । मैंने मिथ्या की तरफ देखा, वो रोते-रोते सो गयी थी । मैं चांदनी रात में ड्राइव करता रहा, कहा जाना था कुछ पता नहीं । एक घंटे बाद एक नखलिस्तान आया जिसके एक छोर पर एक २४ घंटे खुलने वाला ढाबा और डिपार्टमेंटल स्टोर था । मैंने मिथ्या को कार में सोता छोड़ कर ढाबे से दो लोगो का डिनर लगाने को कहा और डिपार्टमेंटल स्टोर से जाकर दो टी शर्ट और लेडी स्वेट शर्ट खरीदी । डिनर अभी तैयार हो रहा था तो मैं पानी की दो बोतल लेकर वापिस कार में आया । मिथ्या उठ चुकी थी और कही शून्य में घूर रही थी ।

"पानी………" मैंने उसे पानी की बोतल देते हुए कहा ।

उसने गर्दन हिला कर पानी लेने से मना कर दिया ।

"वो स्वेट शर्ट दो………" उसने डिपार्टमेंटल स्टोर वाली टी शर्ट की और इशारा करते हुए कहा ।

मैंने पैकेट से निकाल कर स्वेट शर्ट उसे दे दी, वो स्वेट शर्ट लेकर उस ढाबे के कोने में बने लेडीज वाश रूम में चली गई ।

मैंने भी कार नीचे उतर कर उसने उस पानी से अपने चेहरे को धोया और हाथ पैरो की मिटटी साफ़ की और बाकी पानी को अपने सर पर उड़ेल कर बालो को को साफ करने की कोशिश की लेकिन घाटी की धूल किसी भी तरह से मेरे बालो से नहीं निकल सकी ।

थोड़ी देर बाद जब वो वापस आई तो वो अपने हाथो, चेहरे पर लगी मिटटी दो चुकी थी लेकिन उसके चेहरे पर छाई उदासी को मै चांदनी रात में भी देख सकता था । मैंने देखा ढाबे का वेटर एक मेज पर खाना लगा रहा था तो मैंने उससे पूछा, "खाना…….?"

"नहीं, तू खा ले ।"

उस भयानक हादसे एक-एक पल जब मेरे दिलो दिमाग पर अंकित था, मैं बहुत विचलित था इसलिए मै मिथ्या की हालत को समझ सकता था; खाने की इच्छा तो मेरी भी नहीं थी लेकिन फिर भी सोच रहा था कि थोड़ा खा लेने से मिथ्या को कुछ अच्छा लगेगा ।

मैं यही सब सोचते हुए बोला, "कुछ हल्का ले लो, अच्छा फील होगा ।"

मैं जानता था कि वो मेरे लिए एक बहुत ही अबूझ पहेली के समान थी और मेरी किसी भी बात को वो आसानी से मैंने वाली थी । मेरी बात को सुनते ही उसके चेहरे पर गुस्से के भाव आये और चले भी गए । कुछ सोचकर बोली, "चल चाय बनवा, चाय पी लुंगी।

इसके बाद हम दोनों खाने वाली मेज की कुर्सियों पर जा बैठे मैंने वेटर को दो चाय और चार टोस्ट लाने को कहा । कुछ देर वो ढाबे में इधर-उधर देखती रही फिर उसने गौर से मेरी तरफ देखा और उसके चेहरे से लगा कुछ उलझन में है ।

"एक बात बता; तू मेरे लिए उन लुटेरो से लड़ा, तुझे अपने मरने का डर नहीं था?" वो थोड़ा मधुर स्वर में बोली ।

"नहीं……."

"क्यों……...?"

"पता नहीं……."

"तू बहादुर ही नहीं अच्छा इंसान भी है; हम किसी और हालात में मिले होते तो कुछ कहानी हमारी भी बन सकती थी…… क्यों विजय?"

"इश्क़?"

"शायद……"

"इश्क़ और तुम से……...बाप रे बाप!"

"ज्यादा मत उड़ो आशिक़ महोदय; अभी तुमने मुझे उदित तक पंहुचाना है ।"

तभी वेटर चाय टोस्ट लेकर आ गया और बात का सिलसिला यही खत्म हो गया । हम दोनों ख़ामोशी से चाय पीने लगे । इस समय मुझे उस घुड़सवार की याद आ रही थी, उसने पहले आकर रास्ता बताया और उसके बाद उन लुटेरों को मार कर हमारी जिंदगियां बचाई थी।

"वो घुड़ सवार न जाने कौन था?" मैंने खुद से सवाल किया ।

"कहते है वो इस घाटी का रखवाला है।" मेरी बात को सुनकर मिथ्या बोली ।

"क्या मतलब?"

"तू नहीं समझेगा ।"

"……समझाओगी तो समझ जाऊंगा ।"

"वो लुटेरा उसे जैक के नाम से बुला रहा था। जहाँ तक मैं जानती हूँ जैक इस घाटी के लुटेरो का काल है । उसने अकेले अपने दम पर इस घाटी से कई बार लुटेरो का सफाया किया है । लोग उसे अपना रक्षक और पुलिस उसे क़ानून तोड़ने वाले के तौर पर जानती है ।"

"ऐसा तो बस फिल्मों में या किताबों में होता है, असल में ऐसा......लेकिन वो जो भी था उसने हमे उन लूटेरो से बचा लिया।" मै चिंतित स्वर में बोला ।

"हाँ, उसने हमे बहुत बड़ी मुसीबत से निकाला……. और चला गया ।" मिथ्या धीरे से बोली ।

चाय ख़त्म होते ही हम उठ खड़े हुए और काउंटर पर खाने, चाय और टोस्ट का बिल चुका कर बाहर चले आये ।

"अब सीधे उस लॉज पर लेकर चलो, पहले ही बहुत समय बर्बाद हो चुका है ।" मिथ्या कार की बैक सीट पर बैठते हुए बोली । अब अपने चेहरे और भावो से पहली वाली मिथ्या नजर आ रही थी । खतरनाक और बेरहम ।

मैं कार को ड्राइव करते हुए पुनः मुख्य सड़क पर ले आया और सुनसान सड़क पर ख़ामोशी से ड्राइव करने लगा । एक नजर मैंने पीछे बैठी मिथ्या पर भी डाली, इस समय वो अपने सैटेलाइट फोन को खोल कर देख रही थी ।

वो घुड़सवार, जो भी था, उसने कदाचित हमे सामान्य ट्यूरिस्ट समझ कर ही हमारी जान बचाई थी । भला आदमी था वो जो भी था लेकिन इस बार वो अपराध रोकते-रोकते कदाचित एक अपराधी की ही रक्षा कर बैठा था । कुछ सोच कर मैंने अपनी सोचो पर रोक लगाई और उस अनजान मंजिल को और बढ़ चला जिसका मुझे रास्ता भी पता नहीं था ।

(क्रमशः)


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