वो अनजान
वो अनजान
वो कैब से उतर भागते दौड़ते स्टेशन के अंदर गई। उसकी ट्रेन का टाइम हो चुका था पर अंदर जाकर देखा, तो पता चला ट्रेन तो तीन घण्टे लेट है! अब क्या करूँ, वापिस फ्लैट में जाना मुमकिन नहीं क्योंकि पूरे डेढ़ घण्टे तो उसे स्टेशन पहुँचने में लगे है, वापिस जाकर फिर वह टाइम पर आ ही नहीं पाएगी। चलो वेटिंग रूम में बैठती हूँ,अपना ट्रॉली बैग खिंचती वह वेटिंग रूम तक पहुंच गई। वहाँ जाकर सामान रख वह चेयर पर बैठ गई, मोबाइल निकाला और अपनी फ्रेंड विधि को खबर करने लगी। "हेल्लो हां, विधि अरे यार, क्या बताऊँ ट्रेन पूरे तीन घण्टे लेट है! क्या, अरे नहीं आनलाइन तो पता किया था तब एक ही घण्टे लेट बताया। मैंने सोचा रास्ते में जाम भी लगा रहता है, सो जल्दी ही निकल आई। खैर कोई बात नहीं, यहीं वेट करती हूँ, ओके बाय।"
कहकर निधि मुड़ी तो ध्यान गया एक अजनबी भी उसके साथ वेटिंगरूम मे मौजूद था। वह थोड़ा और अपने में सिमट गई। अजनबी एक किताब खोले कुछ पढ़ने में व्यस्त था। मोबाइल खोल वह बिजी हो गई चैटिंग में। कुछ देर मोबाइल में व्यस्त रहने के बाद टाइम देखा अभी सिर्फ एक घण्टे ही निकले थे! हे भगवान कैसे बीतेंगे दो घण्टे और।
उसने अपने बैग से पेन और डायरी निकाली और कुछ लिखने लगी।
"आप लिखती है क्या?" आवाज सुन वह चौंकी।
सामने बैठे उस व्यक्ति की आवाज थी वह। अब ध्यान से उसने उसे देखा। उम्र पचास के आसपास होगी, बालो में हल्की सफेदी, चेहरा रौबदार बहुत आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था वह।
"जी, यूं ही थोड़ा-बहुत।" निधि को लगा उससे बात कर टाइम काटा जा सकता है।
"यह तो बहुत अच्छी बात है, अपने मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का बहुत अच्छा तरीका है लिखना और पढ़ना। पढ़ने में भी रुचि होगी आपकी।"
"जी जी हाँ , क्या आपको भी।"
"हाँ बेटा मैं भी लिखता हूँ।"
उस अजनबी के मुख से बेटा सुन उसे थोड़ा चैन आया, चलो आदमी ठीक है! वरना किसी अनजान ऐरे-गैरे से पाला पड़ जाता तो परेशानी बढ़ जाती।
"आप मुम्बई जा रही हो, यहां जॉब में हो क्या।"
"हाँ माँ पापा के पास, अब ट्रेन लेट होगी मुझे पता नहीं था। वरना घर से ही आराम से आती, यहाँ ट्रेन का इन्तज़ार करना बड़ा बेकार लग रहा है।"
"कोई बात नहीं बेटा, अब कुछ नहीं किया जा सकता। कुछ खा-पीकर निकली हो या मैं ला दूँ कुछ तुम्हारे लिए।"
"जी नही अंकल, मैंने खाना खा लिया है।"
"क्या लिखती हो।"
"जी कविता और कहानियां।"
"बहुत अच्छी बात है।"
अब तक वेटिंगरूम में दो-तीन यात्री और आ चुके थे, जो हमारी ट्रेन से ही जाने वाले थे।
अंकल जी की बातों से लग रहा था, बहुत सभ्य, शालीन व्यक्ति है वे! बाद में उन्होंने बताया कि आर्मी में थे वे, अब रिटायर हो चुके है। अब निधि थोड़ा और बेफिक्र हो चली की अब तो किसी का भी कोई डर नहीं यहाँ।
बातों बातों में उन्होंने दो-तीन कविताएं सुनाई और मुझसे भी सुनाने कहा मैंने भी सुनाई, बहुत तारीफ की उन्होनें, "बेटा बहुत अच्छा लिखती हो तुम। लिखना छोड़ना मत।"
कुछ बारीकियां भी लेखन की बताई उन्होंने, निधि आश्चर्यचकित थी कि आर्मी वाले भी इतने अच्छे कवि हो सकते है। बातें करते कब समय निकल गया पता नहीं चला। ट्रेन के आने का समय हो गया, निधि को ढेर सी शुभकामनाएं दीं उन अनजाने अंकल ने, उसे सुरक्षित उसकी सीट तक भी बिठा भी दिया। जब वो अपनी सीट पर जाने लगे तो उसने पूछा, "अंकल आपने नाम तो बताया नही अपना।"
"बेटा ईश्वर, ईश्वर चंद्र नाम है मेरा।” कह कर वे भीड़ में लुप्त हो गए अपनी सीट पर जाने हेतु, क्योंकि गाड़ी छूटने ही वाली थी।
निधि उनके साथ बिताए बहूमूल्य वक्त को अपनी यादों में समेटे ले जा रही थी। ट्रेन धीरे धीरे रफ्तार पकड़ रही थी।
