Preeti Agrawal

Inspirational


4.1  

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विश्वास में बहुत शक्ति है

विश्वास में बहुत शक्ति है

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"रीना देखो! मां मान ही नहीं रही हैैं। अब तुम ही समझाओ उनको। लाडली बहू हो ना उनकी। हमारी तो कोई बात ही नहीं सुन रही हैैं शायद तुम्हारी सुन ले"- ऋषि ने रीना से कहा। 

"मां" मतलब ऋषि की दादी! रीना को बहुत चाहती थीं। कहते हैं ना मूलधन से प्यारा ब्याज होता है। पहली पोता बहू - हंसमुख, चंचल और दिन भर आगे पीछे मां-मां कहते हुए उनका तुरंत काम कर देती थी। 

ऋषि को तिरुपति बालाजी पर बहुत श्रद्धा है। ऋषि चाह रहा था कि वह मां को अपने साथ एक बार तिरुपति बालाजी के दर्शन को ले जाए। मां की काफी उम्र हो चली थी इसलिए वह हमेशा टाल जाती थीं। कहती थी पहले तेरी शादी हो जाने दे तो बहू के साथ जाऊंगी। इसीलिए अब ऋषि बालाजी के दर्शन का कार्यक्रम बनाना चाह रहा था। 


रीना ने मां से कहा -" मां! अब तो आपको चलना ही पड़ेगा। आपके साथ मुझे भी तिरुपति बालाजी के दर्शनों का लाभ मिल जाएगा। चलो ना मां! 


"अब इस उम्र में जाकर क्या करूंगी? मेरे से तो ज्यादा पैदल चलते भी नहीं बनता और इतनी लंबी यात्रा तो मुझसे नहीं होगी। मेरे तो सब भगवान यहीं पर हैं"- मां फिर ना नुकुर करने लगी। 

"क्या मां! ऐसे बहाने नहीं चलेंगे। हम हैं ना, आपको पता भी नहीं चलेगा और इतनी लंबी यात्रा पूरी हो जाएगी। और, मैं और ऋषि हैं तो सही, आपको पैदल चलने की क्या जरूरत है?"  


बहुत मनाने के बाद आखिर मां को रीना की जिद के आगे झुकना ही पड़ा और वह उन दोनों के साथ तिरुपति बालाजी के दर्शनों के लिए जाने को  तैयार हो गईं। पहले वह बेंगलुरू पहुंचे। वहां से अगले दिन सुबह तिरुपति के लिए बस से रवाना हुए। 6 घंटे की यात्रा थी। रीना बहुत उत्साहित थी कि मां को किसी भी तरीके से दर्शन करवाना ही है, और मां…. मां तो बहुत खुश थी । उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह इतनी दूर बिना किसी परेशानी के इतनी आसानी से चली आईं। रीना ने मन ही मन ईश्वर से  मनौती मान ली थी कि -;,"हे बालाजी! आपकी इच्छा के बिना आपके दर्शन संभव नहीं है। हम मां को बहुत मुश्किल से आपके दर्शनों के लिए लेकर आए हैं इसीलिए जब तक हम मां को आप के दर्शन नहीं करवा लेते तब तक मैं पानी भी नहीं पियूंगी। रास्ते भर उसने पानी का एक घूंट भी नहीं पिया। उसको तो बस तिरुमला पहुंचने की जल्दी थी। 


तिरुमला पहुंचते-पहुंचते शाम के 4:30 बज गए थे। ऋषि ने एक जगह दोनों को बिठाया और दर्शन के लिए पूछताछ करने चला गया। आधे घंटे में जब वापस आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। उसने कहा - "रीना! यहीं से बालाजी के हाथ जोड़ लो। बहुत ज्यादा भीड़ है। हम दर्शन नहीं कर पाएंगे और कल तो चेन्नई की ट्रेन है।  3 दिनों तक दर्शनों की कोई संभावना ही नहीं है।"  

"ऐसे कैसे हम बिना दर्शनों के वापस चले जाएंगे? बालाजी को दर्शन तो देने होंगे"- रीना को पूरा विश्वास था। 


"तिरुमाला की धरती पर हम पहुंच गए उसका मतलब है कि हमारे दर्शन हो गए। मां भी दिन भर से थक गई हैं। चलो! कहीं होटल ढूंढ कर उन्हें आराम करवा दें और तुम भी अब पानी पी लो। दर्शन तो अब नहीं हो पाएंगे-  ऋषि ने कहा। 


रीना ने उसे तो कुछ नहीं कहा, बस मन ही मन बालाजी से शिकायत करने लगी - "भगवान! हमें तो फिर भी बाद में अवसर मिल सकता है, पर मां... मां अब दोबारा नहीं आ सकतीं। उन्हें बहुत मुश्किल से लाए हैं और उनको बिना दर्शन करवाये वापस कैसे ले जाएं? अब आप ही को कोई रास्ता निकालना है।" 

फिर रीना ने ऋषि से आग्रह किया -  "अब इतनी दूर से आए हैं तो थोड़ा और इधर-उधर पता करो न! कोई ना कोई रास्ता तो निकलेगा ही। हम मां को बिना दर्शन करवाएं घर वापस नहीं ले जाएंगे, बालाजी को दर्शन देने ही होंगे।" 


ऋषि ने रीना को समझाने की बहुत कोशिश की पर वह मानने को तैयार ही नहीं थी। उसे विश्वास था कि बालाजी जरूर दर्शन देंगे- "प्लीज ऋषि! एक बार और पता करके आओ ना!" 


" अच्छा बाबा ठीक है! मैं फिर से पता करके आता हूं। तुम पहले पानी तो पी लो।"- ऋषि को रीना के भूखे-प्यासे रहने से चिंता होने लगी थी। " नहीं! पहले तुम पता करके आओ। अभी मुझे कोई भूख-प्यास नहीं लगी है। पहले दर्शन करना है।" 


रीना की जिद के आगे ऋषि को झुकना पड़ा और वह फिर पता करने गया। 15 मिनट बाद ही वह बहुत खुशी-खुशी  लौटा -"रीना! मुझे अभी यहां एक आदमी मिला। कह रहा है कि वह कोशिश करेगा। अगर हम मां को व्हीलचेयर से ले जाएं तो शायद उनके दर्शन हो सकते हैं।"


 रीना खुशी से उछल पड़ी उसने हाथ जोड़कर बालाजी को धन्यवाद दिया और मां का हाथ पकड़कर चल पड़ी। वहां व्हीलचेयर लिए हुए एक व्यक्ति खड़ा था। दुबला-पतला, लंबा सा। दक्षिण भारतीय कपड़े पहना हुआ। रीना ने उसको हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया।  


वह बोला -"आप चिंता मत करो। आपकी दादी मां का दर्शन मैं करवा देगा। बस जैसा मैं बोलता हूं आप ऐसा करते चलो।" उसने मां को व्हीलचेयर पर बैठाया और खुद उसे धकेलते हुए एक अलग द्वार की तरफ ले चला। वहां बहुत छोटी लाइन थी। उस द्वार के बाहर उसने इन तीनों को छोड़ दिया और कहा -"अब आप में से कोई एक अपनी दादी मां को अंदर बालाजी के दर्शन को ले जाओ। यहां से 5 मिनट लगेगा।"  


रीना की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने उस व्यक्ति को बार-बार धन्यवाद दिया और ऋषि से कहा - "ऋषि! तुम मां को दर्शन करवा लाओ। मैं यहां बाहर राह देखती हूं।"  

ऋषि बोला-' नहीं! तुम मां को ले जाओ। तुमने सुबह से पानी तक नहीं पिया है।"  

"नहीं ऋषि! मां तुम्हारे साथ ज्यादा आसानी से जाएंगी। तुम जाओ। तुम्हें बालाजी पर बहुत अधिक श्रद्धा है न। तुम्हारा बहुत दिनों से मन था ना कि मां को बालाजी के दर्शन करवाने हैं। तुम जाओ! मैं रूकती हूं।"  


ऐसे ही तुम जाओ, तुम जाओ की बहस में 5 - 7 मिनट गुजर गए। वह व्यक्ति बड़े ध्यान से इन दोनों की बहस को देख रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। उसने कहा -" मैंने आपके जैसा लोग आज तक देखा ही नहीं। लोग यहां एक-दूसरे को धक्का मार कर खुद आगे जाने की कोशिश करते हैं और आप एक-दूसरे को दर्शन को जाने के लिए बोल रहे हो।" 


ऋषि बोला आपकी बात बिल्कुल सही है पर मैं पहले भी दो-तीन बार दर्शन करने आ चुका हूं पर रीना पहली बार आई है और उसी के कहने पर मां यहां आने को तैयार हुई और  उसने व्रत लिया है कि जब तक बालाजी के दर्शन नहीं होंगे वो पानी भी नहीं पिएगी। तो मां के साथ तो उसे ही अंदर जाना चाहिए ना।" 


उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा - " लगता है बालाजी को आप दोनों को ही दर्शन देना पड़ेगा। आप एक काम करो, आप दोनों अपनी दादी मां को गोद में उठा लो, आप तीनों के एक साथ दर्शन हो जाएंगे और मैं यह व्हीलचेयर लेकर यहीं खड़ा मिलूंगा।" 


फिर दोनों ने मिलकर मां को उठाया और अपने आप रास्ता बनता चला गया। अगले  5 मिनट में तो वह बालाजी के सामने भाव-विभोर खड़े थे। रीना की आंखों से आंसू बह रहे थे। उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था क्या कहे? क्या मांगे? क्या बोले? 


15 मिनट में ही वह लोग दर्शन करके बाहर आ गए। वह व्यक्ति मुस्कुराता हुआ वहीं खड़ा था। रीना ने उसको बार -बार प्रणाम किया।‌ कहा कि आप हमारे लिए भगवान बन कर आए हैं। आपके कारण ही हमारे आज दर्शन हो पाए। क्या नाम है आपका? हम जब भी आएंगे आपसे जरूर मिलेंगे। आप कहां रहते हैं?


 वह व्यक्ति मुस्कुराया और उसने कहा -" मैंने कुछ नहीं किया है यह सब बालाजी पर आपकी श्रद्धा के कारण हुआ है। मैं रहता हूं। आप जब भी आओगे, यही मिलूंगा। मेरा नाम ईश्वर है। आइए! मैं आपकी दादी के साथ आप लोगों की फोटो खींच देता हूं।"  उसने उन तीनों की फोटो खींची। आग्रह करके रीना ने उसकी भी फोटो ली। 


उसको यकीन ही नहीं हो रहा था कि आधा घंटा पहले जहां दर्शनों की कोई संभावना नहीं थी वहां उन लोगों के इतनी अच्छी तरह दर्शन हो गए थे। उस व्यक्ति को धन्यवाद देकर वह चाय- नाश्ता करने के लिए आगे बढ़ गए।


चाय नाश्ता करने के बाद नीचे जाने से पहले रीना ने फिर उस व्यक्ति से मिलने की इच्छा जाहिर की जिसके कारण आज उनके दर्शन संभव हो पाए थे। मां को एक जगह बिठाकर वह दोनों फिर उसी जगह गए जहां वह व्यक्ति उन्हें मिला था। वहां उन्होंने बहुत ढूंढा, बहुत लोगों से पूछा पर उसके बारे में कोई नहीं जानता था। लोगों ने कहा- यहां ईश्वर नाम का व्यक्ति काम ही नहीं करता है। दोनों अचंभित थे। उन्होंने तुरंत अपना कैमरा निकाला कि वह फोटो दिखाकर उसके बारे में पता करें पर उसके द्वारा खींची हुई इन तीनों की फोटो तो आई थी पर वह फोटो नहीं आई जिसमें ईश्वर था। 


दोनों की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। वह समझ गए थे कि वह ईश्वर कोई और नहीं स्वयं बालाजी ही थे। 


अभी भी जब भी ऋषि और रीना तिरुपति बालाजी के दर्शनों को जाते हैं तो उनके कानों में ईश्वर के कहे शब्द गूंजने लगते हैं -"मैं यहीं रहता हूं! यही मिलूंगा! मेरा नाम ईश्वर है।"





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