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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Inspirational Others


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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विकल्पहीन माँ ..

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नहीं, तुम, मम्मी पर यूँ आक्षेप लगाते हुए न कहो। 

दिवेश (मेरे पति), मेरी मम्मी के लिए यूँ सहानुभूति से कह रहे थे। 

मैंने कहा- उन्होंने, तब कड़ाई से ना कर दी होती तो उन पर और परिवार पर कष्टों का यह क्रम न चल रहा होता।

दिवेश ने (समझाने वाले अंदाज़ में) कहा- 20-25 वर्ष पूर्व के समय में, कोई बहू या पत्नी, अपनी सासु माँ या पति से, आज जैसे तर्क नहीं कर सकती थी। उन्हें परिवार की शांति के लिए चुप रहकर, स्वयं पर कष्ट ले लेना ही विकल्प होता था। 

हम में ये बात दरअसल यूँ चली थी कि हम चार बहनों के बाद जन्मा, हमारा इकलौता भाई 18 वर्ष का है। पापा अपनी हैसियत से बढ़कर उसके कोचिंग आदि का खर्च उठा रहे हैं। वह बारहवीं के साथ एम्स प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा है। उसकी समस्या लेकर मेरी मम्मी का अभी कॉल आया था।

मुझे बता रहीं थीं कि उसका ध्यान उचट गया है और पढ़ने की जगह गुमसुम बैठा या बिस्तर पर औंधा पड़ा रहता है। वह जब तब खाने के लिए, नई नई चीजें माँगता है। जिन्हें बनाने के लिए कई चींजे लगती हैं जो घर में नहीं होती, घर कंटेनमेंट जोन में है तो उन्हें ला भी नहीं सकते हैं। तुम उसे समझाओ।  

ये लक्षण डिप्रेशन के हैं, समझते हुए मैंने, मोबाइल पर तो उन्हें यही कहा था कि हाँ मैं देखती हूँ। लेकिन कॉल खत्म होने के बाद बिफरी हुई, सब बातें दिवेश से कह रही थी।

दिवेश आगे कह रहे थे- मम्मी क्या करतीं, जब तुम्हारी दादी, पापा से, पोते की अपनी आस के लिए कहतीं। ऐसे में तुम चार बहनों के बाद तुम्हारा यह भाई आया। मम्मी को तो परेशानी ही उठानी पड़ीं होगी ना?

मैंने कहा - कोई नहीं, सबसे ज्यादा मम्मी तो, उसी को प्यार करती हैं। 

दिवेश बोले - स्त्री कोई, कितने भी कष्ट से जन्मे मगर, जितने बच्चे उसके होते हैं, वह सभी को चाहने लगती ही है। तुम इस संबंध में, मम्मी से कुछ न बोलना। किसी ने उन्हें, उनको क्या चाहिए यह विकल्प दिया ही नहीं था। ऐसे में तुम भी उन्हें भला बुरा कहो तो सोचो, क्या बीतेगी उन पर? 

पति और सास के कहने पर, बच्चे पैदा करते चले जाना पहले लाचारी, अब उन्हीं बच्चों की सुनना दूसरी लाचारी। उनकी जगह तुम, अपने को रखकर सोचो, कि यह विकल्पहीनता का कैसा पीड़ाकारी जीवन होता है। सभी से बस उन्हें सुनना है। किसी किसी लिहाज में, उन्हें तो चुप ही रहना है।

(कहते हुए दिवेश वॉशरूम में चले गए थे।)

यह सुन मेरा क्रोध, अपनी मम्मी के लिए संवेदना में बदल गया। यद्यपि मेरे दिमाग में ये प्रश्न उठ ही रहे थे कि जितने बच्चे पैदा होते गए, पहले वालों के प्यार, सुविधायें एवं अधिकार ही तो शेयर होते गए हैं। मध्यम वर्ग में आर्थिक वह संपन्नता कहाँ कि कितने ही सदस्य हो जायें कोई कमी न होगी। मगर मैंने फिर मेरे तर्क नहीं उठाये।     

हम पहली तीन बहने हुईं, तब तक मुझे समझ नहीं थी। चौथी हुई तब मैंने, स्कूल और मोहल्ले में, अन्य बच्चों को हम पर हँसते देखा था। अधिकाँश वे बच्चे, दो भाई-बहन या दो बहने-बहने ही थे। हम चार बहनों की संख्या पर उन्हें मज़ाक सूझता था।

ऐसे ही, जब हमारा यह (अभी अवसादग्रस्त भाई) जन्मा, तब मैं दस वर्ष की हो चुकी थी। हमारे साथ के लड़के लड़कियाँ भी बड़े हो गए थे।

मैं तीन दिन स्कूल न जा सकी थी। चौथे दिन क्लास में, टीचर ने पूछा था- तीन दिन, तुम क्यों नहीं आईं? 

मैंने लजाते-सकुचाते हुए, उत्तर दिया था- मेम, हमारा भाई हुआ है।

इस पर मेम ने तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन ब्रेक एवं छुट्टी के समय, बच्चे कुछ कुछ कह कर मुझे चिढ़ाते थे।

कोई पूछता - अब तो तुम्हारे भाई आ गया, अब तो बंद हो जाएगी ना तुम्हारी मम्मी की 'जनना फैक्ट्री'?

कोई कहता - तुम अपने पापा से पूछना, देश के परिवार नियोजन कार्यक्रम से, उन्हें कुछ लेना देना है भी या नहीं ?

मेरा मन बुरी तरह आहत होता। मेरी बहनों को भी बड़े होते होते, यह सब सुनना सहन करना पड़ता।

भाई का तो और बुरा हाल था, उसे तो चिढ़ाने के लिए उसके सहपाठियों ने, उसका नाम ही 'कुलदीपक' प्रचलित कर दिया था।   

मैं सोच रही थी कि जिन दादी को कुलदीपक चाहिए था वे तो, भाई के दो साल के होने पर ही मर गईं थी। पीछे हम सभी को, ताने-उलाहने सुनने और अभाव में छोड़ गईं थीं।

ऐसे स्मरण आ जाने के बाद मैं, सब भुलाने की कोशिश कर रही थी। मुझे दिवेश ने, हमारी मम्मी की दयनीय मानसिक एवं शारीरिक स्थिति का दर्शन कराया था। जिसे अपनी चिढ़ की मनःस्थिति में, मैं स्वयं समझ और देख न सकी थी।

मैं सोचने लगी कि जो हो चुका है उसे बदला नहीं जा सकता है। उस का दुःख करना भी, कोई समाधान नहीं है। मुझे समाधान उन बातों का खोजना है, जो आज समस्यायें है।

पहली, अपने भाई को, हम किस तरह समझायें कि वह अवसाद से उबर जाए? और अपनी पढ़ाई में मन लगाए।

दूसरी, हमारा भविष्य अभी हमारे नियंत्रण में है कि हम बहने, अपने एक दो बच्चे से ज्यादा न होने दें। मुझे या उनके ससुराल वाले या पति इस पर चाहे जो कहते रहें।

हमें अपनी मम्मी की जैसी चुप्पी जिसमें फिर फिर गर्भवती होने तथा प्रसव के कष्ट सहन करते जाने की वेदनीय नियति, उसे बदलना है।

हमें उस लाचारी से मुक्त होना है जिसमें ज्यादा बच्चों के होने से उनकी इक्छायें पूरी न की जा सकती हैं।

साथ ही हमें, वह विकल्पहीन माँ नहीं होना है,जो आजीवन खामोश रहते इसके लिए, स्वयं को दोषी मानती है। 



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