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Sheikh Shahzad Usmani शेख़ शहज़ाद उस्मानी

Tragedy Fantasy Thriller


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Sheikh Shahzad Usmani शेख़ शहज़ाद उस्मानी

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विकासोन्मुखी (लघुकथा)

विकासोन्मुखी (लघुकथा)

1 min 283 1 min 283

"ख़ामोश !" एक बलात्कार पीड़िता और सरेआम उसकी हत्या करने वाले युवकों की बारी-बारी से मिमिक्री करने के बाद माइक पर उसने मशहूर नेताओं-अभिनेताओं और पुलिसकर्मियों की मिमिक्री करते हुए कहा, "कितने आदमी थे !"

"साहब, ती..ई...तीन थे !"

"वे तीन थे ... और ये सब तीस-चालीस...ऐं ! लानत है... तुम लोगों की ख़ामोशी पर !"

"साला... एक मच्छर इस देश के आदमी को हिजड़ा बना देता है !"

"साहब... मच्छर ! .. मच्छर बोले तो... पैसा, डर, पुलिस, नेता, क़ानून या स्वार्थ... है न !"

"कोई शक़ !"

'नारी सशक्तिकरण और बलात्कार' विमर्श पर एक आयोजन में दर्शक इस प्रस्तुति पर पिछली बार से अधिक ज़ोर से देर तक तालियाँ बजाते रहे ! विशिष्ट अतिथि दीर्घा में बैठे किन्नर सब तरफ़ निगाहें घुमाते हुए एक-दूसरे की ओर देख कर मुस्कराने लगे।

ठीक तभी..

"हाss हाss हाss हाss हाsss " वह माइक पर रावण की मिमिक्री करते हुए बोला, "मैं कालग्रस्त नहीं, अद्यतन हूँ.. कालजयी हूँ ! मैं दशानन नहीं जी, नयी सदी का शतानन... सहस्त्रानन हूँ... विकासोन्मुखी हूं... हा हा हा हा !"

दर्शक ख़ामोश हो गये !


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