वह कामवाली बाई हरगिज़ नहीं है
वह कामवाली बाई हरगिज़ नहीं है
दोनों गहरी नींद में सो रहे थे कि कोलबेल बजी।
" उफ्फ्फ... इस भरी दुपहरिया में इस समय कौन आया है?"
राधिका जी भुनभुना रही थी और राहुल जी ने कहा कि...
" मुन्ने की माँ! अब तुम उठकर जा ही रही हो तो एसी का टेंपरेचर थोड़ा बढ़ाती जाओ!"
वैसे राधिका जी को एसी का टेंपरेचर बढ़ाने के नाम पर तो उतना गुस्सा नहीं आता...लेकिन मुन्ने की मां सुनकर उन्हें बहुत गुस्सा आ गया।
इनको अभी तक अपने नालायक बेटे से उम्मीद है। तभी तो अभी तक बेटे को दिल से लगाए बैठे हैं। तभी तो मुझे मुन्ना की माँ.... मुन्ना की माँ...मां कहते रहते हैं। लगता है इतनी बेइज्जती होने के बाद अभी तक इनका दिमाग ठिकाने नहीं आया है।जब बेटे ने पूछना छोड़ दिया तो काहे का मुन्ना और काहे की मुन्ने की माँ ... हुँह...!"
खैर.... अपने बालों को जुड़े की शक्ल में
लपेटते हुए और बड़बड़ाते हुए ज़ब वह अपने कप्तान की डोरी बाँधते हुए अलसाई सी बरामदे में आईं तो सामने में पड़ोसन खड़ी थी और उन्हें देखते ही बोली,
"चाचीजी ! ये शुकुरमोनी है। पास के ही गाँव चंदनकियारी की रहनेवाली है। शहर में रहकर पढ़ाई कर रही है। आप जो ऊ ऊपर का कमरा किराये लगाने की बात कर रही थी ना... सो उसे ही देखने के लिए इसे लेकर आई हूं!"
सामने के घर की बोदरा जी की पत्नी लालमती बोदरा ने एक दुबली पतली बेहद चमकीली आंखोंवाली लड़की का का परिचय कराते हुए कहा था।
और...यह थी... राधिका जी की शुकुरमोनी से पहली मुलाक़ात। राधिका और राहुल की ज़िन्दगी में शुकुरमोनी का पहला कदम किसी सपने से कम नहीं था।
दरअसल उस दिन...दोपहर को सारा काम निपटाकर राधिकाजी लेटी ही थीं कि कॉलबेल बजी।
बड़ी ही अलसाई सी होकर उनिंदी आंखों से उठकर राधिका जी ने जब दरवाजा खोलकर देखा तो सामने उनकी पड़ोसन एक अठारह उन्नीस साल की लड़की को लिए खड़ी थी।
पूछने पर पता चला कि उसका नाम शुकुरमोनी है। यहीं धनबाद के स्थानीय कॉलेज में पढ़ती है और साथ ही अपने हस्तशिल्प का काम करके अपनी पढ़ाई का खर्चा निकालती है।
उसके पिता नहीं हैं और मां कुछ घरों पास के गाँव में उसकी माँ छोटे भाई के साथ रहती है घरों में काम करके घर का खर्चा निकालती है।
"तुमको अलग कमरा क्यों चाहिए? हॉस्टल या पी.जी. में रहकर भी तो पढ़ाई कर सकती हो ना? "
शुकुरमोनी से राधिका का पहला सवाल यही था।
"मैडम जी, मैं पढ़ाई के साथ पेपर बैग और दोने वगैरह बनाती हूँ , जिसके लिए थोड़ी ज़्यादा जगह चाहिए ।और उसे बेचकर अपनी पढ़ाई का खर्चा निकालती हूँ। अक्सर यह सारा काम निपटाते काफ़ी रात हो जाती है जिससे पी.जी.में बाकी लड़कियों को बड़ी परेशानी होती है। इसलिए अब अकेले कमरा लेकर रहना पड़ेगा!"
बोलते हुए उस दुबली पतली लड़की के चेहरे और आवाज़ में एक दृढ़ता थी। और अपने गरीब होने पर कोई अफ़सोस भी नहीं था।
उस साधारण सी लगने वाली लड़की की असाधारण सी इसी बात ने राधिका को बहुत प्रभावित किया। आखिर वह एक लेखिका जो ठहरी।
शब्दों के मर्म को उनमें छुपे हुए अर्थ को बड़ी अच्छी तरह पकड़ लेती थी।
राधिका को शुकुरमोनी को हाँ कहने से पहले राहुल को पूछना ज़रूरी था।
राधिका ने अंदर आकर अपने पति को राहुल को बताया तो पहले तो उन्होंने यूँ एक ज़वान और अकेली लड़की को कमरा किराए पर देने में आपत्ति जताई
उनका कहना भी सही था,
"ऐसे अकेली कॉलेज जानेवाली लड़की को कमरा किराये पर देंगे तो हमारी परेशानी और बढ़ जाएगी। इसके कोई आने जाने का ठीक तो होगा नहीं। फिर रात बेरात लौटेगी। इसके यार दोस्त भी आएँगे। खामखा शोरगुल होगा। फिर कोई ऊँच नीच हो गई तो बदनामी अलग से।
"पर वह लड़की तो पढ़ाई करने वाली लग रही है!"
राधिका ने कहा।
फिर भी राहुल कुछ कनविंस नहीं हुआ।
" अरे ... वह पढ़ाई करे या ना करे उससे हमें क्या मतलब....! वैसे भी उसे हम घर का काम करवाने के लिए रख रहे हैं या फिर उससे पढ़ाई करवाने के लिए रख रहे हैं? तुम उसे जाकर मना कर दो कि ...अभी किसी को कमरा किराए पर देना ही नहीं है!"
राहुल की बात में दम था फिर भी राधिका ने उसे एकबार चलकर शुकुर मोनी से मिलने को कहा तो बेमन से उसकी बात मानकर शुकूरमोनी से मिलने बाहर आए।
बाहर आकर शुकूरमोनी के चेहरे की मासूमियत और ज़ुबान की साफगोई ने राहुल को भी बहुत प्रभावित किया।
और फाइनली शुकूर मोनी को उनके घर की छत वाला छोटा कमरा किराए पर मिल गया।
उम्र के इस दौर में ज़ब अपनों की ज़रूरत सबसे ज़्यादा होती है उस वक़्त अपने स्वाभिमान को सबसे आगे रखकर बेटे बहु के घर से वापिस आने पर राधिका और राहुल टूट से गए थे।
इस बड़े से सूने से घर में एक और कोई रहेगा ।
यह सोचकर राधिका को अंदर से बहुत खुशी हो रही थी । तो दूसरी तरफ़ राहुल भी शुकुरमोनी से मिलने के बाद कुछ आश्वस्त से दिख रहे थे।
दरअसल रेलवे के बिजली विभाग में काम करनेवाले राहुल जी की लास्ट पोस्टिंग संथाल परगना के इस चंदपुरा नामक जगह पर हुई थी । उन दिनों उनका बड़ा बेटा राजीव यहीं पर पोस्टेड था। इसलिए खुश होकर उन्होंने यहीं पर जमीन लेकर घर बना लिया था कि बुढ़ापे में बेटा बहू पोता पोती के साथ आराम से इस बड़े घर में रहेंगे।
राजीव की पत्नी सुधा कामकाजी थी ओर उसके माता पिता उसके साथ ही रहते थे। और यहां जब शादी हो गई तब उन्हें उनके अपने साथ रखने में उसे मुश्किल हो रही थी। इसलिए उसने राजीव के कान भर भर के आखिरी यहां से राजीव का ट्रांसफर बेंगलुरु करवा लिया था। फिर सेवानिवृत्ति के बाद राधिका जी और राहुल जी जब बेटे के पास रहने गए तो वहां बहू के माता-पिता पहले से ही रह रहे थे।
कुल मिलाकर बहू और बेटे ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया कि तंग आकर वह दोनों फिर से वापस आ गए। और इसी जगह को इसी घर को अपना स्वर्ग मानकर रहने लगे।
वैसे तो रहते रहते उन्हें यहां पर मन लगने लगा था। पर यहां पर उन्हें अपने जैसे लोग बहुत कम मिलते थे।
हां ...एक बात अच्छी थी कि लोग बड़े सीधे थे। भाषा की थोड़ी समस्या आती थी पर कुल मिलाकर उन्हें यहां मन लग गया था।
वैसे देखा जाए तो...यहां मन लगाना उनकी मजबूरी थी। क्योंकि बड़ा बेटा बहू तो पहले ही अलग रहने लगे थे। और बड़े बेटा की देखा देखी छोटे बेटे ने भी एक मलयाली लड़की से लव मैरिज कर लिया था और वह भी हैदराबाद में रहने लगा था कुल मिलाकर वहां भी माता-पिता के रहने के लिए ना तो दिल में जगह थी ना उनके घर में जगह थी । क्योंकि उस मलयाली लड़की की मां भी उनके साथ रहती थी जो कि वह अकेली बेटी थी तो उसकी मां कहां जाती ?
और तब दोनों ही बेटे अपने सास-ससुर की सेवा में लग गए थे और माता-पिता को भूल गए थे।।
और जब दोनों पति-पत्नी कुछ दिनों के लिए बेटा बहू के पास रहने भी गए तो उनका व्यवहार उन्हें इतना बुरा लगा कि तंग आकर उन दोनों ने समझौता कर लिया।
राधिका जी का मन बेटों के बगैर बिल्कुल नहीं लगता था और वह अक्सर होती रहती और बोलती कि....
" जब दो दो बेटों की मां होने के बावजूद मुझे बुढ़ापे में अकेले रहना पड़ रहा है? तो इससे अच्छा होता है कि मेरे कोई संतान ही नहीं होती या बेटी होती तो कम से कम बीच-बीच में आकर अपने माता पिता को देख तो जाती!"
पत्नी की बात सुनकर राहुल जी भी उदास होकर कहते,
" सही कह रही हो तुम .…!
इससे अच्छा होता कि हम यहां पर घर ही नहीं बनाते!"
क्या ही अच्छा होता जो हम अपनी तरफ उत्तर प्रदेश में घर बनाते। यू यहां पर अलग प्रदेश में आकर झारखंड में नहीं रह रहे होते !"
यह सब बोलते बोलते ही राहुल जी और रधिका जी सोचने लग जाते ,
कि अब क्या हो सकता है...?
क्योंकि....
अब घर भी बना लिया था और काफी पैसे भी लग गए थे तो यहां से जाने का तो सवाल ही नहीं उठता है ...?
इसलिए किसी तरह वह उस जगह में अपना मन लगाने की कोशिश करते थे पर शाम होते ही मन में उदासी घिर आती थी।
इधर जब उन्होंने मन बनाकर इस घर को और इस शहर को अपनाकर रहना शुरू किया तो...
कुछ दिन तो घर की साफ सफाई और महरी, दूध, पानी और सब्जियों वगैरह की नियमित व्यवस्था करने में लग गए थे। फिर कुछ तो उम्र का असर कुछ अपनों की अवहेलना से टूट सी गई थी राधिका। अब उनसे घर का पूरा काम कहाँ संभलता था। भले ही बेटा बहु और छोटे से पोते पोती उन्हें याद ना करें पर वह बंगलोर से चंद्रपुरा से आकर भी भूल नहीं पाती थी।
"सुनिए, ज़रा मुन्ना को फोन करके पूछिए तो सही सब ठीक है ना? चीनू की सर्दी ठीक हुई कि नहीं? और मीनू की जो उँगली कट गई थी उसके लिए टिटनेस का इंजेक्शन लगवाया कि नहीं?"
राधिका जी अक्सर राहुल जी से पूछ बैठती।
"ओह्ह...राधिका! अभी भी तुम्हें उनलोगों की चिंता हो रही है जिन्हे ना तो हमारी परवाह है और ना ही ज़रूरत!"
राहुल जी थोड़ा खीझकर बोलते। पर राधिका भी क्या करती...?
माँ का दिल था ना... हमेशा बच्चों की ही परवाह करता रहता है। चाहे उनके बच्चों में समय के साथ कितने भी बदलाव आये हों।
इधर शुकुरमोनी उनके घर के ऊपर के कमरे की किरायेदार बनकर आई थी ।और कलांन्तर में राहुल जी और राधिका जी का बहुत सारा काम संभाल लिया था। पढ़ाई के साथ साथ वह इन दोनों का ध्यान भी रखने लगी थी। कभी उनकी दवाइयाँ लेकर आती तो कभी रात में बड़ा गेट बंद कर देती तो कभी उनका फोन और टी. वी. रिचार्ज करा लाती थी।
कुल मिलाकर उसके कदम पड़ते ही यह उदास घर खुशियों से लहलहा उठा था।
अपने बेटे बहु ने राहुल और राधिका की कद्र नहीं की जबकि इस छोटी सी लड़की ने उन्हें मान सम्मान के साथ उनकी बहुत सहायता की थी।
सच कहा है किसी ने कि,
"रिश्ते संबंधों से नहीं निभते बल्कि उन्हें दिल से निभाया जाता है,!"
जैसा शुकुर मोनी निभा रही थी राहुल और राधिका जी के साथ।
अब इस घर से खुशियों की खिलखिलाहट बाहर जाती तो राहुल और राधिका कहते,
"हमारे घर में एक नन्ही परी आ गई है !"
खून के रिश्ते जब रिश्ते नहीं निभा पाए तो एक छोटी सी लड़की ने रिश्ते निभाकर और बुजुर्गों का ध्यान रखकर सबका दिल जीत लिया था।
वक्त बीत रहा था। गर्मी की छुट्टियों में बाग में बहुत आम और केंदु बहुत होते थे। और पता नहीं कैसे उन दोनों बेटों को शायद खबर लग गई कि घर में रहनेवाली किरायेदार अब वालों के दिल में भी रहने लगी है।
क्योंकि...अब राधिका जी और राहुल जी उन्हें फोन भी कम करते थे और राधिका और राहुल जी खुश रहने लगे थे।बातों ही बातों में उन्होंने बता भी दिया था कि ऊपर हमने किराएदार लड़की रख ली है जो हमारा बहुत ध्यान रखती है।
बस इसी की कुछ भनक पाकर बेटे बहु जब गर्मी की छुट्टियों में आए तो पूरे घर में शुकुरमोनी का एक तरह से अधिपत्य देखकर वो सब चौंक गए थे। वह राहुल जी और राधिका जी का ऐसा ख्याल रखती थी जैसे कि कोई घर की बेटी रखती हो।
उनकी दोनों बहू सुकुरमोनी से चढ़कर उससे बहुत कठोरता से बात करते थे। एक तरह से वह उससे कामवाली बाई की तरह व्यवहार करते थे।
और... एक दिन काम करवाते हुए बातों बातों में बड़ी बहू ने कह दिया कि,
"यह नौकरानी तो बहुत घमंडी है !"
बड़ी बहू की देखा देखी छोटी बहू ने भी कह दिया...
"सच...! ऐसी कामवाली नहीं देखी जो घर की मालकिन की तरह व्यवहार करती है। मुझे तो यह जरा भी नहीं सुहाती है !"
तभी राधिका जी ने यह सुना तो उनसे नहीं रहा गया और वह बोल पड़ी,
"उसका नाम सुकुरमोनी है। वह सिर्फ सिर कामवाली बाई नहीं है। बल्कि वह इस घर की बेटी है!"
राधिका जी की आवाज यह कहते-कहते थोड़ी भर्रा गई तब राहुल जी ने उन्हें संभाला और राहुल जी भी अब चुप नहीं रहे उन्होंने भी कह ही दिया अपने मन की बात कि...
" शुकुरमोनी सिर्फ इस घर की बेटी ही नहीं बल्कि हमारे दिल की धड़कन है और हमारे बुढ़ापे की उम्मीद है।और हम दोनों के जीने की वजह है। खबरदार जो तुम लोगों ने उसे कामवाली कहा तो...!
सुनकर दोनों बेटे और बहू बिल्कुल स्तब्ध रह गए।
और....उधर रसोई में चाय बनाती हुई शुकुरमोनी के कान में जब यह बात पड़ी तो उसे आंसू आ गए और रोते रोते हुए बोली,
" बाबा! मां...! आज मुझे पता चल गया कि इस दुनिया में भगवान जैसे लोग भी होते हैं। जो मुझ गरीब लड़की को अपनी बेटी का दर्जा दे रहे हैं। आप यकीन मानिए मैं कभी आपको शर्मिंदा नहीं होने दूंगी और कभी आपको अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी!"
आहा... हा...बड़ा ही भावुक दृश्य था...!
एक तरफ तो शुकुरमोनी रो रही थी और दूसरी तरफ उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
एक तरफ से राहुल जी व राधिका जी उसकी पीठ पर हाथ फेर रहे थे। राधिका जी तो लाड़ में आकर उस बच्ची के माथे को चुम भी रही थी।
कहीं से भी देखकर नहीं लगता था शुकुरमोनी इस घर की कामवाली बाई है...वह तो इस घर की बेटी ही लग रही थी।
अब तो दोनों बेटे और बहू का सिर झुक गया था। और दोनों कुछ नहीं कह पा रहे थे । क्योंकि जब उन्होंने कर्तव्य ही नहीं निभाया तो किस अधिकार से कुछ कहते...?
कभी भी किसी चीज पर या किसी भी व्यक्ति पर अधिकार जमाने से पहले कर्तव्य करना जरूरी होता है।
वस्तुत :राजीव और संजीव ने अपने स्वार्थवश अपने माता-पिता की जिम्मेदारी से आंखें मूंद ली थी और उन्हें लग रहा था कि सेवा करें या ना करें घर की जायदाद और संपत्ति तो नहीं मिलने वाली है तो खामखा उन पर अपना और पैसे क्यों जाया करना...?
उन्होंने अपने माता-पिता के लिए कुछ भी नहीं किया था। यहां तक कि जब माता-पिता उनके घर रहने आए उस वक्त उन लोगों ने बहुत ही खराब व्यवहार किया था ताकि वह दोनों तंग आकर वापस चंदपुरा चले जाएं।
और....जब बेटों ने ही अपने माता-पिता की कदर नहीं की तो बहुएं तो उनसे दो कदम आगे ही निकली।
मतलब राजीव और संजीव जी की पत्नियां भी एक तरह से उन्हें अपने माता-पिता से दूर ले जाने में कामयाब रही थी।
लेकिन....आज उन्हें लग रहा था कि कहीं यह घर मां बाबूजी उस लड़की के नाम ना कर दें?
कहीं उस छोटी सी लड़की ने माता-पिता के दिल में जगह बना कर इस घर में भी जगह ना बना ले?
लेकिन वह कुछ नहीं पूछ सकते थे क्योंकि अब उनके हाथ में कुछ नहीं था।
आज शुकुरमोनी को इस घर की बेटी की तरह मान सम्मान मिला था और उसने अपने सौभाग्य को सिर माथे पर लिया और मन ही मन में एक निश्चय किया कि वह कभी इन बुजुर्गों को बेसहारा छोड़कर नहीं जाएगी और हमेशा इनका सहारा बनकर रहने की कोशिश करेगी।
कई बार खून के रिश्ते बहुत पीछे छूट जाते हैं और दिल के रिश्ते दिल में बस जाते हैं।
(समाप्त)
