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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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वासना के पात्र

वासना के पात्र

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वासना के भिक्षा पात्र में कभी भी प्रेम नहीं समा सकता है । इसीलिए तो स्त्री उस पुरुष को खोजती है जो प्रेम के योग्य हो । उसे वासना नहीं चाहिए । 

उसे शुद्ध प्रेम, वह भी गहराई से करने वाला चाहिए ।

        

 वासना के सतह पर उलझा मनुष्य प्रेम की नहीं शरीर की मांग करता है । वासना प्रेम को कभी भी नहीं समझ सकता और ना कभी समझेगा । इसलिए स्त्री हमेशा कहती रहती है कि उसने कभी उसे समझा नहीं है । स्त्री कि यह बात अर्थात आरोप सत्य है । वासना कभी भी पूर्ण नहीं होता । वासना तो बढ़ती रहती है । वह कभी भी पूर्ण नहीं होता है ।

      

  वासना से भरा पुरुष हमेशा स्त्री को वासना का एक साधन ही समझता है । वह उसे पुज्या नहीं भोग्या ही समझता है । वह हर पल वासना की दृष्टि से देखते रहता है । वह उसे प्रेम कि नजर से नहीं देखता है । जबकि स्त्री सदैव प्रेम से भरी रहती है । वह सदैव पूर्ण रहती है । 

      

  स्त्री की निरंतर एक ही खोज चलती रहती है । वह सुन्दर पुरुष को खोज नहीं करती है । वह एक प्रेम करने वाला और उसे समझने वाला पुरूष की खोज करती है । स्त्री की खोज कभी भी नहीं रुकती है । वह सदैव उसे ही खोजती है । जिस पर वह अपने प्रेम की वर्षा करे । स्त्री की इसी निरंतर खोज पर पुरुष उसके चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है । एक विफल पुरुष और कर भी क्या सकता है । केवल स्त्री पर प्रश्न चिन्ह लगाने के सिवाय । 

      

 स्त्री, पुरुष में वासना नहीं, वह सदैव प्रेम खोजती रहती है । वह प्रेम के गहनता तक उतरना चहाती है । वह रुह तक प्रेम का स्पर्श करना चहाती है । वह अमर प्रेम खोजती है जो एकरुपता से उसे प्रेम करें । प्रेम की बरखा में रंग जाना चहाती है । वह प्रेम से रंगने वाला रंगरेज खोजती है ।और शायद इसीलिए स्त्री प्रेम की चाह में अपना देह सौपती है और पुरुष देह की लालसा में प्रेम करता है::::::::::



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