Raj Shekhar Dixit

Drama Thriller


4.5  

Raj Shekhar Dixit

Drama Thriller


ट्रिन- ट्रिन

ट्रिन- ट्रिन

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मेरी हालत बड़ी अजीब सी हो गयी थी। पिछली कई रातों से मैं अच्छे से नहीं सो पाया था। एक काल्पनिक सी डरावनी दुनिया में खोया रहता था। मन में तरह-तरह के ख्याल आते थे। इस अजनबी शहर में अपना कहने वाला कोई न था, जिससे मैं खुलकर बात कर सकूँ। उस आखिरी चीख के बारे में सोचकर कई भयावह दृश्य मानस पटल पर छा जाते थे। आखिर ऐसा क्या हो गया था कि जब भी कोई आहट होती तो मैं दौड़कर फ़ोन के पास चला जाता और फिर इंतज़ार करता कि शायद घंटी बजे। कभी-कभी तो फ़ोन की घंटी नहीं बजने पर भी मुझे लगता, कि शायद उसकी घंटी खराब हो गयी होगी। फिर फ़ोन उठाकर हेलो हेलो करता। मुझे घबराहट होती और मैं अपने आप से पागलो जैसा व्यवहार करता। किसी मायावी शक्ति ने मेरे दिमाग पर ऐसा हमला कर दिया था, कि मुझे फ़ोन पर उस अजनबी आवाज सुनने का मनोग्रसित बाध्यता विकार (Obsessive Compulsive Disorder) या  ओसीडी हो गया था।  

मेरा तो अब ट्रान्सफर भी वापस मेरे होमटाउन जामनगर हो गया था और बस 7 दिन बाद मुझे इस शहर को छोड़ देना था। पर कई अनसुलझे सवाल थे जिनका मुझे उत्तर नहीं मिल रहा था।

ये बात वर्ष 1997 की हैं। कॉलेज में कैंपस सिलेक्शन के दौरान मुझे कोस्ट गार्ड की नौकरी मिल गयी थी। मेरी पहली पोस्टिंग तमिलनाडु के एक शहर तूतीकोरिन में एक साल के लिए हुई थी, और मुझे जहाजों के रखरखाव की एक साल ट्रेनिंग पूरी करनी थी। मैं गुजराती परिवार से हूँ और अपने परिवार का मैं पहला सदस्य हूँ जो सरकारी नौकरी में आया था। मैं गुजराती हूँ। हमारा परिवार तो बरसों से हलवाई का कारोबार कर रहा है। इस अजनबी शहर में कोई गुजराती भाषी मिले, ये तो बिलकुल संभव ना था, हिंदी भी एक्के-दुक्के लोग समझते थे जो व्यापार के सम्बन्ध में उत्तरी भारत आते जाते थे। यहाँ तक कि हिंदी फिल्में कभी कभार लगती थी। मुझे यहाँ हॉस्टल में एक कमरा मिला था। खाने-पीने को कोई दिक्कत नहीं थी। खाने के  व्यंजन तो पूरी तरह से साउथ इंडियन होते थे, पर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। कमरे में एक फ़ोन था पर उसमे एसटीडी सुविधा नहीं थी, इसलिए जब कभी घरवालों से बात करना होती थी तो पास में एक रामास्वामी एसटीडी बूथ जाकर बातें कर लेता था।

करीब एक महीने पहले मेरी अपने पापा से अनबन हो गयी थी। वो जयंतीभाई अंकल की बेटी का रिश्ता मुझसे करना चाह रहे थे। चूँकि मैं उस लड़की के बारे में जानता था और वो कहीं से भी मेरे काबिल न थी, इसलिए मैंने तुरंत मना कर दिया। पापा को उस रिश्ते से दहेज़ के रूप में अच्छी रकम मिलने वाली थी इसलिए, वे मेरे ऊपर इमोशनल दबाव बनाने लगे थे। लिहाज़ा मैंने घर पर फ़ोन नहीं किया। इधर ऑफिस में मेरी ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग को लेकर बातें हो रही थी कि मुझे विशाखापत्तनम भेजा जाएगा, जबकि मैं गुजरात में पोस्टिंग चाह रहा था। इसलिए थोड़ा परेशान रहने लगा था। घरवालों का फ़ोन आता तो मैं चिड़चिड़ाकर जबाब देता। एक रात पापा का फ़ोन आया कुछ तकरार हुई और थोड़ी देर बाद मैंने गुस्से में कहा कि वे मुझे फ़ोन न करे।

रात 10 बजे फिर फ़ोन घंटी बजी। मैंने गुस्से में फ़ोन उठाया और बगैर हेलो हाय किये गुजराती में लगातार बोलना शुरू कर दिया। मेरे दो मिनट नॉन-स्टॉप बोलने के बाद भी जब दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई, तो मैंने फ़ोन खड़खड़ाते हुए कहा- “हेलो, आप सुन तो रहे हैं ना मैं क्या कह रहा हूँ।” दूसरी तरफ पांच सेकंड का सन्नाटा रहा फिर किसी लड़की की आवाज आई जो तमिल में कुछ बोल रही थी। मुझे कुछ पल्ले नहीं पड़ा और मैंने गुस्से में हड़काते हुए अंग्रेजी में पूछा-“ Who are you? Why did you call me in the night?” दूसरी तरफ से तमिल लहजे वाली अंग्रेजी में जबाब आया- “Sorry sir, wrong number। But why are you angry?”मुझे फिर गुस्सा आया और मैंने कहा-“ You idiot, just put down your phone।” दूसरी तरफ से हँसी की आवाज आई, कुछ तमिल में शब्द बड़बड़ाये और कहा- “ Good night Sir। Your voice is very sweet। I will call you tomorrow।” कहकर फ़ोन रख दिया।

उस अजनबी फ़ोनवाली लड़की की आवाज से लग रहा था कि वो कोई स्कूल या कॉलेज की शरारती लड़की थी और कहीं रॉंग नंबर लगा बैठी थी। मेरे गुस्से की आवाज में उसे कुछ मज़ा आया होगा, इसलिए चुपचाप सुनती गयी।  हालाँकि उसके कल दुबारा फ़ोन करने वाली बात को मैंने नज़र अंदाज़ कर दिया। दूसरे दिन रात नौ बजे फ़ोन आया। मुझे लगा कि पापा का फ़ोन होगा, इसलिए नहीं उठाया। एक घंटे बाद फिर से फ़ोन की घंटी बजी और मैंने फ़ोन उठाते हुए कहा-“ पापा मैंने कह तो दिया कि मुझे वो रिश्ता मंजूर नहीं हैं, फिर आप क्यूँ बार-बार फ़ोन करते है?” तभी दूसरी तरफ से आवाज आई- “ Sir, I am your wrong number phone friend। Why are you angry today?” उस आवाज में कुछ मासूमियत और मिठास थी जिससे मेरा गुस्सा काफूर हो गया। पर सामने वाले को जाने बगैर मैं क्यूँ उत्तर दूँ? इसलिए मैंने फिर कड़कते हुए पूछा-“ Who are you and why do you call me? I will complain in police।” उसने जबाब हँसते हुए दिया- “OK sir, complain in police। Do you know my number? Do you know my name?” मैंने उसकी बात को बीच में काटते हुए पूछा-“Do you know, who am I and my name?” हमेशा की तरह उसने तमिल लहजे में हँसते हुए जबाब दिया- “I don’t know you। Just by chance, you are my wrong number stranger friend। You are north Indian। You talk like Shahrukh Khan। I don’t know Hindi। But I love Shahrukh Khan।” बस इतना कहकर उसने फ़ोन बंद कर दिया। मुझे लग रहा था कि बातों का सिलसिला लंबा चलेगा। अचानक हुई छोटी सी वार्तालाप ने मेरे अन्दर एक आश्चर्यचकित ख़ुशी का संचार कर दिया। मैं तो शाहरुख़ का फैन हूँ, अलबत्ता तुरंत आईने में अपने आप को देखा और शाहरुख़ के अंदाज़ में बोलने के लिए कुछ अंग्रेजी के डायलाग याद कर लिए। उस रात मैं चार बजे तक जागता रहा।

अब तो मैं हर रात उस अजनबी फ़ोन का इंतज़ार करता। दो दिन में एक बार फोन आ जाता था। सिर्फ 4 से 5 मिनट हम बातें कर पाते थे और वो फ़ोन काट देती थी। मैंने नाम पूछा तो उसने कभी नहीं बताया और मैंने भी अपना नाम जाहिर नहीं किया। उसने बस इतना बताया था कि वो कॉलेज में पढ़ती हैं। अगर एक-दो दिन उसका फ़ोन नहीं आता तो बैचनी बढ़ जाती थी। इसी दौरान मेरा ट्रान्सफर आर्डर आ गया और मुझे एक सुखद अनुभूति हुई जब पता लगा कि मुझे गुजरात पोस्टिंग मिली हैं। एक महीने बाद ही मुझे नई जगह पहुँचना था। उस दिन मैंने सोचा कि जाने से पहले मैं उस अजनबी को अपने बारे में बता दूँ। उसी रात 9 बजे फ़ोन आया और मैंने शाहरुख़ खान के अंदाज़ में अपने बारे में सब कुछ बक डाला और विनम्रतापूर्वक कहा कि मैं एक बार उसे देखना चाहता हूँ। तय हुआ कि तीन दिन बाद यानि आने वाले रविवार को मैं विनायागार मंदिर में शाम 5 बजे पहुंचूंगा। मैंने अपना हुलिया और कपड़ो के बारे में उसे बता दिया था, जो मैं उस दिन पहनने वाला था। साथ में रेबेन का चश्मा के बारे में भी बता दिया था। उसने अपने बारे में कुछ नहीं बताया पर कहा कि वो मुझे देखकर पहचान लेगी।

फिर वो दिन आ ही गया। मैं तो आधा घंटा पहले ही वहाँ पहुँच गया और हर गुजरने वाली खूबसूरत लड़की को देखकर सोचता कि यही वो अजनबी दोस्त हैं। देखते- देखते पांच, फिर छह फिर सात बज गए। मैंने तब तक करीब 500 से ज्यादा लड़कियों में उसे पहचानने की कोशिश की पर निराशा हुई। मैं मायूस होकर वापस कमरे में आ गया। बहुत ज्यादा खराब लग रहा था। अब गुस्से में मैं उसके फ़ोन का इंतज़ार करने लगा। हर क्षण बड़ी मुश्किल से कट रहा था। मैंने उस रात खाना नहीं खाया। प्रतीक्षा करते-करते 11 बज गए। ज्योहीं फ़ोन की घंटी बजी, मैंने फ़ोन को लपककर उठाया और तिलमिलाते हुए कहा-“ I reached Vinayagaar Temple in time and waited for you for two hours। Why did you not come?” दूसरी तरफ से आवाज आई- “I reached there Sir and saw you।” उसके इतना कहने के बाद एक भयावह चीख सुनाई पड़ी और फ़ोन कट गया। मैं फ़ोन पर हेलो हेलो कहता गया। पर कोई उत्तर नहीं मिला। मैं बहुत ज्यादा डर गया था। रात के चार बजे एक बार फिर फ़ोन की घंटी बजी। मैंने फ़ोन उठाया तो दूसरी ओर से तमिल में कुछ बड़बड़ाने की आवाज आई फिर वही चिर परिचित हंसी। उसके बाद फ़ोन एकदम डेड हो गया।

इस घटना के बाद 8 दिनों से मैं बेतहाशा पागलों की तरह फ़ोन के पास बैठकर लगातार प्रतीक्षा करने लगा। रात रात भर जागता रहा। सोचा था की अब फ़ोन आने पर उसे जमकर लताड़ लगाऊंगा। पर इस 8 दिनों में कोई फ़ोन नहीं आया। ये कैसी अनसुलझी पहेली थी। जामनगर जाने से एक हफ्ते पहले मैंने अपने रिपोर्टिंग ऑफिसर को पूरी बात सच सच बताई और कहा कि इस घटना के बाद से मैं बहुत डिप्रेस्ड हूँ। उन्होंने टेलिकॉम विभाग से जानने की कोशिश की कि इस तरह कौन मुझे फ़ोन कर रहा था, पर कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। टेलिकॉम विभाग ने लिखित में भी सूचित किया कि मेरे फ़ोन पर पिछले एक महीने में सिवाए गुजरात के, किसी अन्य जगह से कोई फ़ोन नहीं किये गए। एक हफ्ते बाद मैंने तूतीकोरिन को हमेशा के लिए अलविदा कर दिया।

इस बात को आज 23 साल हो गए हैं। मुझे अभी भी समझ नहीं आ रहा हैं कि ये कोई घटना थी या सिर्फ illusion या सम्मोहन था।


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