Raj Shekhar Dixit

Drama


4.5  

Raj Shekhar Dixit

Drama


हमारी अधूरी प्रेम कहानी

हमारी अधूरी प्रेम कहानी

18 mins 24K 18 mins 24K

वर्ष 1995 में एक जबरदस्त सुपर डुपर फिल्म आई थी – दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे, DDLJ। राज, यानि शाहरुख़ खान और सिमरन यानि काजोल के इश्क की वो दास्ताँ जोआज तक लोगो के ज़ेहन में कुछ ऐसी बैठ गयी है कि जब-जब रोमांटिक फिल्मो के चर्चे होंगे तब-तब लोग DDLJ को याद करेंगे।इतने साल बीत जाने के बाद भी DDLJ को जब देखो, हमेशा ताजो-तरीन लगती है।आज भी सभी छोटे बड़े शहरो के कॉलेज में एकाध राज और सिमरन के किस्सेसुनने मिल जाते हैं। 

पर DDLJ के राज और सिमरन से पहले भी एक राज-सिमरन की कहानीअस्सी के दशक में किसी छोटे से शहर में बुनी गयी थी, जो सामाजिक और आर्थिक असमानता के कारण अधूरी रह गयी। मैं उसीकहानी का हीरो राज हूँ।एक मध्यम वर्गी किसान परिवार का होनहार बेटा, जिसने एक साधारण गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने के बावजूद हायर सेकेंडरी में पूरे राज्य में 9 वीं पोजीशन हासिल की।

मुझे तो सदा से एक आधुनिक किसान बनना था, पर पिताजी की इच्छा थी कि मैं एक बड़ा इंजिनियर बनूँ, इसलिए भोपाल के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो इंग्लिश मीडियम में थी और मैंने हिंदी माध्यम से स्कूल में पढाई की थी और स्वभावतः देहाती था, तो शुरू में थोड़ी बहुत दिक्कत हुई। पर कुछ ही महीनो में मैं इंग्लिश मीडियम की टेक्निकल बुक्स पढने में सहज हो गया। हाँ, अंग्रेजी बोलचाल में थोड़ा कमजोर था। पर दिमाग का तेज था,इसलिए भाषाई दिक्कतों के बावजूद मैंने फर्स्ट इयर में 5 वींपोजीशन पाई। इसके बाद सेकंड और थर्ड इयर में टॉप किया। फिर क्या कहने, टीचर्स और सभी स्टूडेंट्स, मेरीबुद्धिमत्ता के दीवाने हो गए। खुद प्रिंसिपल कहते थे कि राज अपने कॉलेज का नाम रोशन करेगा। वैसे तो मैं शर्मीले स्वभाव का था पर शहर की हवा लगने के कारण बदल गया था औरअपनी देहाती इमेज मिटा दी थी।

 वर्ष 1985,अब मैंफाइनल इयर में आ गया। उधर फर्स्ट इयर में सौ जूनियर लोगों का नया बैच आ गया। यूँ तो अस्सीके दशक में इक्की-दुक्की लड़कियां इंजीनियरिंग में आती थी, पर इस बैच में 1 या 2 नहीं, बल्कि पूरी 10 लडकियाँ थी। पर सिमरन मारवाह उन सबसे हटकर थी। सिमरन मारवाह, एक बेहद गोरी, छरहरे बदन वाली,ऊँचाई 5 फीट 8 इंच, यानि करीब-करीब मेरे जितनी लम्बी, कमर तक लम्बे घने काले बाल, typical पंजाबी features थे। और क्या बताऊँ, बस कॉलेज के आधे से अधिक लड़के उस पर फ़िदा थे। उसके पिताजी आर्मी में ब्रिगेडियर थे और वो उधमपुर (जम्मू और कश्मीर) से ट्रान्सफर होकर भोपालआये थे।

हमारे प्रिंसिपल ब्रिगेडियर साहेब के अच्छे दोस्त थे। एक दिन प्रिंसिपल सर ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि सिमरन के पिता चाहते हैं कि कॉलेज का कोई होनहार सुशील सीनियर सिमरन की पढ़ाई में मदद करे, उसे पुराने नोट्स दिलवा दे। तो मैंने तुम्हारा नाम उन्हें बता दिया। तुम्हे जब समय मिले तो उनके घर चले जाना।

 

अरे ! मैं क्या सुन रहा हूँ, मुझे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था। जिस लड़की से लोग बातें करने तरसते हो, उसके घर से मुझे निमंत्रण! मन में तो दो चार मन से ज्यादा लड्डू फूटने लगे थे। ऐसा लगा मेरी लाटरी खुल गयी। पर अतिउत्साहित होकर मैं अपनी अंदरूनी ख़ुशी के कारण कुछ गलती न कर बैठूं और प्रिंसिपल सर को भी ये आभास करा दूँ, किमैं भी सिमरन के आशिकों की क़तार में एक हूँ, मैं कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। फिर कहा- “ठीक हैं सर जैसा आप चाहे”। अगले ही दिन मैं शाम को सिमरन के घर गया और ब्रिगेडियर अंकल को अपना परिचय दिया तब अंकल अंग्रेजी में बोले- “Mr। Raj, Simran wants to go to Canada after Engineering, will you please help her in day to day study ?” मैंने भी एक आज्ञाकारी बालक की तरह जबाब दिया-“जी।।।यसअंकल”।

 उस दिन मैंने पहली बार सिमरन को अच्छे से देखा था। वो कम लम्बाई की स्लीवलेस फ्रॉक पहने थी। उसके घर में पहली बार अहसास हुआ कि मॉडर्न फॅमिली कैसी होती हैं। ब्रिगेडियर साहब घर में भी सूट और टाई पहने थे और उनके मुँह में पाइप था। घर में कई विदेशी शराब की बोतलें शो-केस में दिख रही थीं। एक जर्मन शेफर्ड कुत्ता, सॉरी डॉग था, जिसे वे टॉमी कहते थे। सिमरन की माँ पतलून और कमीज़ में किसी अधेढ़ मेम से कम नहीं लग रही थी। सिमरन का एक छोटा भाई था, वो कैसेट प्लेयर में कोई अंग्रेजी गाना सुन रहा था।

उसने एक भी बार मेरी तरफ नहीं देखा। उनके घर में अंग्रेजी वातावरण का जबरदस्त बोल-बाला था। ऐसे माहौल में मुझे थोड़ा सा इन्फीरियर काम्प्लेक्स आ गया था। सिमरन शायद मेरे इस भाव को समझ गयी पर कुछ नहीं कहा। जब हमने पढ़ाई की बातें शुरू की तो उसने कहा- “आप प्लीज कॉलेज में किसी को मत बताइए कि आप मुझे ट्यूशन पढ़ाने आयेंगे। डैडी ने बेवजह प्रिंसिपल सर के सामने मेरी पढ़ाई की बात की और प्रिंसिपल सर ने आपका नाम ले लिया।” मैंने हामी भरते हुए सिर हिला दिया और मूक रहकर भी सिमरन को आश्वस्त कर दिया कि किसी को कुछ नहीं बताऊंगा और हफ्ते में कम से कम 1 या 2 दिन उसके घर पर पढ़ानेआऊंगा।

 अब मेरा सिमरन के यहाँ आना जाना शुरू हो गया। पहले मैं भी सिमरन को बहुत ज्यादा घमंडी लड़की मानता था, क्योंकि वो किसी लड़के को भाव नहीं देती थी। कॉलेज में भी रिज़र्व रहती थी।वह अकेली लड़की थी जो पापा की एम्बेसडर कार में कॉलेज आती-जाती थी।ट्यूशन के दौरान उसकी करीबी के कारण मुझे लगा कि वो अपने परिवार के बाकी लोगों से हटकर थी। वो पेंटिंग बनाती, कविता लिखती, चिडियों की चहचहाहट सुनती, उसे चकाचौंध की दुनिया से ज्यादा लगाव नहीं था।गजले गुनगुनाना उसे पसंद था। कभी कभी मुझसे पूछती कि गाँव कैसे होते हैं। और पूछती कि उसे गाँव कब घुमाओगे? उससे ये सब बाते घर के गार्डन एरिया में होती थी, जहाँ सिर्फ हम दोनों होते थे। उसकी इन बातों के कारण मेरे मन में उसके प्रति एकअजीब सा प्रेम जग गया था। पहली बार मुझे लगा कि सिमरन कितनी प्यारी और सबसे अलग थी। वो सिर्फ तन से ही नहीं, बल्कि मन से भी बेहद खूबसूरत थी। हमारी पसंद काफी मिलती थी। एकाध बार मैंने पूछा कि क्या डिग्री लेने के बाद वो सचमुच कनाडा चली जाएगी? तो वह ये कहकर बात टाल गयी कि उसे इंडिया अच्छा लगता हैं और कहा मेरा देश महान। 

इतनी नजदीकियों के बावजूद भी न तो हम कभी कॉलेज में खुलकर मिले और न कहीं बाहर घूमने गए। और तो और कॉलेज में भी किसी को भनक लगने नहीं दी कि मैं सिमरन के घर जाकर उसे पढाता था। जब कभी मेरे सहपाठी सिमरन का नाम लेकर कोई मजाकिया बातें करते तो अन्दर ही अन्दर आग बबूला हो जाता। वो मेरे लिए प्रेम की देवी थी जो मेरे दिलो दिमाग पर बस गयी थी। कई बार मन किया कि उसके हाथों को अपने हाथों से पकडू, एक बार उसका माथा चूम सकूँ, पर ऐसा कभी नहीं किया। उसके घर के लोगों का स्वभाव एकदम अलग था। उसका भाई कभी कभार हेलो इस तरह करता मानो अहसान कर दिया हो। उसकी मम्मी समझती थी कि मैं कोई चपरासी हूँ जिसे प्रिंसिपल के कहने पर उनके यहाँ ड्यूटी पर लगा दिया हो। हाँ ब्रिगेडियर अंकल अच्छे से बाते करते थे पर वे सिर्फ ‘गुड मोर्निंग’, ‘गुड इवनिंग’ और ‘हाउआर यू’ तक सीमित थी। 

फाइनल एग्जाम शुरू होने के करीब एक महीने पहले से मैंने उसे पढ़ाना बंद कर दिया क्योंकि मेरा फाइनल इयर था और मुझे इस बार फिर टॉप करना था। पहला पेपर आरम्भ होने के करीब 10 दिन पहले रात 8 बजे गाँव से टेलीग्राम आया। उसे देखकर मेरे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया। पिताजीको खेत में सांप ने काट लिया। पास के सरकारी अस्पताल में उन्हें ले गए, पर वे न बच सके। गाँव भोपाल से 200 किलोमीटर दूर था। जाने के लिए बस के अलावा कोई और साधन न था। एक बार सोचा कि ब्रिगेडियर अंकल के घर जाकर बात करूं कि क्या वो मुझे गाँव तक अपनी कार से भेज पाएंगे। पर डर था कि वो मना न कर दे। खैर अपने एक साल जूनियर साथी ब्रजेन्द्र को सारी बातें बताकर किसी प्रकार रात भर का सफ़र करके दूसरे दिन सुबह गाँव पहुँचा। पिताजी की अंत्येष्टि की। सभीआसपास के रिश्तेदार पहुँच चुके थे।अब तो गाँव में करीब 15 दिन रुकना जरुरी था, जब तक पिताजी की त्रयोदशी नहीं हो जाती। इसलिए परीक्षा के कुछ पेपर तो छूटना निश्चित था। 

त्रयोदशी के दिन मेरे अचरज का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि प्रिंसिपल सर और ब्रिगेडियर अंकल अपनी कार से मेरे घर आये हैं। उन्हें देखकर मेरी आँखे नम हो गयी। ब्रजेन्द्र ने प्रिंसिपल को मेरे पिताजी के देहांत की खबर दे दी थी। मैं ज्योहीं ब्रिगेडियर अंकल के पास गया और पैर छूने वाला था तभी उन्होंने मुझे अपने सीने से लगाया। मैं जोर-जोर से फफक-फफक कर रोने लगा। उन्होंने पहली बार मुझसे पंजाबी-हिंदी में कहा- “ पुत्तर इत्ती बड़ी बात हुई और तूने हमे खबर भी नहीं दी। क्या हम गैर हैं? तुझे तभी बताना था, हम गाड़ी से तुझे भिजवा देते और जब तक तू गाँव में रहता, गाड़ी तेरे पास रहती”। वे हमारे यहाँ करीब दो घंटे रुके। उन्होंने माँ को भी आश्वस्त किया कि वे यथासंभव हमारी मदद करेंगे।उसी दौरान मैंने सहमते हुए पूछा कि सिमरन की पढाई कैसी चल रही है? तब ब्रिगेडियर अंकल ने कहा किआज ही उसका पेपर था इसलिए मैं उसे नहीं लाया वर्ना वो यहाँ आने की जिद कर रही थी और कह रही थी कि पेपर सप्लीमेंट्री परीक्षा में दे देगी। उसे भी तुम्हारे पापाजी की मृत्यु का सुनकर बड़ा बुरा लगा। अब मुझे लगा कि शायद सिमरन भी मुझे चाहने लगी थी, वर्ना परीक्षा छोड़कर यहाँ आने की जिद क्यों करती। 

त्रयोदशी के बाद मैं वापस आ गया। दो पेपर तो नहीं दे पाया। बाकि पेपर भी ठीक-ठाक गए। खैर परिणाम मालूम था, दो पेपर में सप्लीमेंट्री आई और फाइनल इयर में टॉप न कर सका। पूरक परीक्षा में दोनों पेपर दिए और फाइनल एग्जाम में इस बार मुश्किल से 75% अंक प्राप्त कर सका जबकि सेकंड और थर्ड इयर में लगभग 90% अंक पाए थे। इस दौरान एक दो बार मैं सिमरन के घर भी गया परन्तु कभी अपने मन की बात न कह सका क्योंकि वहाँ एकांत नहीं मिला। 

पिताजी के गुजर जाने के बाद हमारे यहाँ कोई स्थायीआय का साधन नहीं था। घर में विधवा माँ के अलावा एक छोटा भाई और दो छोटी बहने थी और उनकी सारी जिम्मेदारी मेरे कंधे पर थी। इसलिए नौकरी करना जरुरी था। प्रिंसिपल सर ने मेरीअस्थायी नौकरी जबलपुर में लगवा दी। फिर भोपाल आना जाना लगभग बंद हो गया। नए शहर में सिमरन की याद सताती थी पर उससे कैसे संपर्क करूँ, समझ नहीं आ रहा था। उन दिनों न तो मोबाइल होते थे और न ही टेलीफोन, इसलिए कम्युनिकेशन का साधन सिर्फ चिट्ठी था। किसी तरह मैंने उसे एक छोटी सी चिट्ठी अंग्रेजी में लिखी- My Dear Simran, How are you? How are your studies? How is Uncle? I am fine here at Jabalpur। I miss you। I wish to meet you once again and have Tea and snacks as we had every Sunday evening। When can we see each other again? I pray god for your good health। My best wishes and regards। God Bless you। Your Raj। Please reply। ये चिट्ठी उसके कॉलेज के पते पर भेज दी। 

चिट्ठी तो उसे मिली परन्तु उसके पास पहुँचने से पहले किसी शरारती लड़के ने खोल कर पढ़ डाली। फिर क्या था, लोगों ने उसके नाम के साथ मेरा नाम जोड़कर भद्दे तरीके से उसके बारे में तरह- तरह की बातें बनाना शुरू कर दी। मैडम सिमरन तो प्रेम दीवानी निकली। राज के साथ और क्या क्या सम्बन्ध थे माय डिअर सिमरन। हर सन्डे की छुट्टी राज के साथ। ये किस होटल में चाय पीते थे। कभी हमें भी मौका दिया होता। जब कीचड़ उछाला जाता हैं, तो कई काल्पनिक घटनाएँ जोड़ दी जाती हैं। ऐसा लगने लगा मानो राज-सिमरन ने मिलकर कोई गुनाह कर दिया हो। 

एक हफ्ते बाद ही उसका जबाब आ गया। चिट्ठी हिंदी में लिखी थी - “ राज सर। आपकी चिट्ठी मिली। आप हमेशा स्वस्थ रहे और खुश रहे। मुझे कृपया चिट्ठी न लिखे।” बस इतनी ही लाइने लिखी और चिट्ठी के अंत में अपना नाम भी नहीं लिखा। 

मैं परेशान था कि सिमरन ने इतनी बेरुखी से मेरी चिट्ठी का जबाब क्यों दिया और लिखने के लिए क्यों मना किया। मुझे कैसे मालुम पड़ता उसकी बेरुखी का कारण। मेरी चिट्ठी के कारण उसे कॉलेज में शर्मिंदा होना पढ़ रहा था। 

उसकी बेरुखी से मैं अन्दर से एकदम टूट सा गया था। समझ नहीं आ रहा था की जिसे मैं अब तक प्यार का नाम दे रहा था वो सिर्फ एक छलावा था।क्या सिमरन के लिए मैं एक ट्यूशन टीचर से ज्यादा कुछ नहीं था। मैंने तो कई रंगीन सपने बुने थे अपने और सिमरन के साथ, वो क्या मेरा illusion था। कई अनगिनत सवाल मेरे दिमाग में आ रहे थे जिनका कोई जबाब मुझे नहीं सूझ रहा था। कॉलेज में मेरा ऐसा कोई दोस्त नहीं था जिससे मैं सिमरन के बारे में पूछ सकूँ। हर बार यही सोचता कि जिंदगी ने मुझे इतना बड़ा धोखा क्यों दिया? खैर, मैं एक अच्छे जॉब की तलाश में competitive एग्जाम की तैय्यारी करने लगा। पुराने कॉलेज के इक्के-दुक्के दोस्तों से भी नाता करीब-करीब ख़त्म कर दिया और तन्हाइयों में रहने लगा। 

करीब 4 महीने बाद मेरी नौकरी DRDO में साइंटिस्ट के पद पर लग गयी। पोस्टिंग 1500 किलोमीटर दूर बेंगलुरु शहर में हुई और गाँव बार बार जाना संभव नहीं था, इसलिए माँ, छोटे भाई और बहनों को अपने पास बुला लिया। गाँव में खेती का काम को ताऊ जी के सुपुर्द कर दिया।नौकरी लग गयी थी इसलिए माँ चाहती थी कि मैं शादी कर लूँ। उन्होंने कई बार मेरी शादी की बात कि और रिश्तेदारी की तीन चार लड़कियों के बारें बताया। पर मैं हर बार ये कह कर टाल दिया करता कि अभी नहीं करना। माँ मेरे और सिमरन के बारे में कुछ नहीं जानती थी। पर मन ही मन में समझने लगी थी कि कोई बात हैं जो मैं शादी की बात टाल जाता था। 

सिमरन की चिट्ठी को लेकर मन हमेशा दुखी रहता था।जी चाहता था कि सिर्फ एक बार उससे मिलकर अपने दिल की बातों का इज़हार करूं। पर कैसे करूं, कुछ रास्ता दिखाई नहीं नहीं पड़ रहा था। चिट्ठी लिखने मना किया था। उसके घर पर फ़ोन था पर कभी नंबर नहीं पूछा, इसलिए फ़ोन भी नहीं कर सकता था। पर कहते हैं न, कि किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है। अप्रैल 1987 में ऑफिस के काम के सिलसिले में हैदराबाद गया था। वापसी में रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था। रात के 11 बज रहे थे। बेंगलुरु जाने वाली ट्रेन दो घंटे लेट थी और उम्मीद थी कि 1 बजे रात्रि तक यहाँ आएगी। मुझे नींद के झोंकें आ रहे थे। तभी अचानक किसी ने एक जोर का हाथ मेरे कंधे पर मारा। मैं सकपका गया कि ये कौन हैं।

“ अरे ब्रजेन्द्र।। तू यहाँ कैसे?” अनजाने शहर में उसे देख मैं आश्चर्यचकित हो गया। वो भी बोला- “ अरे गुरु आप यहाँ कैसे? कॉलेज छोड़ने के बाद से तो आप ऐसे गायब हो गए जैसे गधे की सर से सींग”। फिर मैंने उसे बताया कि मैं DRDO बंगलुरू में हूँ। ब्रजेन्द्र ने बताया कि उसके फाइनल इयर की परीक्षा पिछले हफ्ते ही ख़त्म हुई हैं और वो हैदराबाद किसी इंटरव्यू के सिलसिले में आया था। इससे पहले कि मैं अनजान बनकर सिमरन के बारे में कुछ पूछूं, ब्रजेन्द्र मुझसे पूछ बैठा-“ सर, आप तो बड़े छुपे रुस्तम निकले।” मैं ठिठक गया और उसकी बात काटते हुए पूछा,- “क्या मतलब ?” तब ब्रजेन्द्र ने मुझे बताया कि मैंने जो चिट्ठी भेजी थी वो सिमरन के पास पहुँचने से पहले लीक हो गयी थी और मेरे एवं सिमरन के लव अफेयर्स के चर्चे पूरे कॉलेज में जोर शोर से होने लगे। सिमरन जो हमेशा सर उठाकर चलती थी, उस पर मेरे नाम से लिपटी फब्तियाँ कसी जाने लगीं। 

अब सारा माज़रा मुझे समझ में आने लगा। क्यों उसने मुझे चिट्ठी लिखने से मना किया।चिट्ठी भेजने की बात पर मुझे अपराध बोध हो रहा था। फिर मैंने ब्रजेन्द्र से पूछा कि उसने मुझे ये बात पहले क्यों नहीं बताई, तो उसने पलटकर कहा, -“सर कॉलेज छोड़ने के बाद आपने हम लोगों से कोई संपर्कनहीं रखा। प्रिंसिपल सर से आपके बारे में पूछा ताकि आपकी चिट्ठी के कारण कॉलेज में हुए हंगामे के बारे में आपको बता सकूँ। पर प्रिंसिपल सर ने यह कहकर मना कर दिया कि मुझे स्वयं अपनी सीमाओं में रहना था और प्रेम प्रसंग नहीं बनाने थे। शायद प्रिंसिपल सर भी ऐसा मानते थे कि मुझ जैसे ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले लड़के का,जिसके ऊपर माँ, भाई और दो बहनों की जिम्मेदारी हो, एक मॉडर्न फॅमिली से मेल नहीं हो सकता। प्रिंसिपल सर को इस बात का अंदाज़ नहीं था की प्रेम ऊँच-नीच, गरीब-अमीर, देहाती-शहराती जैसे बन्धनों को नहीं मानता। ब्रजेन्द्र ने फिरआगे बताया कि सिमरन शायद भोपाल छोड़कर कहीं और जाने वाली हैं, परन्तु वह निश्चित नहीं था। इससे ज्यादा ब्रजेन्द्र को कुछ नहीं मालूम था। सिमरन के बारे में कुछ और जानकारी लेता, तब तक ब्रजेन्द्र की ट्रेन आ गयी और वो अपने गंतव्य की और रवाना हो गया। 

ब्रजेन्द्र की बातें सुनने के बाद मेरे मन में सिमरन के प्रति जो भी दुर्भाव पैदा हुआ था वो एकदम हट गया। अब बैचेनी होने लगी थी कि सिमरन भोपाल छोड़कर क्यों जा रही है? क्या इसके लिए मैं जिम्मेदार हूँ? मुझे अब क्या करना चाहिए? मैं उस अनिर्णय की स्थिति में था, जहाँ सब कुछ ख़त्म होता प्रतीत हो रहा था। मैंने दो मिनट के लिए आँखे बंद की और फैसला किया कि एक बार भोपाल जाकर सिमरन से मिलूँ और मेरे दिल में उसके प्रति क्या हैं, सब बता दूँ। कब तक मैं इस बात को दिल में दबाकर रखूँगा। मैंने बेंगलुरू वाली ट्रेन छोड़ दी और भोपाल को जाने वाली ट्रेन में बैठ गया। मन में कई सवाल उठ रहे थे कि वहाँ जाकर क्या बातें करूंगा? ब्रिगेडियर अंकल का गुस्सा तो सातवें आसमान पर होगा, उनका सामना कैसे करूँगा? किस तरह मुझे बेईज्ज़त किया जायेगा? सिमरन से आँखे मिला पाउँगा की नहीं? हर प्रकार के बुरे ख्याल मेरे दिमाग में आ रहे थे।

 तारीख मुझे अभी भी याद है-14 अप्रैल 1987, दिन रविवार। मैं ऑटोरिक्शा लेकर सिमरन के घर पहुँचा। अंदर से बहुत भयभीत था। समझ नहीं पा रहा था कि कैसे बातों की शुरुआत करूँगा? कॉल-बेल बजाई। घर के बाहर आँगन में सिमरन की छोटी लम्बाई वाली स्लीवलेस फ्रॉकसूख रही थी। कुछ देर बाद नौकर ने दरवाजा खोला। नौकर के साथ टॉमी भी तेजी से दौड़ता हुआ आया और मुझसे ऐसे लिपटा मानो बरसों बाद दो दोस्त मिल रहे हो। मैंने भी टॉमी के बालों में हाथ फेरा। टॉमी तो मुझे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।फिर अन्दर से सिमरन का भाई आया और टॉमी को जोर से डाँटते हुए बोला- “Tommy come inside”। उसने मुझसे कोई हेलो हाय नहीं किया। हालाँकि मैंने स्माइल दी पर उसने नज़रअंदाज़ कर दिया। नौकर ने बाहर के कमरे में मुझे बिठा दिया।

थोड़ी देर बाद नौकर पानी लेकर आया। मैंने पूछा- “अंकल हैं क्या?” उसने उत्तर दिया- “ हाँ। आज बैसाखी की पूजा चल रही हैं, उसके बाद मिलेंगे”। मैं सोच रहा था कि सिमरन के बारे में पूंछू। पर ऐसा लगा मेरे होंठ सिल गए थे। करीब 15 मिनट बाद अंकल बाहर निकले। आज वे सूटेड-वुटेड नहीं थे, बल्कि सफ़ेद रंग का कुरता पायजामा पहने थे। मैंने आते ही उनसे कहा- गुड मोर्निंग अंकल। उनका उत्तर था- जीन्दा रह पुत्तर। फिरऔपचारिक वार्तालाप शुरू हो गया। मसलन मैं कहाँ हूँ? क्या नौकरी कर रहा हूँ? तनख्वाह कितनी हैं ?

माँ और भाई बहन कहाँ है? वगैरह, वगैरह। मैं हर प्रश्न का जबाब दे रहा था। पर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनकी मेरे उत्तरों में कोई रूचि नहीं थी, क्योंकि वे तो लगातार न्यूज़पेपर को पलटते हुए ताज़े समाचार पढ़े जा रहे थे। मुझे भी वहाँ बैठना बड़ा असहज लग रहा था। इस उधेढ़ बुन में था कि सिमरन के बारे में कैसे पूछा जाये।थोड़ी देर बाद चाय आ गयी, साथ में बिस्कुट। अंकल बोले- “Please have tea and biscuit। I have to reach officers club for half an hour। हाँ लंच हमारे साथ ही करना।” सब कुछ इस तरह बोला जा रहा था मानो एक मेहमान नवाजी की रस्म की अदायगी हो रही थी। इतना कहकर ब्रिगेडियर अंकल अन्दर के कमरे में चले गए।

सिमरन के बारे में मेरी जिज्ञासा अधूरी रह गयी। मैं जब चाय पी रहा था तब अन्दर खुसपुसाहट चल रही थी। सिमरन की माँ ब्रिगेडियर अंकल को डाँटते हुए कह रही थी कि उस लड़के यानि मुझे घर के अन्दर घुसने क्यों दिया। बाहर से ही धक्का देकर भगा देना था। पर सिमरन के खुसपुसाहट की आवाज़ नहीं सुनाई दी। मैं जल्दी जल्दी चाय पीना लगा और चाह रहा था कि अब घर से तुरंत बाहर निकलूं। चाय ख़तम करके मैं रुमाल से मुहँ पौंछ ही रहा था की अंकल बाहर निकले और बोले- “ पुत्तर और कुछ लोगे?” मैंने भी सिर हिलाते हुए कहा- “कुछ नहीं। बस एक दिन के लिए भोपाल आया था, सोचा आप लोगों से मिलता चलूँ।” मैं कुछ और कहता उससे पहले अंकल बोल पड़े, - “हाँ हाँ पुत्तर, जबभी भोपाल आओ, हमसे जरुर मिला करो। बल्कि अगली बार आओ तो हमारे ही यहाँ ठहरना।” मैं उनके इस झूठ भरे वाक्यों की सच्चाईयों को समझ रहा था, पर बड़ो का आदर करता हूँ, इसलिए उनकी बातों का जबाब सिर हिलाते हुए हाँ-हाँ में दे रहा था। अब मैं उठकर बाहर जा रहा था तभी अंकल बोले- “ सिमरन अपनी मौसी के घर लुधियाना गयी हैं। 2-3 हफ्ते बाद वापस आएगी। अगली बार आना सिमरन से भी मिल लेना।” अंकल ने इतना बड़ा सफ़ेद झूठ कैसे बोल दिया ? मुझे आश्चर्य हो रहा था। सिमरन की फ्रॉक तो आँगन में सूख रही थी, फिर वो मौसी के पास लुधियाना कैसे चली गयी ?

मैं ज्योंही कमरे से बाहर निकला, नौकर ने दरवाजा बंद कर दिया। तभी टॉमी भी दौड़ते- दौड़ते आया और बंद दरवाजे के पीछे से जोर जोर से भौकने लगा, मानो कुछ कहना चाह रहा हो। आँगन से बाहर निकलते ही मेरी नजर सिमरन के कमरे की खिड़की के परदे पर पड़ी। परदे के पीछे से दो आँखे मुझे झाँक रही थी। मैंने भी दो पल के लिए उन आँखों को देखा। आँखों में मेरे लिए कितना अपनापन था, मेरे दिल ने महसूस किया। उन साधारण सीआँखों में मैंने पहली बार अपने लिए असाधारण सा सच्चा प्यार देखा। वे आँखे नम थी और मुझे पुकार रही थी।

पर उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था। मैं भी अन्दर ही अन्दर रो पड़ा। अपने आप को इतना असहाय पहले कभी महसूस नहीं किया। मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं टकटकी लगाकर उन आँखों को लगातार देख सकूँ। मेरे कदम तेजी से सड़क पर दौड़ने लगे। लगा कि अब जल्दी से इस शहर से भाग जाऊंं। सब कुछ भूल जाना चाहता था। हिम्मत नहीं थी इस शहर में और ठहरने की। अगली जो ट्रेन मिली मैं उससे बेंगलुरु आ गया। ट्रेन यात्रा में अनगिनत प्रश्नों से जूझता रहा। मसलन- क्या सिमरन सचमुच भोपाल छोड़कर जाने वाली हैं ?

अंकल ने मुझसे झूठ क्यों बोला, इसका उत्तर मुझे मिल गया था। मेरा सामाजिक परिवेश मुझे ये अधिकार नहीं देता कि मैं किसी मॉडर्न फॅमिली की लड़की से प्यार करूँ। प्रश्न यह भी परेशान कर रहा था की प्रिंसिपल ने मेरे निश्छल निष्कपट प्यार को “प्रेम-प्रसंग” क्यूँ समझा। कई अधूरे प्रश्न आज तक अनउत्तरित हैं।


Rate this content
Log in

More hindi story from Raj Shekhar Dixit

Similar hindi story from Drama