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Sandeep Kumar Keshari

Drama


3  

Sandeep Kumar Keshari

Drama


थप्पड़

थप्पड़

8 mins 313 8 mins 313

“रूपा; कहाँ गयी तुम ? इधर आओ। क्याक्कक्या है ये ? तुम अभी अपने घरवालों को बुलाओ और बोलो कि, वो आकर तुम्हें ले जाये यहाँ से। मैं तुम्हें यहाँ एक दिन भी रहने नहीं दे सकता। बोलो, किस–किस लड़के के साथ संबंध थे तुम्हारे ? तुम कितनों के साथ गुल खिला चुकी हो अब तक ? क्यों तेरे बाप ने हमसे झूठ बोलकर शादी करवाई ? आज बुलाओ अपने घरवालों को, और फैसला करवाओ। मैं तुमको अब अपनी पत्नी नहीं मान सकता”- चेतन चिल्लाए जा रहा था। रूपा चुपचाप खड़ी थी। पता नहीं कैसे चेतन के हाथ रूपा को लिखा मयंक का प्रेम-पत्र लग गया था ? रूपा उसे समझाते हुए बोली – “देखो, चेतन! हम आपस में बैठ के बात कर सकते हैं। और ये पत्र तो बहुत पुराना है। हमारी शादी हो चुकी है, और मैं सबकुछ भूलकर आगे बढ़ चुकी हूँ। मेरी जिंदगी में तेरे सिवा और कोई भी नहीं है।” “मैं कैसे मान लूं कि शादी के बाद सब भूल चुकी हो तुम ? अगर भूल गई होती तो येयेयेलव लेटर यहां नहीं पड़ा होता। किसी कूड़ेदान में होता ये! अब ये बताओ कि हमारी शादी के एक साल हो गए हैं और इस एक साल के दरम्यान कितनी बार गई हो उस मयंक के पास ? कितनी बार", चेतन ने चिल्लाते हुए पूछा ? “तुम समझने की कोशिश करो ,चेतन” तभी चेतन बात काटते हुए चिल्लाया – “क्या ? क्या समझने की कोशिश करूं मैं ? ये लव लेटर; ये गिफ्ट्स ? (थोड़ी देर चुुप रहने के बाद) ...

फंस गए यार इसके चक्कर में ? और तेरा बाप तो सबसे बड़ा कमीना है। सालासब झूठ बोल के हमारी शादी करवा दी। मेरी तो जिंदगी ही बर्बाद हो गई यार!” ( वह सर पकड़ के बैठ गया।) रूपा से कुछ नहीं कहा जा सका। बरबस आंखों में आंसू आ गए। कैसे चेतन से कहे कि, हां! प्यार करती थी वो मयंक से , लेकिन उनकी शादी के लिए उनके घरवाले तैयार ना थे; और उसकी शादी चेतन से हो गई। लेकिन, चेतन ने उसे इतना खुश रखा को वो मयंक को भूल चुकी थी। आगे बढ़ गई थी वो जिंदगी में। शादी के बाद मयंक से मिलना तो दूर ,बात भी नहीं हुई थी उससे –

आखिर दोनों ने मिलकर फैसला जो किया था कि जिंदगी में कभी - दूसरे के लिए मुसीबत नहीं बनेंगे; दोनों एक दूसरे की जिंदगी से दूर हो जाएंगे और दोनों के बीच कोई कॉन्टेक्ट भी नहीं रहेगा। शुरुआत में तो थोड़ी मुश्किल आई, लेकिन रूपा ने सारी बातों को भूलकर आगे बढ़ने में ही भलाई समझी और चेतन को अपना सबकुछ मानकर जिंदगी को जीने लगी। अब ना जाने ये मयंक का जिन्न फिर कहां से निकल आया ? शायद कुछ लेटर्स थे जो उसके अलमारी में किसी किताब के बीच पड़े हुए थे। उन्हीं लेटर्स में उन गिफ्ट्स का जिक्र था। शायद कुछ खोज रहा था चेतन, तभी ये किताब उसके हाथ लगी और ये सीन बन गया घर का! रूपा ने चेतन को समझाने का यत्न किया पर चेतन कुछ समझने को राज़ी न था। उसने अपने घर में मां – पापा को भी ये बातें बता दी और अपने ससुराल में भी हंगामा मचा दिया। चेतन कितना कुछ सोचा था अपनी शादी की पहली सालगिरह को खुशनुमा बनाने के लिए! दोनों तैयार हो रहे थे - आउटिंग और लॉन्ग ड्राइव के लिए; लेकिन सब तैयारियों, योजनाओं और सपनों पर पानी फिर गया! चेतन ने आनन- फानन में पंचायती भी बुलवा ली, जिसमें अपने घर के लोगों के अलावा ससुराल के लोग भी थे और उसने रूपा के मोबाइल से मयंक को भी बुलाया था! एक बड़े होटल में बैठक हो रही थी। बहस, आरोप – प्रत्यारोप का दौर जारी था।

चेतन और उसके घरवाले रूपा और उसके घरवालों पर धोखाधड़ी के आरोप लगा रहे थे, तो वहीं रूपा के घरवाले रूपा के ऊपर प्रताड़ना का केस बना रहे थे। हालांकि, दोनों इस बात पर राज़ी थे कि शादी से पहले रूपा के संबंध मयंक से था, लेकिन रूपा के घरवाले जाति को लेकर शादी को मना कर दिए थे। रूपा की शादी चेतन से हुई। दोनों खुश थे शादी से, लेकिन शायद रूपा की पिछली जिंदगी उसे छोड़ने को तैयार न थी! बैठक में मयंक चुपचाप उनके बहस और झगड़े को सुन रहा था। सफेद कमीज, काली पैंट के साथ काले रंग का सूट; ऊपर से काली बेल्ट, चमड़े के जूते, काली फीते की घड़ी और एक चश्मा – पहनावे से लग रहा था कि, वो या तो अच्छी नौकरी करता है, या फिर अच्छा बिजनेसमैन है। रूपा उसके तरफ एक बार देखी और फिर चुपचाप दोनों घरों के पंचायती को देखने – सुनने लगी। मयंक ने भी उसकी और देखा, लेकिन कोई भाव नहीं थे उसके चेहरे पर। अब तक दोनों की नजरें नहीं मिली थीं। तभी चेतन मयंक की ओर देखते हुए उसपर तंज कसा – ये देखो जनाब को, लग रहा है जैसे खुद की शादी में आये हैं- सूट बूट में! इस ख्वाब में आए थे कि रूपा अब उनकी होने ही वाली है (चेतन के चेहरे पर कुटिलता भरी मुस्कान थी)! मयंक ने कोई जवाब नहीं दिया। चेतन बोलता रहा –“ जा रूपा, चली जाओ अपने आशिक़ के बाँहों में !”

तभी रूपा के पापा ने आपत्ति जताई – “ये क्या मज़ाक है चेतन बाबू, कोई अपनी पत्नी को ऐसे बोलता है क्या – वो भी उसके पिता के सामने ?” तब तक चेतन के पिता ने कहा – “गलत क्या बोल रहा है चेतन ? सच कुछ ज्यादा ही कड़वी लग रही है क्या समधी जी ?” रूपा की आंखें भर गई। वो कितनी बदनसीब थी कि उसके सामने उसके पिता की इज्ज़त तार-तार हो रही है और वह कुछ कर नहीं पा रही – कसूर तो उसका ही था! फिर चेतन मयंक की ओर थोड़ा चिल्लाते हुए बोला – “ "अबे, सुन। ले जा अपनी इस अधूरी मोहब्बत को और आज के बाद मनहूस चेहरा मत दिखाना, वरना गोली मार देंगे तुम दोनों को हम! वैसे भी तुमको आदत होगी जूठा खाने की; पर मुझे मेरे घर वालों ने कभी जूठा नहीं खिलाया। ... शायद तुम्हारे घरवालों ने खिलाया होगा। ले जाओ इस जूठे को (उसने रूपा की ओर इशारा किया)।" ये सुनते ही रूपा के पापा भड़क गए – “चेतन बाबू, आप लिमिट को पार कर रहे हैं। इससे ज्यादा आगे कुछ बोलने से पहले अंजाम सोच लीजिएगा.” चेतन के पिता ने बात काटते हुए – “क्या अंजाम! क्या कर लेंगे आप ? धमकी दे रहे हैं हम लोगों को ?” तब तक चेतन चिल्लाया-

“आप चुप रहिए ससुर जी! मज़ाक बना दिए है मेरी जिंदगी का आप लोगों ने। मेरी जिंदगी तो बर्बाद हो गई ना आपकी वजह से! (फिर मयंक की ओर देखते हुए) और इस जैसे कमीने को तोअरे! अगर थोड़ी भी शरम होती तो चुपचाप बैठानहीं रहता। मां – बाप भी सोचते होंगे क्या नामर्द बच्चा जना है उन्होंने. तड़ाक. एक झन्नाटेदार थप्पड़ पूरे कमरे में गूंज उठा! मयंक ने इतनी फुर्ती से हाथ चलाया की किसी को सोचने तक का मौका नहीं मिला! जबतक उसका दूसरा हाथ चेतन पर उठता; रूपा ने उसका हाथ पकड़ लिया। लाल–लाल आंखें तरेरते हुए उसने कहा- “तुम समझते क्या हो अपने आप को ? तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे पति पर हाथ उठाने की ? अगर फिर से ऐसी जुर्रत की ना मयंक, तो मैं भूल जाऊंगी कि तुम कभी मेरे दोस्त थे!” मयंक ने चेतन को कहा – “बहुतबहुत प्यार करते हैं हम रूपा से। आज ये तेरे खातिर मुझे भूल गई तो क्या; मैं तो नहीं भूल पाया ना! तुमने मुझे गाली दी- माफ किया ; मेरे संस्कारों को गाली दी-

माफ किया, लेकिन तुमने रूपा को गाली दिया – मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ! लेकिन, ये बात तो तय है कि, अगले बार से जब भी कभी तुम किसी नारी का अपमान करोगे, ये थप्पड़ और ये रूपा का हाथ तुम्हें जरूर याद आयेगा। जिस नारी का तुम भरी सभा में अपमान कर रहे थे, उसी नारी ने तुम्हें बचाया, क्योंकि उसके लिए तुम पति नहीं, सबकुछ हो। और रही बात जूठे खाने की, तो हां मैंने जूठे खाए है – अपने मां बाप के, और इसका कोई दुःख नहीं है मुझे, गर्व है। काश! तुम भी जूठे खाए होते अपने मां बाप के ,तब शायद इतनी अक्ल जरूर होती की बड़ों का सम्मान कैसे किया जाता है और नारी की इज्ज़त कैसे की जाती है! लगता है तेरे बाप ने भी कभी जूठा नहीं खाया। एक बात और, मुझे पता नहीं तुझे घमंड किस बात का है; लेकिन तेरा घमंड तो मेरे एक थप्पड़ ने ही तोड़ दिया – मेरे बारे में जनोगे तो पता नहीं तेरा क्या हश्र होगा ? मैं तो जा रहा हूं, लेकिन ये वाकया तुझे हमेशा याद रहेगा कि किसी ने तेरा गुमान भरी सभा में एक थप्पड़ से तोड़ दिया, लेकिन उसी गुमान को किसी के हाथ ने बचा लिया।" यह कहते हुए वह सर झुकाकर, आंखों को पोंछते हुए कमरे से निकलने लगा। तभी, अचानक सामने से वह वेटर से टकरा गया ,

और ट्रे में रखा गिलास का पानी उसके ऊपर गिर गया। वेटर ने उसे देखा तो विस्मय-पूर्वक कहा – “सर, आप! सलाम सर(उसने मयंक को सलामी ठोकी)। सर, सॉरी सर। सर आप पहले बता देते..” मयंक ने उसके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुरा कर चल दिया। सभी आश्चर्य से दोनों को देख रहे थे! पता चला कि इस होटल का मालिक मयंक ही है! सबके पैरो तले जमीं खिसक गई। वे बाहर आए। नीचे देखा – मयंक एक काफ़ी महंगी गाड़ी के पास खड़ा था और दो लोग उसके सूट को खोलकर उसे दूसरा सूट पहना रहे थे! थोड़ी देर बाद मयंक अपनी कार में बैठकर चला गया।                                                        --------- दिन बीता, समय बीता, महीना - साल बीत गया। सुबह के 9 बज चुके थे कि दरवाजे की घंटी बजी। मयंक अभी तक सो रहा था। “कौन है यार इस टाइम”- उसने नींद में ऊंघते हुए कहा! “आ रहा हूं यार” – उसने अपनी बात पूरी की और दरवाजा खोला। “सर, आपके लिए कुरियर है” – डिलीवरी बॉय ने कहा। मयंक ने साइन कर के उस समान को लिया। खोला तो एक कार्ड था, जिसपर अँँग्रेजी में लिखा था – सॉरी! रियली सॉरी फॉर माई मिसबिहवियर & थैंक यू फॉर शोइंग मी राइट पाथ! मी एंड माई वाइफ रूपा आर वेरी हैप्पी & वी आर सेलीब्रेटिंग सेकेंड मैरिज एनिवर्सरी टुडे! कैन वी मीट टुगेदर टुडे ईवनिंग शार्प 7 @CCD ? Chetan मयंक मुस्कुरा उठा और मन ही मन बोला- “ओके!” फिर वो उत्साह से दिन की शुरुआत करने चला गया। लगा जैसे सुबह तो आज ही हुई है इतने दिनों के बाद।    


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