Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Inspirational


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Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Inspirational


स्वाभिमानी

स्वाभिमानी

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रोहतक जिले में राजू नाम का एक गरीब लड़का रहता था। उसके पिता जी नगरसेठ स्वार्थदास के यहां एक माली का काम करते थे। स्वार्थदास एक घमंडी और अहंकारी व्यक्ति था। वह गरीबों को अपने पैरों की जूती समझता था। एकबार राजू भी अपने पिता के साथ स्वार्थदास के बंगले पर चला गया।

भूलवश राजू से वहां एक पॉट टूट गया। दुर्भाग्य से स्वार्थदास वहीं था। उसने राजू को बड़ा डांटा। ये विलायत से आया हुआ था। पैसा कौन तेरा बाप देगा। तेरा बाप बिक भी जायेगा तो इसका मूल तो छोड़ सूद भी नही दे पायेगा। राजू के पापा स्वार्थदास के चरणों मे गिरकर माफी मांगने लगे।

स्वार्थदास ने उन्हें ठोकर मारकर बंगले से बाहर भगा दिया। राजू उस दिन अपने पापा के छाती पर सर ऱखकर ख़ूब रोया। राजू के पापा बोले, बेटा तू पढ़लिखकर बड़ा आदमी जरूर बनना। इस दुनिया मे ग़रीब होना गुनाह नही है, गरीब मर जाना सबसे बड़ा गुनाह है। स्वार्थदास के दिये हुए अपमान से कुछ दिनों बाद ही राजू के पापा की मृत्यु हो गई। इधर स्वार्थ दास को कोई माली नही मिला।

वह अपनी कार लेकर राजू के घर पर आया। सबको लगा की सेठजी राजू को सांत्वना देने आये है। पर नही वह तो माली लेने आये थे। स्वार्थदास बोला, ए रे छोकरे तेरा बाप तो मर गया है। तू मेरे घर चल माली का काम करना, तुझे दो वक्त की रोटी मिल जायेगी। राजू बोला नही सेठजी में पढूंगा और बड़ा आदमी बनूँगा। स्वार्थदास ने राजू के लात मारी, गरीब कहीं का। तेरा बाप गरीब था, गरीब ही मर गया। तू भी गरीब पैदा हुआ, गरीब ही मरेगा। स्वार्थदास वहां से यह कहकर राजू को लात मारकर चला गया। इधर राजू ने पढ़ने का संकल्प तो ले लिया।

पर उसे बहुत सी समस्या का सामना करना पड़ा। कभी वह 2-3 दिन भूखा रहता पर किसी के आगे हाथ नही फैलाता था। वह रात को होटल पर गिलासे धोता, सुबह पढ़ाई करता। गर्मियों की छुट्टियों में कुल्फी बेचता। इस तरह वो अपनी पढ़ाई करते-करते 12 वीं उतीर्ण हो गया। विनय सर राजू की मेहनत व स्वाभिमान से बहुत प्रभावित थे। वो हमेशा उसे मदद की पेशकश करते, पर विनय हंसकर मना कर देता। सर ये सँघर्ष और दुःख ही मेरी प्रेरणा है,

यदि ये छूट जायेंगे तो में निकम्मा और आलसी बन जाऊंगा। इधर विनय सर उसका बिना बताये उसका ख्याल रखते थे। राजू ऐसा करते-करते स्नातक की परीक्षा पास कर ली। राजू का लक्ष्य आईपीएस बनना था। यह केवल स्वयं राजू एवं विनय सर को ही पता था। बड़ी मिन्नते करने के बाद राजू दिल्ली आईपीएस की तैयारी के लिये गया। सारा पैसा विनय सर ही लगा रहे थे। राजू नही मान रहा था तो विनय सर ने कहा बेटा नौकरी लगने के बाद मेरा पैसा सूद समेत चुका देना।

1 साल में ही अथक मेहनत से राजू ने प्रथम प्रयास में ही आईएएस की परीक्षा उतीर्ण कर ली। सौभाग्य से उसका पदस्थापन आईपीएस के रूप के रोहतक जिले में ही हुआ। राजू सर्वप्रथम विनय सर के घर गया। उनके चरण स्पर्श किये। विनय सर ने उसे उठाकर अपने गले लगाया। दोनों की आंखों से गंगा-जमुना बहने लगी। राजू बोला सर ये सब आपकी वजह से मुमकिन हुआ। विनय सर बोले नही बेटा ये सब तेरी मेहनत, दृढ़-संकल्प, स्वाभिमान की वजह से हुआ। इधर स्वार्थदास का सारा व्यापार चौपट हो गया। उसके बेटे की गलतो आदतों से उसका मकान, ज़मीन-जायदाद सब बिक गया।

वह दर- दर भीख मांगने लगा। एकबार राजू अपनी कार में जा रहा था, भिखारी बना स्वार्थदास उससे टकरा गया। राजू स्वार्थदास को पहचान गया। वो उसे अस्पताल ले गया। उनका इलाज करवाया। जब स्वार्थदास ठीक हो गया, तो राजू ने अपना परिचय दिया, सेठजी में वहीं गरीब माली का लड़का हूं, जिसे आपने लात मारी थी। आज में इस शहर का आईपीएस ऑफिसर हूं। आपने मेरे साथ गलत व्यवहार किया था, पर सेठजी में ऐसा नही करूँगा। मेरे पिता नही है, आज से आप मेरे पिताजी हो औऱ में आपका बेटा। इधर स्वार्थदास की आंखों में आंसू बहने लगे। वो बोले बेटा मुझे माफ़ कर दो। आदमी को अहंकारी नही स्वाभिमानी होना चाहिये, बिल्कुल बेटा तेरी तरह।


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