सुनो,,फिल्म देखने चलोगी,,
सुनो,,फिल्म देखने चलोगी,,
फिल्म देखते देखते उसने मेरे हाथो को पकड़ लिया। उसके मर्दों वाले हाथ मेरे नर्म हाथो पर पड़ते ही मैं सिहर गई। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा। मेरी सास भी तेज होने लगी। एसा पहली बार था जब किसी लडके ने मेरा हाथ पकडा था।
मुझे अच्छा भी लग रहा था इसलिए मैं अपना हाथ हटाना नहीं चाह रही थी, पर शर्म भी आ रही थी। और डर भी लग रही थी कि कहीं किसी ने देख लिया तो इसलिए मैं अपना हाथ धीरे धीरे पीछे खींचने लगी। मगर उसने मेरे हाथो पर अपने हाथो की पकड़ मजबूत कर दी।
मैंने उसे देखा और नजरो ही नजरो मे मेरा हाथ छोड़ने का इशारा किया। मगर उसने इशारे से मुझे इंकार कर दिया। मेरा ध्यान अब फिल्म देखने मे नही लग रहा था। मैं बस उसके हाथो के स्पर्श को मेहसूस कर रही थी।
फिर वो मेरे करीब आके धीरे से मेरे कानो मे बोला,इजाजत हो तो क्या मैं तुम्हें kiss कर सकता हूं,,,,,,?
मैं तो उसकी बात सुनकर के शर्मा गई और अपने दुपट्टे मे मुह छुपा लिया। फिर उसने अपने हाथो से मेरे चेहरे से दुपट्टे को हटाया और कहा, शर्माते हुए तुम और भी खूबसूरत लगती हो,,,।
तभी उसके भाई ने उससे कहा, भैय्या भाभी की तारीफ अगर कर ली हो तो थोड़ा movie भी देख लो,,,,,। ये सुनते ही उसने तुरंत मेरे हाथो को छोड़ दिया। और मूवी देखने लगा। मुझे उसकी इसी हरकत पर हँसी आ गई।
मेरा नाम रिया है। मैं अपने परिवार के साथ कानपुर मे रहती हू। मेरे दादा जी का घर सहारनपुर मे है। पापा की गवर्नमेंट जॉब है तो पोस्टिंग कानपुर मे है इसलिए हम लोग कानपुर मे रहते है।
मेरे पापा की एक छोटी बहन भी है ।जिनकी अभी शादी नहीं हुई है । वो दादा दादी के साथ ही रहती है। लेकिन आज शाम को दादा जी का फ़ोन आया था, वो बोले कि बुआ की शादी तय हो गई है तो आ जाओ।
हम सब उसी लिए सहारनपुर आए हुए थे।
शादी जैसे जैसे नजदीक आ रही थी ।कुछ दूर के मेहमान भी शादी अटेंड करने पहले ही आ गए थे। जिसमें से एक दादा जी के best friend का बेटा ,यानी हमारे लखनऊ वाले अंकल भी थे।
उनका एक बेटा भी था रचित। बचपन मे जब मैं छुट्टियों मे दादा जी के घर जाती थी तो रचित भी अपने दादा के घर आता था । हम दोनों के दादा का घर बगल बगल ही था तो हम लोग साथ मे खूब खेला करते थे।
मगर आज इतने दिनों बाद जब मैंने उसे देखा तो मैं उसे पहचान ही नहीं पाई की ये वहीं रचित है जो बचपन मे गन्दा सा रहता था। उसकी नाक हरदम बहती रहती थी । मगर आज तो वो इतना handsome लग रहा था और बहुत गोरा भी हो गया था।
वो मेरे पास आकर बोला, तुम छिपकली हो ना,,,,। मुझे तो उसकी बात सुनकर ही गुस्सा आ गई। क्योंकि अब मैं बड़ी हो गई थी और फिर इतने मेहमानों के सामने एसे कौन पूछता है,,,,,? फिर मैंने भी उससे पूछ लिया, तुम भी चमगादड़ हो ना,,,,,,। तो वो बोला, ओ हेल्लो, अब मैं बड़ा हो गया हू समझी छोटी बच्ची,,,,,। मुझे भी उसकी बात सुनकर गुस्सा आ गई तो मैं बोली, hight बढ़ जाने से कोई बड़ा नहीं हो जाता और मैं भी कोई छिपकली नहीं हू,,,,समझे,,,,,।
हमे एसे बाते करते देख दादा जी ने हस के कहा,इन दोनो की लड़ाई करने वालीं आदत अभी भी नहीं गई,,,,,बचपन मे भी दोनों एसे ही लड़ते ज्यादा थे और खेलते कम थे। इधर आओ रचित और रिया।
फिर हम दोनों दादा जी के पास गए तो वो बोले कि अब दोनों बड़े हो गए हों इसलिए लड़ाई झगड़ा बंद करो और दोस्त बन जाओ,,,समझे।।।
मगर मुझे वो चमगादड़ बिल्कुल पसंद नहीं था। पूरी शादी मे हमेशा मुझे परेशान करने के बहाने ढूंढता रहता था। और मुझे चिढ़ता रहता था ।लेकिन मैं भी कहा कम थी। मैं उसे परेशान करने मे कोई कसर नहीं छोड़ती थी।
मगर झगड़ते झगड़ते कब वो मुझे अच्छा लगने लगा मुझे पता ही नहीं चला। और हमारा झगड़ा प्यार मे बदल गया। शादी के बाद बुआ जी अपने ससुराल चली गई थी। कुछ मेहमान भी उसी दिन वापस अपने घर चले गए थे। लेकिन रचित की फॅमिली अभी रुकी हुई थी। और हम सारे बच्चे घर मे बोर हो रहे थे। तो सबने सोचा कहीं घूमने चलते है। मगर कहा जाते? फिर रचित मुझसे आके पूछा, फिल्म देखने चलोगी,,,,,? तो मैंने भी हा कह दिया। अब रचित था वहां के लड़कों की गैंग का लीडर,,उसने जो कहना था सब वहीं करते,,। तो फिर हम सारे बच्चे एक साथ फिल्म देखने गए थे। रचित मेरे बगल ही बैठा था। और उसने अंधेरे मे चुपके से हाथ थाम लिया।
अब अगले साल हमारी शादी है,,,,। और फिर से सब इसी तरह घर मे इकट्ठा होगे। पर अगली बार मैं लौट के अपने बनारस वाले घर नहीं ब्लकि लखनऊ वाले घर जाऊँगी रचित के साथ,,,,,।

