Dr. Poonam Gujrani

Abstract

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Dr. Poonam Gujrani

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सत्य की खोज

सत्य की खोज

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अजीब कशमकश थी गिरीराज के मन में ।रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी पर उसकी आंखों में अंश मात्र भी नींद नहीं थी। वो सोच रहा था- क्या कर राहा हूं मैं .... क्या करना चाहिए मुझे....जिन गुत्थियों को सुलझाने के लिए घर छोड़कर निकल गया था क्या उनमें से एक भी सुलझ पाई है .... या कि इस सुलझाने के चक्कर में कुछ ओर ही उलझ गई है.... । क्या है जीवन ..... क्या पाना चाहता हूं मैं..... क्या पाना और खोना हमारे वश में होता है.... क्या मेरी यह देह कठपुतली मात्र है .... किसके इशारों पर नाच रही है ये......कौन सी अदृश्य शक्ति है जो दिखाई नहीं देती पर संपूर्ण सत्ता पर इस तरह काबिज रहती है कि एक पत्ता भी उसकी मर्जी के बिना नहीं हिलता.... फिर हम...हम क्यूं कोशिश करते हैं कुछ अलग-थलग करने की .... क्या है सत्य ....क्या है सत्य की परिभाषा.... कोई तो बताए ....। कहते हैं सबका सत्य अलग-अलग होता है ..... अपना सत्य खुद तलाश करना होता है.... हां सत्य की तलाश में ही तो निकाला था घर से। पिछले सोलह सालों से क्या नहीं किया उसने। प्रार्थना, उपासना, सेवा, त्याग, तपस्या, वो सब जो गुरु ने बताया ,वो सब जो ग्रंथों में पढ़ा पर पूर्ण सत्य तो क्या अर्द्ध सत्य तक भी नहीं पहुंच पाया।


भगवान बुद्ध की तरह ही तो निकाला था घर से.... पत्नी और बेटे को छोड़कर ....मुड़कर नहीं देखा क्या हुआ उनका.... मोह के धागों को पूरी तरह समेटकर कहीं दूर फेंक आया था। माता- पिता , परिवार , धन संपत्ति कोई नहीं रोक पाया उसके पांव .... फिर आज ,आज मन क्यों विचलित हो रहा है । जिन परछाइयों से वो भाग रहा था क्या वो हमेशा से साथ ही चल रही थी जो अब काल की रोशनी में साफ- साफ दिखाई दे रही थी। क्या भगवान बुद्ध , भगवान महावीर, ईशा मसीह ने सचमुच पूर्ण सत्य को पा लिया था या फिर यूं ही कुछ कहानियां प्रचलित हो गई.... कैसे होते होंगे वे लोग जो सत्य को पा लेते हैं.... यदि पा लेते हैं तो फिर सबको बता क्यों नहीं पाते.... अजीब दुविधा है....न कुछ निगलते बनता है न उगलते.....।


उठकर बैठ गया गिरीराज , पानी पिया और बाहर निकल आया। सड़क पर अब भी अंधेरा था। कभी-कभी कुत्तों के भौंकने या फिर किसी चौकीदार की सीटी उस निस्तब्धता को भंग रही थी। वो सड़क के किनारे-किनारे धीरे-धीरे चलने ‌लगा। जैसे सड़क को नहीं पता कि वो कहां जा रही है उसे भी नहीं पता कि उसे जाना कहां है। बस पांव जिधर मुड़ जाते उधर ही मुड़ जाता वो।


देर तक चलते-चलते थकने लगा तो एक पेड़ के नीचे बैठ गया।अब सूर्योदय में कुछ ही समय शेष था। गायों के रंभाने की आवाज आ रही थी , चिङ़ियों कि चहचहाट शुरु हो गई थी, मंदिरों से शंखनाद का स्वर आ रहा था, रेहङ़ी पर चाय बेचने वाले , साग-सब्जी के ठेले सङ़क पर दिखाई देने लगे थे पर उसकी आंखें सब देखकर भी अंजान थी वो वर्षों पहले जिस दुनिया को छोड़ आया था आज फिर वहीं जा खङ़ा हुआ था।


वो दिन आज भी याद है जब अपनी खुशहाल जिंदगी को तिलांजलि देकर उसने सत्य की खोज में दीक्षित होने का फैसला किया था। घर में कोहराम मच गया था। माता-पिता दूसरे शहर से आ गये, पत्नी और बच्चे की दुहाई दी , सन्यास में आने वाले कष्टों से आगाह किया , घन-संपत्ति का लालच दिया , घर में रहकर ही पुण्य करने की सलाह दी , दान, सेवा धर्म के बारे में समझाया। यह भी कहा की गृहस्थ जीवन सबसे कठिन तपस्या है इससे भागना कायरता है और गृहस्थ जीवन को पूर्ण समर्पण से जीने वाला सबसे बड़ा धार्मिक होता है । सन्यास लेने से बड़ा धर्म है गृहस्थी में रहते हुए खुद को पानी में खिले कमल की भांति निर्लिप्त रखना होता है। पत्नी से सात वचनों की दुहाई दी , बेटे की कसम , उसके भविष्य का वास्ता दिया.....नाते- रिश्तेदारों, दोस्तों सबने समझाया....पर मेरी आंखों पर भगवा वस्त्र की कुछ ऐसी पट्टी बंधी थी कि मुझे सन्यास के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मुझे बस सन्यास लेना था..... भगवा वस्त्र पहनने थे.....सत्य की खोज करनी थी..... बुद्ध .... शुद्ध....और मुक्त होना था ....संसार के मायाजाल में अपने आपको मैं छटपटाता हुआ महसूस कर रहा था मैं।


पत्नी ने धमकियां भी दी। देखना तुम, मैं कभी तुमसे मिलने नहीं आऊंगी , न बेटे को आने दूंगी , और अगर तुम कभी सन्यास से वापस लौटे तो घर में पांव भी नहीं रखने दूंगी।


उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। माता पिता की आंखों से झरते हुए आंसू दिखाई नहीं दे रहे थे। पत्नी की नाराजगी, प्रेम के कोई मायने उसके लिए नहीं रह गये थे। बेटे का मासूम चेहरा उसके पांव की जंजीर नहीं बन पाया ।कहते हैं जिस व्यक्ति को पीलिया हो जाता है उसे सब कुछ पीला ही दिखाई देता है ठीक वही हाल उसका था। उसे भी बस चारों ओर मोह का मकड़जाल दिखाई दे रहा था जिसे छोड़कर जाना था , पाना था परमानंद.....करनी थी सत्य की खोज.... एकाकार होना था ईश्वर के साथ....।


आखिर जब सब समझाकर थक गये तो दे दी इजाजत उसे सन्यास लेने की, सारी जंजीर खोलकर कह दिया - जा...., जी ले अपनी जिंदगी...अपने तरीके से....। उसने भी थोड़े ही समय में कारोबार समेटकर अपनी पत्नी के हाथों में सारी कमान संभलाई, कागजी कार्यवाहियों को पूरा किया , घन-संपत्ति, जमीन-बंगला सब पत्नी के नाम कर दिया, और इस तरह से व्यवस्था की पत्नी और बेटे की पूरी ‌जिंदगी आराम से चल सके । पत्नी को दूसरी शादी के लिए भी कहा पर पत्नी ने दो टूक जवाब दे दिया - आपको जहां जाना हैं जाएं, जो करना है करें, मैं आपकी जिंदगी में दखल नहीं दूंगी तो आपको भी मेरे जीवन में दखल देने का अधिकार नहीं है। 


 वो दीक्षा लेकर आ गया भारत नेपाल के इस सीमावर्ती गांव में। मन लगाकर शिक्षा ली, साधुओं के साथ रहने का ढ़ंग सीखा , लोगों को उपदेश देने के गुर भी हासिल किए। शुरुआत के चार-पांच साल आराम से बीत गए।


हर साल माता- पिता उससे मिलने आते । चार- छह दिन साथ रहकर लौट जाते पर पत्नी न कभी खुद आई और न ही कभी बेटे को मिलने भेजा। माता-पिता आते तो पत्नी और बेटे के बारे में बहुत सारी जानकारियां दे जाते , जितनी जानकारी दी जाती उससे ओर ज्यादा जानने को उत्सुक रहता था उसका मन....., कुछ बातें पूछ लेता पर कुछ मन में दबी रहती , पूछता भी कैसे ....साधु था और उसे साधु की मर्यादा का ध्यान भी रखना होता था।


पहले साल बताया था उन्होंने- कि उसकी पत्नी प्रेमा आजाद पंछी हो गई है। हम लोगों ने और उसके माता-पिता दोनों ने ही प्रेमा और पुनीत दोनों को अपने-अपने घर चलने के लिए कहा पर प्रेमा ने साफ मना कर दिया ।साफ शब्दों में कहा- "जिसे हमारी चिन्ता हो हमारे घर हमारे साथ आकर रह सकता है पर मैं अपना घर छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। न पीहर....न ससुराल... जिसे साथ निभाना था अगर वो नहीं है तो किसी और का क्या भरोसा....हम मां-बेटे गिरते-पड़ते खुद संभलना सीख जाएंगे। वैसे भी अब लड़कियां अंतरिक्ष तक पहुंच रही है , अपनी धरती अपना आसमां खुद तलाश रही है । ऐसे में मैं भी अपनी जिंदगी रो कर नहीं, हंसकर जीना चाहती हूं। बेटे को पढ़ना है , काबिल बनाना है, यही मेरी जिंदगी का उद्देश्य है। मैं अपनी जिंदगी अपने ढ़ंग से जीना चाहती हूं। जब गिरीराज को नहीं रोक पाये तो अब मुझे कुछ कहने का हक भी खो चुके हैं आप लोग"।


गिरीराज के मन में कुछ चटक सा गया था। प्रेमा ऐसी तो नहीं थी ....पर क्या कहता और क्या करता ....उसे कुछ कहने-सुनने या करने का कोई हक भी तो नहीं था।


अगले साल बताया उन्होंने प्रेमा ने अपने सीधे हाथ पर टेटु बनवाया है बङी स्टाइल से लिखा है- फ्रीडम। अब वो जींस टॉप पहनने लगी है , एक क्लब की मेम्बर हो गई है , खुद गाड़ी चलाती है, स्वीमिंग, कराटे जाने क्या-क्या सीख रही है। गिरीराज का मन होता प्रेमा सामने आये तो इस बारे में जवाब तलब करें पर उसकी अनुपस्थिति में सिवाय मन मसोसने के कुछ नहीं किया जा सकता था।


बाद में मालूम हुआ कि वो एक बुटिक चलाने लगी थी, फ़ैशन शो का आयोजन करती है,क्लब की गतिविधियों में हिस्सा लेती है शहर भर के लोग जानते हैं उसे, बेटा बड़े स्कूल में पढ़ रहा है, बेटे को खूब होशियार बना रही है। गिरीराज के जाने के बाद प्रेमा एक ऐसी मजबूत औरत के रूप में उभर कर सामने आई जिसके बारे में गिरीराज तो क्या खुद प्रेमा ने भी कभी नहीं सोचा होगा। गिरीराज साधु होकर भी बहुत बार मन ही मन प्रेमा और पूनीत को याद करता इसके ठीक उल्ट बिल्कुल बिंदास , अपनी शर्तों पर जीने वाली प्रेमा कभी गिरीराज के बारे में नहीं सोचती । कोई उसके सामने अगर जिक्र भी करता तो वो- जो बीत गई वो बात गई कहकर हवा में उड़ा देती‌। प्रेमा ने कभी उससे किसी तरह का संपर्क नहीं साधा , न ही कभी मिलने आई।


कभी-कभी गिरीराज का मन होता जाकर देख आये अपने बेटे को, किसके जैसा लगता होगा वो, उसके जैसा या फिर अपनी मां जैसा, दो साल का छोड़कर आया था उसे, क्या बताया होगा उसकी मां ने उसे मेरे बारे में, अचानक कहीं मिल भी जाएं तो क्या हम पहचान पाएंगे एक दूसरे को....। समय अपनी गति से सरकता रहा। मोह के धागे उलझते-सुलझते और फिर उलझ जाते उसके चारों ओर। बहुत कोशिश करता सब भूलकर सिर्फ भगवान में मन लगाने की पर कहां ....कहां टिकता मन...मन तो हमेशा ही लगा रहता है कभी न खत्म होने वाली दौड़ में, छटपटाता रहता है अपने ही बनाए मकड़जाल में....।


पता नहीं कितने घंटे पेड़ से पीठ टिकाए बैठा रहा वो। पीठ अकड़ने लगी तो वहीं पर लेट गया। धूप अब चढ़ने लगी थी , पेट में दर्द सा महसूस हुआ तो याद आया कल से ही कुछ खाया नहीं है उसने। मन हुआ सामने की होटल में बैठकर खाना खा लेने का पर पैसों के बिना कौन खाना देगा और संन्यासी के पास पैसे भला कहां से आते। वो उठ खड़ा हुआ, ठिकाने पर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। वो घसीटते कदमों से चल पड़ा।


चारों तरफ अलौकिक पहाड़ी सौन्दर्य बिखरा पड़ा था। सूरज की किरणों से चमकती हुई बर्फीली पहाड़ियां, ऊंचे-ऊंचे वृक्ष , गीत गाती ठंडी-ठंडी पवन मन बहलाने के लिए काफी थी पर जब मन भटक रहा हो तो कोई सौन्दर्य काम नहीं आता और भूखा पेट भी सौन्दर्य से कहां तृप्त हो पाता है ।


गिरीराज बार-बार वही पहुंच जाता जहां नहीं जाना चाहता था। उसे याद आया - शुरू के चार-पांच साल उसे घर की इतनी याद नहीं आती थी जितनी आजकल आती है । शुरुआती दौर में सीखने-जानने और ईश्वर को पाने की धुन में सन्यास उसे कभी बुरा नहीं लगा। घर, प्रेमा, पूनीत को वो याद करता पर सर झटक कर सबको अलग भी कर देता पर जब समय सरकार महीनों से साल और साल से सालों में तबदील हो गया तब उसे समझ में आया कि ईश्वर नाम का झुनझुना बस बजाने के लिए है। इसे बजाते रहो, मुफ्त की रोटियां तोड़ते रहो और अपने-अपने शिष्य बनाकर उनसे सेवा करवाते रहो , गुरु बनकर अपने अहंकार को पोषण देते रहो , इससे ज्यादा सन्यास आपको कुछ देगा ये सोचना निरी मूर्खता लगने लगी थी उसे। जब संन्यासियों को पद, प्रतिष्ठा, मठ और धर्म के नाम पर लड़ाई करते देखता तो उसका मन कसैला हो जाता। प्रप्रंचों की इस दुनिया में जितने साधु थे उनमें से गिनती के साधु ही सुलझे हुए विचारों के थे और हकीकत ये थी उनको कोई पूछता तक नहीं था। पूछ उन्हीं की थी जो राजनीति करना जानते थे, जो संन्यासी के वेश में साम, दाम, दण्ड, भेद के ज्ञाता थे। गिरीराज इन परिस्थितियों के साथ अपना सामंजस्य नहीं बिठा पाया और बिल्कुल अलग-थलग पड़ गया। राजनीति वो कर नहीं पा रहा था और सत्य नाम की चिड़िया का कहीं कोई अता-पता नहीं था।


 चलते-चलते उसने देखा मठ दिखाई दे रहा था। भगवा वस्त्र पहने छोटे-बड़े साधु भगवा वस्त्र में खुद को लपेटे सड़क पर दिखाई दे रहे थे। साधु ,सन्यास, ईश्वर, सत्य, आदि के बारे में फिर से चिंतन चला पर वो समझ नहीं पाया सत्य क्या है , असत्य क्या है , इस जगत को मिथ्या क्यों कहा जाता है , ईश्वर यदि है तो मिलता क्यों नहीं है, आखिर कहां कमी रह गई उसके आचरण में.... उसने तो तन-मन से अपने आपको पूरी तरह समर्पित किया था सत्य की प्राप्ति हेतु ....फिर आज ....आज ये माया मिली न राम वाली स्थिति क्यों हो रही है....।

 

वो जितना सोचता उतना ही उलझता जा रहा था। उसका मन वितृष्णा से भर गया। बिना सोचे कि उसे कहां जाना है वो निरंतर चलता रहा। पेट की भूख ने उसे मठ में रोकने की भरपूर कोशिश की पर वो रुका नहीं। जाने कितनी देर चलता रहा। शाम होने को थी। सूरज अपनी सारी करामात दिखाकर कल की जादूगरी के लिए अपने साजो-समान लाने अस्ताचल की ओर बढ़ चला था। गिरीराज का मन बेकाबू था‌। क्या करे. . कहां जाए....। मठ से उसका जी उचट गया था और घर....घर कहां था उसका.... बरसों पहले घर छोड़कर ‌आया था, पूरी जिंदगी के लिए सन्यास धारण किया था, माता- पिता इस लोक को छोड़कर जा चुके थे। पत्नी और पुत्र किस हाल में , कहां है उसे जानकारी तक नहीं है, इतने सालों में वे कभी मुझसे मिलने तक नहीं आये ,अब कौन सा चेहरा लेकर वो घर जाएं , लौटने का कोई रास्ता उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

 

सांझ ढल गई थी। पंछी अपने-अपने घोंसलों में लौट चुके थे। काश! वो भी एक पंछी होता.... सोचते हुए उसने दीर्घ नि:श्वास छोड़ी। पता नहीं अचानक क्या हुआ कि धरती घूमती हुई प्रतीत हुई, आंखों के आगे अंधेरा छा गया, लड़खड़ा कर गिरा सीधे पहाड़ से तलहटी की ओर....।


बस...बस इसके आगे कुछ याद नहीं.....कब, कहां, कितने दिनों तक रहा उसे कुछ ख्याल नहीं ....जब आंख खुली तो स्वयं को अस्पताल में एक बिस्तर पर पाया। पत्नी और पुत्र सेवा में लगे थे। उनके चेहरे पर शिकायत का कोई भाव नहीं था। गिरीराज की नजर पत्नी के सीधे हाथ पर खुदे टेटु पर गई। जहां लिखा था - फ्रीडम।


उसे लगा सत्य उसके सामने ही है। सत्य की खोज के लिए सन्यास की आवश्यकता नहीं है। इसे शायद पत्नी ने पा लिया है ‌तभी तो वो तब भी खुश थी जब वो उसे छोड़कर सदा सदा के लिए चला गया था और आज भी खुश हैं जब वो लौटा है। उसने शायद बीते हुए कल को भूला दिया है और कल की चिंता करना छोड़ दिया है‌। वो अपने तन, मन, धन से वर्तमान को जी रही है। शायद यही है त्रैकालिक सत्य कि हम वर्तमान में जीएं । जिसे पाने वो वर्षों तक भटका वो ज्ञान तो उसके घर में ही था। उसके सामने- साक्षात....।



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