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Sangita Tripathi

Inspirational


3.7  

Sangita Tripathi

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स्त्री का दर्द

स्त्री का दर्द

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          "ये स्त्री ही होती है, जो असंख्य परेशानी झेल कर भी अडिग रहती है। सबसे तालमेल उसे ही बैठना होता है। स्त्री का दिल मजबूत होता है, कितने तिरस्कार, कितना उत्पीड़न झेल लेती है, फिर भी परिवार की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ती।"...माँ बोली...., इला बोली "पर माँ पांच साल से ऊपर हो गए, मै मानसिक यातना के साथ साथ शारीरिक यातना भी सह रही हूँ, कब तक ये सब चलेगा...।"


            "माँ तुम भी एक स्त्री हो.... तुम तो मेरी पीड़ा समझ सकती हो....।माँ चुप रही.... हमारे समाज का दुर्भाग्य... एक स्त्री दूसरी स्त्री की शत्रु होती है.।..... एकता तो सीखा ही नहीं इन स्त्रियों ने।... माँ की चुप्पी में इला को जवाब मिल गया। उसे फिर उस नरक में जाना पड़ेगा जिसे वो छोड़ आई थी। तीन और दो साल की बेटियों के संग वो कहाँ जाये....।"


            उधर माँ का दिल बेटी की तकलीफ से दुखी था.। पर वो मजबूर थी..., खुद बेटा -बहू के साथ रहती है, तो इतना अधिकार कहाँ की बेटी की पैरवी करें..। उन्हे लगा समझा बुझा कर वापस भेज देने में सबकी भलाई है। इला बिस्तर पर करवटे बदल रही थी, उधर माँ अपने बिस्तर पर.... 


               इला की शादी उसके पिता ने धूमधाम से की थी... बड़े लोग थे..यूँ तो इला के पिता भी खाते -पीते घराने के थे ।पर वे ज्यादा बड़े लोग थे। इला की सुंदरता और सुघड़ता देख उन लोगों ने स्वयं रिश्ता माँगा था। यहीं चूक हो गई.....। इला के पिता ने लड़के के बारे में पता नहीं किया, सोचा इतने बड़े लोग है। लड़का भी संस्कारवान होगा... पर जरुरी नहीं है की जहाँ धन है वहां संस्कार भी होगा। लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ नहीं रहती। 


              शादी के बाद ससुराल में कुछ दिन तो अच्छे से बीते..। सास -ससुर तो बहुत प्यार करते थे... पति ने भी कुछ दिन किया, फिर अपने असली रूप में आ गया ....... क्रोध आने पर दानव बन जाता था....। शायद कोई मानसिक बीमारी थी... जो दूसरों को दर्द दे खुश होता था। पहली बार जब हाथ उठाया था, तो उसे कोई रोक नहीं पाया...। फिर तो आये दिन की बात हो गई..। रात गुजरने के बाद सुबह पति माफी मांग लेता था....कुछ दिन बाद पता चला, पति के कई महिला मित्र है.। ... बात मित्रता तक होती, तो कोई बात नहीं थी,पर बात तो उन संबधों की थी, जो इला को मान्य नहीं था।.... सास -ससुर भी बेटे की असलियत जानते थे, तो चुप रहते थे...उनकी चुप्पी से इला बहुत आहत होती थी, पर कुछ बोल नहीं पाती थी.....। वो कई बार मायके आई, पर भाई भाभी, माँ उसे समझा कर वापस भेज देते थे... पिता इला को बहुत चाहते थे... बेटी की अवस्था के जिम्मेदार स्वयं को मानने लगे। इसी गम में वो चल बसे। 


             दो बेटियों को जन्म दे वो पति की नजरों में और गिर गई....कई बार वो उम्मीद से हुई पर लड़की का अंदेशा होते ही गिरा दिया जाता था। अपने तन -मन से तो वो आहत थी, पर बार बार इस पीड़ा से गुजरना, उसे तोड़ डाल रहा....। वो अजन्मी बच्चियां पूछ रही माँ.. मुझे क्यों नहीं आने दिया दुनिया में.... क्या तेरा आंचल इतना छोटा हो गया....। कैसे बताये, ना बच्चों.....माँ का आंचल नहीं, तेरे पिता की सोच छोटी हो गई....। कहने को सब पढ़े -लिखे है...। इस बार जब वो उम्मीद से हुई तो फिर वहीं सब दुहराया जाने लगा .... इस बार इला ने विद्रोह कर दिया।.... वो इस बच्चे को जन्म देगी चाहे कुछ हो जाये.... भले ही वो लड़की हो...। इस चक्कर में वो मायके आ गई थी। पर जिस भाई को वो शादी से पहले अति प्रिय थी... उसने भी भाभी के कहने पर आँखे फेर ली। 


            सुबह इला की आँख खुली तो देखा माँ का बिस्तर खाली था... इला उदास थी... हर रिश्ते से उसका विश्वास ख़तम हो गया...। अपना सामान बांधने लगी... क्या करेंगी यहाँ रह कर.... तभी माँ कमरे में आई बोली "सामान समेट लिया...।" बुझे मन से इला बोली "हाँ"......। "चल रिक्शा आ गया है... स्टेशन भी जल्दी पहुंचना है..।" इला ने सोचा कोई माँ इतनी निष्ठुर भी हो सकती है..। "मै अपनी बेटियों के लिए हमेशा खड़ी रहूंगी...।" भाई ने सामान रिक्शा पर रख दिया... तभी माँ भी कुछ सामान के साथ आई... भाई बोला "माँ आप कहाँ जा रही हो...?". "बेटे आज मेरी बेटी को मेरी जरूरत है... बहुत सह लिया उसने... उसके पिता होते तो उसे इस तरह नहीं छोड़ते...। मै इला को ले गांव जा रही हूँ और वहीं इसके साथ रहूंगी...गांव का घर और ज़मीन मै इला के नाम करने जा रही, ताकि इसे कोई कष्ट ना हो....। एक स्त्री, स्त्री का दर्द नहीं समझ पाई... पर एक माँ अपनी बेटी का दर्द समझ गई ...। अभी भी बहुत देर नहीं हुई...।"


           तीसरी बेटी...आई. एस . बन गई और आज माँ के पास आ रही.... बड़ी दोनों लड़कियां भी डॉक्टर बन गई....। लड़कियां किसी से कम नहीं होती है ...। रास्ते में जब अंधेरा घिरने लगे तो प्रकाश का पुंज खुद ही ढूढ़ना पड़ता है..। 


        

           


            


              


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