Sangita Tripathi

Inspirational


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Sangita Tripathi

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बचपन से पचपन का सफर

बचपन से पचपन का सफर

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           हाँ नीला आज पचपन की हो गई। तू सचमुच में पचपन की हो गई। बड़ी बहन यक़ीन ही नहीं कर पा रही थी। कल तक की छुटकी सी लड़की...आज बेटे बहू वाली पचपन की इस महिला से मेल नहीं खा रही। पर इंसान आज में खोया रहता... आज कब, कल में ढल गया, पता ही नहीं चलता... समय के रफ़्तार को कोई पकड़ नहीं पाया।

          दो चोटी वाली छुटकी... सब भाई बहनों से छोटी... सबकी लाडली। अठारह की होते होते... उसका भी विवाह कर दिया गया। सबकी लाड़ो...कब ससुराल में सामंजस्य बैठाते... काले बालों से चांदी के बालों में परिवर्तित हो गई। खुद भी नहीं जान पाई। बचपन से पचपन पर आ गई... ढेरों जिम्मेदारी निभाई और निभा रही। एक अच्छी गृहिणी बनने की चाह में। पर कितना भी कर लो... कुछ ना कुछ कमी सब निकाल ही लेते। सुबह से शाम तक दौड़ते भागते जिंदगी गुजर गई। आज अचानक नीला की जिंदगी ठिठक गई। क्या सच में पचपन की हो गई। सोच में गुम नीला.... बरसों पहले मायके की दहलीज में पहुँच गई।


           माँ की चिंता....छुटकी ने खाना नहीं खाया। छुटकी आई नहीं अभी तक सहेली के घर से, छुटकी, छुटकी... अनवरत आवाजें... स्नेह की, चिंता की, दुलार की वे आवाजें कहाँ खो गई। अब तो कोई उसकी चिंता नहीं करता... वहीं सबकी चिंता करती। अब छुटकी अपनी छुटकी की चिंता करती... ना जाने ससुराल में उसकी छुटकी कैसे रह रही। समय बदल गया। बेटी अब माँ बन चुकी थी.... और अपनी बेटी की चिंता ने उस माँ का अल्हड़पन ख़त्म कर दिया... अब एक दूसरी बेटी ने जन्म ले लिया।


             छुटकी यानी नीला ने अब अपना पचपन वाला दिल थाम लिया। अब वो बड़ी हो गई है, ऐसी भावुकता शोभा नहीं देतीं। पर नीला भी क्या करें उम्र तो बढ़ गई,...पर दिल तो बचपने में ही जीना चाहता। बचपना जो निश्छल होता है। बचपन जो बिंदास होता है.... जो जी आये करो.... नीला का भी मन करता अभी दौड़ कर जाये ठेले से आइसक्रीम ले ले... पर अब आइसक्रीम ठेले पर नहीं आइसक्रीम पार्लर में मिलती है... जहाँ लोग नजाकत से खाते है... उसके जैसा नहीं, जो अपना छोड़ दूसरे की आइसक्रीम खा जाती थी। पर अब तो कोई कहता है तभी आइसक्रीम खाती है। आखिर पचपन की हो गई ।बचपना कैसे दिखाये.।


            अब गोलगप्पे खाने का मन होने पर भी नकारना पड़ता है... अच्छा थोड़ी ना लगता है.. पके बाल ले कर, चटकारे ले गोलगप्पे खाये। पके बाल गंभीरता मांगते है... पर दिल तो पका नहीं अभी... अब नीला क्या करें। शायद उसकी उम्र की हर औरत ऐसे ही जीती है। अपनी खुशियों को रोक रोक कर। उम्र को महसूस कर खो देतीं अपनी चाहत।


           अरे भाई अब समय बदल गया। जो जी आये करो .. बच्चे कितना समझाते। माँ अपने पचपन के खोल से बाहर निकलो। अभी तो आप फ्री हुई हो... जी लो अपनी जिंदगी। बहुत दबा ली अपनी इच्छाएं.... अब और नहीं। हाँ अब नीला ने सोच लिया.. अब और नहीं। अब मन का करेगी। आखिर उम्र ही तो पचपन की हुई पर मन कहाँ हुआ। और नीला चल दी गोलगप्पे खाने। वहां दो लड़कियां खड़ी थी... नीला को देख आपस में इशारा किया .. पर नीला का मन अब बिंदास हो चुका था। क्या हुआ वो पचपन की हो गई। कहाँ लिखा की अपनी ख्वाहिशों को मारो। और नीला अपनी उम्र के हर औरत को बताना चाहती है.... जी लो अपनी जिंदगी सखियों... दिन लौट कर नहीं आते। कर लो मन की..। कोई नहीं आयेगा तुम्हें समझाने... खुद ही समझ लो जिंदगी जीने का तरीका।


       


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