सोने के दिन, चांदी की रातें
सोने के दिन, चांदी की रातें
मनीषा अक्सर काव्या को छेड़ती रहती थी। और काव्या कभी तो मुस्कुराती और कभी शर्म से लाल बहूटी बन जाती
आज फिर मनीषा काव्या को चिढ़ाने के मूड में थी।
" ननदरानी! कुछ तो लिहाज करो, अम्मा बाबुजी और सुमित क्या सोचेंगे! "
काव्या ने परदे की ओट में जाकर इशारा किया।
पर वह कहां माननेवाली थी। उसे अपनी नई नवेली शर्मीली सी भाभी को छेड़कर मजा जो आता था।
तो काव्या के इशारे से मना करने के बावजूद भी बोलने से नहीं चुकी वह।
उसने यानि मनीषा ने काव्या को फिर से छेड़ा,
" अरे...!मनीषा को नहीं जानते आप...?"
लीजिए, मैं तो आपको बताना ही भूल गई।
चलिए इस श्रीवास्तव परिवार से आपका संक्षिप्त परिचय करवा देते हैं।
दिनेश श्रीवास्तव जी एक रिटायर्ड सरकारी मुलाजिम हैं और उनकी पत्नी बीना देवी एक सीधी सादी घरेलू महिला हैं। उनके चारों बच्चों में मनीषा और मोहित की शादी हो चुकी है और रोहित और तनीषा अभी कॉलेज में पढ़ रहे हैं।
मनीषा अभी मायके आई हुई है और अपनी भाभी काव्या से हँसी मज़ाक करती रहती है।
तो.... मनीषा अब भी काव्या को छेड़ते हुए कह रही थी,
"सुनो काव्या भाभी! अच्छा मौका है, आज जी भरकर निहार लेना अपने सजना को। खूब रज के शृंगार करना। हम सब चले। अब तो फूल प्राईवेशी मिलेगी। तो... तो...!"
बोलते हुए ननदरानी काव्या के गाल सहलाते हुए शरारत से मुस्कुराई।
थोड़ी देर बाद काव्या ने सास ससुर को प्रणाम किया तो ननदरानी फिर बोल पड़ी,
"मैं रिश्ते में बड़ी हूं तो मेरे भी चरण स्पर्श करो बालिके!"
जैसे ही काव्या नीचे झुकी, वह बोल पड़ी,
"दूधो नहाओ, पुतो फलो। मुझे जल्दी से एक भतीजा लाकर दो!"
काव्या उससे ऐसी ही किसी शरारत की उम्मीद कर रही थी।
तभी उसकी नज़र मोहित से टकराई और काव्या की आंखों में कई ख्वाब सज गए।
मोहित ने ना जाने आंखों से क्या इशारा किया कि ... काव्या की निगाहें शर्म से झुक गईं।
थोड़ी देर बाद सब रवाना हो गए।
मोहित भी उनके साथ उन्हें स्टेशन पहुंचाने के लिए निकल गया।
इधर काव्या के अरमानों को तो जैसे पँख ही लग गए थे।
आज वह खुद को सजाने संवारने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहती थी।
ड्रेसिंग टेबल के पास खड़ी वह सोच रही थी कि...
"आज की शाम तो बेहद खास है। मैं कैसा हेयर स्टाइल बनाऊं? बन बनाऊं या बाल खुले रखूँ? "
काव्या तब से कितने तो हेयर स्टाइल चेंज कर चुकी थी। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आज अपने आपको संवारने में वह कोई कसर नहीं रहने देना चाहती थी।
आज की शाम उसके लिए बेहद खास जो थी।
उसने बड़ा ही प्यारा रोमांटिक गाना लगा रखा था।
हवा में मधुर गाने की स्वर लहरी गूंज रही थी। और काव्या के कान में अमृत सा घोल रही थी। चंद घंटों बाद होने वाली उस मुलाक़ात का सोचकर वहबार बार सिहर जाती तो कभी लरज़ जाती।
उसे ऐसा लग रहा था कि वह मोहित से पहली बार मिलने वाली है और उसका इंतज़ार कर रही है।
सजा संवारकर ज़ब उसने खुद को आईने में देखा तो उसे खुद पर ही प्यार आ गया।
कितनी प्यारी लग रही थी आज काव्या।
अगर मोहित देख ले तो....
सोचकर वह शर्म से लाल बहूटी बन गई।
मोहित बस सबको स्टेशन पहुँचाकर आता ही होगा।
सोचकर एक बार फिर उमंग से भर उठी काव्या और गुनगुनाते हुए उसके हाथ तेज़ी से कलछी चलाने लगे क्योंकि अब हलवा पककर तैयार था। अभी थोड़ा सा दूध और सूखे मेवे डालकर चलाना भर था। ज़रा सा भी चूक हो जाती तो नीचे कड़ाही की तली से चिपक जाता और फिर जलने की संभावना थी। इसलिए काव्या के हाथ जितनी तेज़ी से चल रहे थे, उसका मन उससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से अतीत का विचरण कर रहा था।
काव्या और मोहित की शादी को अभी मात्र चार महीने ही हुए थे। संयुक्त परिवार में रहते हुए उन्हें रोमांटिक माहौल कम ही मिल पाता था।
हनीमून के बाद वांछित एकांत उन्हें नहीं मिल पाया था।
वैसे उसके सास ससुर आधुनिक विचार के थे। पर घर में कॉलेज जानेवाले देवर और ननद भी थे सो काव्या का मन लग जाता था। अभी बड़ी ननद आई हुई थी जो बहुत मजाकिया थी। और काव्या को जब तब छेड़ती रहती थी।
कुल मिलाकर काव्या अपनी जिन्दगी के उन दिनों को जी रही थी जब लगभग हर दिन मधुमास का सा एहसास कराता है। जब सोने के दिन और चांदी की रातें जैसा आभास होता है।
हां... अन्य नवविवाहितों की तरह उसका भी मन करता था कि कभी उसे और मोहित को पूरा एकांत मिल पाता।
उसकी बड़ी ननद जबसे आई थी उसे छेड़ ती रहती। इससे काव्या का मन कुछ ज्यादा ही मोहित के सान्निध्य को तरसने लगा था। रात भर पति का साथ भी उसे कम महसूस होता। कई बार काव्या का सुबह उठने का मन नहीं होता था। मन करता कि यूं ही देर तक मोहित के आगोश में पड़ी रहे।
पर... भरेपूरे घर में यह कहां संभव था?
आज संयोग से सास ससुर, उसकी दोनों ननदें और देवर दूसरे शहर में रहनेवाली उसकी बुआ सास के घर गृहप्रवेश में गए थे। काव्या चुंकि नई बहू थी इसलिए सास ने कहा,
"तुम अभी नई बहू हो। अभी समधियाने में तुम्हारा जाना ठीक नहीं। एक दो साल बाद जा सकती हो!"
इस पर उसकी बड़ी ननद मनीषा जो काव्या से कुछ ही बड़ी रही होगी, काव्या के पास आकर धीमे स्वर में भेदपूर्ण मुस्कान के साथ बोली,
" काव्या भाभी! अब दो दिन तक जी भरकर रोमांस करना। कोई डिस्टर्ब करने नहीं आएगा!"
सुनकर काव्या ने ऊपर से तो खुद को सामान्य दिखाने की भरपूर चेष्टा की।
पर...
काव्या के मन में तो लड्डू फूट रहे थे कि उसे इस घर में मोहित के साथ अकेले रहने का मौका मिलेगा... वो भी पूरे दो दिन के लिए.... आहा....!
उसके चमकते चेहरे पर अंदर से ख़ुशी जैसे छलकी पड़ रही थी। मोहित भी ख़ुश था क्योंकि वह भी काव्या के साथ एकांत को तरस जाता था।
उस दिन सुबह से ही मोहित भी बड़ा रोमांटिक हो रहा था। और शाम के पाँच बजे ज़ब सबको स्टेशन छोड़ने जा रहा था तो काव्या के कान में चुपके से फुसफुसाकर कहता गया,
"आज ज़ब मैं वापिस आऊँगा तो वो पिंक वाली ड्रेस पहनना जो हनीमून पर पहना था। और हां, उस ड्रेस के साथ एहसास भी वही रखना!"
उसकी ऐसी प्रेम पगी बात सुनकर काव्या की क़नपटी तो क्या पूरा सर्वांग लरज़ गया था। आज की रोमंटिक शाम और मधुयामिनी सी रात की कल्पना से ही वह इतनी प्रफुल्लित थी कि उसके पैर जैसे ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे।
पूरी तरह तैयार होकर काव्या ने एक सेल्फी मोहित को भेज दिया तो तुरंत ही मोहित का जवाब भी आ गया।
"बहुत खूबसूरत लग रही हो। अब इस पिक को सोशल मीडिया पर मत डाल देना मेरी जान! तुम पर और तुम्हारे ऐसे स्टाइलिश पिक पर सिर्फ है मेरा अधिकार ओ...मेरे सरकार! और किसीका नहीं, क्या समझी ?"
मोहित का यूं अधिकार जताना काव्या को बहुत अच्छा लगा। वैसे भी आज काव्या को मोहित की कोई बात बुरी नहीं लग रही थी।
थोड़ी देर में मोहित आया तो सजी संवरी काव्या कुछ अलग ही लग रही थी।
थोड़ खुली खुली... खिली खिली इस काव्या को तो वह जानता ही नहीं था।
हल्के संगीत के साथ डांस, फिर लज़ीज़ खाना और प्रेम पगी बातों के साथ प्रेम की अठखेलियां..... आहा.... सब कुछ कितना रमणीय था... कितना मधुर...!
प्रेम का उन्माद, समर्पण और फिर एक सहचर का माधुर्य। दोनों अपने वैवाहिक जीवन के इन खूबसूरत लम्हों को दोनों सहेज़कर रखना चाहते थे।
वो प्रेम से भरी पूरी रात काव्या के जीवन की एक बेहद खूबसूरत रात बन गई जिसकी मिठास आज भी उसका तन मन सुवासित करती रहती है।
मोहित भी अब कुछ रोमांटिक सा हो गया था और वही रोज़ वाली काव्या अब उसे बेहद खास लगने लगी थी।
आखिर.... दोनों ने एक दूसरे के कई सारे रूप जो देखे थे। इंसान विविधता चाहता है और अब मोहित और काव्या एक दूसरे को पूर्ण सहयोग और प्रोत्सान देकर गृहस्थी के नित नए सोपान चढ़ रहे थे।
आज की रोमानी रात और मोहित का साथ काव्या कभी नहीं भूल सकती थी।
पति पत्नी में प्रेम और माधुर्य बनाए रखने के लिए कभी कभी उनको ऐसा एकांत मिलना जरूरी हो जाता है जब दोनों खुलकर सामने आ सकें। मन की बात बेधड़क कर सकें। तभी दांपत्य जीवन की बगिया के फूल खिले खिले रहते हैं।
दो दिन बाद जब सब वापिस आए तो मनीषा ने भेद खोला कि,
उसने काव्या और मोहित को एक दूसरे का साथ ज्यादा से ज्यादा पाने की इच्छा को ताड़ लिया था और अपनी मां को भी इस योजना में शामिल कर लिया था।
उसकी सास बीना देवी ने भी हंसकर काव्या से कहा,
"बहू! तुम भी गृहप्रवेश में जा सकती थी। सब वहां तुम्हें और मोहित को इतना पूछ रहे थे।पर मनीषा ने जो बात कही थी, वह भी हमें सही लगा।आख़िर नई नौतार हो। अभी एक दूसरे से मन थोड़ी भरेगा? "
"मांजी! ऐसी कोई बात नहीं। ये तो लगे रहे लैपटॉप में और अपने दोस्तों से मिलने चले गए और मैं बोर होकर सोती रही थी!"
इस बात पर मनीषा जोर से हंस पड़ी।
तब सास ने भी तनिक विहंसकर कहा,
"रहने दो बहू! तुम्हें तो ठीक से झूठ बोलना भी नहीं आता।
अरे... हम भी गुजरी हैं कभी इस दौर से। हम भी कोई हमेशा से बुढ़िया थोड़े ना थीं। हम भी जवान थीं , अरमान भी बहुतेरे थे मन में। पर... हमारी ननदिया थी एकदम जलनकुकड़ी सी... और क्या! जरा सा भी हम ढंग से पहन ओढ़ लेतीं कि उस दिन उससे खाना ही गले नहीं उतरता। जो नौटंकी करती कि हमारा शृंगार पटार धरा ही रह जाता!"
अब तीनों की समवेत हँसी से रसोई भी खिलखिला उठी थी।
रात में जब काव्या ने मोहित को बताया कि...
सब जानबुझकर उन्हें प्राईवेशी देने की खातिर मोहित और काव्या को साथ लेकर नहीं गए थे।
तो मोहित ठहाका लगाकर बोला,
"बेगम साहिबा! हमें तो पहले से पता था। आखिर मनीषा दीदी ने अपने प्लान में मुझे भी तो शामिल किया था!"
"ओहो..... तो आप भी...!"
काव्या ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा तो मोहित बोला,
"जी हुजूर! हम भी!"
काव्या के झूठ मूठ के रूठने के अंदाज पर मोहित उसे मनाने का नाटक करते हुए बोला
" मेरी बेगम, मेरी सरकार,
आपका हम पर है पूरा अधिकार;
अब गुस्सा छोड़ो, दिल ना तोड़ो
हमें आपके प्यार की है दरकार!"
बस... फिर क्या था...!
अब काव्या को भी हंसी आ गई।
बगल के कमरे में उसके ससुर दिनेश जी और सीधी सादी सास बीना जी उनकी मन ही मन बलैयां ले रहे थे कि वो हमेशा ऐसे ही हंसते खिलखिलाते रहें।
काव्या ऐसा परिवार पाकर बहुत खुश थी।
जिस घर में बहू की हँसी गूंजे, सास का आशीर्वाद हो और ननद भाभी में बहनापा हो, वह घर हमेशा खुशहाल रहता है।

