सोख़्ता (उपन्यास) - 8
सोख़्ता (उपन्यास) - 8
सारे बदन में चुनचुनाहट-सी महसूस हुई तो एक झटके से चादर उलट दिया लेकिन आंखें फौरन भींच ली। सूरज की तपिश-भरी सारी रौशनी सीधे आकर मुंह पर गिरी। मैं आंखें बंद किये-किये उठ बैठा।
सीढ़ियाँ उतरते-उतरते आंगन में नजर डाली। आंगन में कोई नहीं था। बकरी पेट में मुंह घुसाए सो रही थी। अम्मा बावर्चीखाने से निकलती हुई दिखीं तो मैं वहीं रुक गया।
"आज रात को बकरी बहुत चिल्ला रही थी। बीमार तो नहीं है?"
अम्मा नल के पास आकर हाथ धुलने लगीं।
"पता नहीं। मैं उठी तो तरन्नुम आंगन में थी इसलिए मैं फिर लेट गयी। थोड़ी देर बाद बकरी भी चुप हो गयी थी।"
"आपा कहां हैं?" मैं बाकी सीढ़ियां भी उतर गया।
" अभी नहीं लौटी।"
अम्मा आंगन में बिखरे एक-एक चीज को समेटने लगीं। शायद आंगन बुहारने की तैयारी में थीं। अमूमन यह काम आपा ही किया करती हैं।
" आज बहुत देर कर दी। कहीं बोलकर गयी हैं क्या?
"ऐसा तो कुछ नहीं बोली लेकिन मोहल्ले की कोई औरतअपने साथ घर ले गयी होगी। मोहल्ले की सारी औरतें तो हवाखोरी के लिए जाती हैं सुबह! अभी आ जाएगी।"
अम्मा कुछ कपड़े हाथ में गठरिया कर अन्दर कमरे में चली गयीं। मैं हाजत रफा के लिए डिब्बे में पानी भरने लगा।
" आपा के मन का बोझ अब हल्का है।"
अम्मा कमरे से निकल आयीं।
" कुछ कह रहे हो?"
" मैं बोला, आपा की तबियत अब हरी-भरी लग रही है।"
"खुदा उसे सब्र का माअद्दा दे और उन लोगों का भी भला करे जिन्होंने हमारी बेटी का दिल दुखाया है।"
अम्मा की यह आदत अच्छी लगती है। किसी को कोसना होगा तो सीधे-सीधे बद्दुआ नहीं देंगी। कहती हैं, किसी की बुराई को सीधे-सीधे इंगित करने से खुदा बुराई करने वाले का गुनाह कम कर देता है।
" तनवीर को भेजकर मोहल्ले में आपा को दिखाओ।"
" तनवीर अभी बाहर निकलकर गया है। आये तो भेजती हूँ।"
"अफरोज!"
बाहर से किसी की आवाज़ आई। मैं पानी से भरा डिब्बा उठाकर सीधा खड़ा हुआ ही था, आवाज़ सुनकर फिर वापस उसी जगह पर रख दिया। इस बीच बाहर खड़े आदमी ने दोबारा आवाज़ दी।
" कौन? " पूछने के बाद मैंने दरवाज़ा खोला।
" तुम्हारी बहन तालाब में डूब गयी है।"
दरवाज़ा खुलते ही बस एक आवाज़ सुनायी दी। लगा, दिल सीना फाड़कर बाहर निकल गया। सामने खड़े आदमी का चेहरा धुंधला-धुंधला होकर नजर के सामने लहराने लगा पैर बेकाबू होने लगे। दिल हुआ दरवाज़े से टेक लगाकर बैठ जाऊं।
" पुलिस आयी है। वहां कोई नहीं पहचानता था। मैंने देखा तब बताया कि यह अफरोज की बहन है। लाश को एक लड़के ने खींचकर निकाला।"
इस उम्र में दहाड़े मारकर न रो पाना भी एक मजबूरी है। ऐसी मजबूरी जो बहन की लाश के सामने भी आकर खड़ी हो जाय। मुझे क्या करना चाहिए? यह सवाल शून्य में जाकर टंग गया और मैं उसे घूरता सिर्फ खड़ा रहा।
मैंने देखा, एक भीड़ मेरी तरफ बढ़ी आ रही थी। कुछ लड़के आसपास बिखर गये। कुछ हाथों के जरिए नकाब में लिपटी एक लाश लायी जा रही थी। मैं तेजी से पलटा और आंगन में आकर खड़ा हो गया।
"अम्मा…।" सूचना के तौर पर अम्मा को पुकारने के अलावा और कुछ न कह सका।
पता नहीं, मेरी पुकार पर अम्मा बोलीं या नहीं लेकिन पास में आकर खड़ी हो गईं और मेरे धुंआ - धुंआ हो रहे चेहरे को निहारने लगीं। मैं दरवाज़े की तरफ देखने लगा। कुछ क्षण बाद एक भीड़ अन्दर घुसी। लाश देखते ही अम्मा चीख मारकर दो कदम दौड़ी फिर गश खाकर गिर पड़ीं। भीड़ लगातार बढ़ रही थी। मैं ज्यों का त्यों खड़ा रहा।
भीड़ का कोई भी चेहरा नजर में नहीं ठहर रहा। मेरी याद्दाश्त जाती रही या नजर की रौशनी कम हो गयी? मैं पागलों की तरह भीड़ को चीरता हुआ आपा की तरफ बढ़ने लगा तभी कुछ हाथों ने पकड़ लिया। मैंने घूमकर देखा--हां, यह चेहरा जाना पहचाना है। नाम भी याद आया। मैंने पूछा--"आंय…?"
"आओ, इधर आओ।"
मैं उसकी बाहों में जकड़ा-जकड़ा बाहर आ गया। एक खाली चारपाई पर उसने मुझे बिठाया और खुद कंधे पर हाथ रखे खड़ा रहा। मुझे अपने चेहरे पर पसीने की बूंदें सरसराती महसूस हुई। मैं दोनों हाथों को रुमाल की तरह चेहरे पर इस्तेमाल करने लगा। अब मैं अपने-आप को हल्का महसूस कर रहा था।
कुछ लोग आकर पास में खड़े हो गए।
"अफरोज, पुलिस पंचनामा तैयार कर रही है। उम्मीद है, लाश छोड़ देगी। अगर तुमसे पुलिस पूछे तो कह देना कि तरन्नुम पर पागलपन का दौरा पड़ता था। वह खुदकुशी की एक बार और कोशिश कर चुकी थी।"
"ये किसने कहा?" सलाह देने वाले की तरफ मैंने नजर उठाकर गुस्से से देखा।
" तुम्हारे अब्बा ने भी यही कहा है।"
अब्बा का जिक्र आते ही मेरी आंखों में जैसे खून उतर आया। मालूम नहीं कैसे सीधे अब्बा पर ही नजर जाकर ठहर गयी। मेरी आंखों की तपिश से अब्बा धीरे-धीरे पिघलने लगे पहले तो जिस्म में जुम्बिश हुई फिर आंखें पनिहा गयीं। धीरे-धीरे अब्बा के हाथ माफी मांगने की राह पर उठे पर शायद हिम्मत हार गये और हाथ जोड़ने के बजाय हाथों की आठ उंगलियों को बालों में पूरी तरह पेवस्त करके बैठ गये और भुपकार छोड़ कर रोने लगे।
अब्बा की इस बेचारगी-भरी रुलाई से आस-पास खड़े पत्थर दिल डगमगा गये लेकिन मैं वैसे ही बैठा रहा। थोड़ी देर बाद अब्बा की तरफ देखने की हिम्मत जवाब देने लगी तो मैंने नजरें जमीन पर गिरा दी। मैं दिल में राहत महसूस कर रहा था। शायद इसके पीछे अब्बा के आंसू ही कारगर साबित हुए थे
कोई मुझे बांह से पकड़कर उठाने लगा। मैं बगैर उसकी तरफ देखे, उठ खड़ा हुआ और उसके हाथ के खिंचाव की तरफ बढ़ने लगा।
"अफरोज, थोड़ा ठंडे दिमाग से काम लो। थोड़े झूठ से ढेर सारी परेशानियों से बच जाओगे। पोस्टमार्टम होगा तो लाश की मिट्टी-पलीत हो जाएगी, सो तो होगी ही, तुम लोग भी बेफायदे में पुलिस के चक्कर में फंस जाओगे। इंस्पेक्टर शरीफ है, वह भी नहीं चाहता है कि तुम लोग मुसीबत में पड़ो। फिर तुम्हें थोड़ा-सा झूठ बोलने में क्या परेशानी है? मोहल्ले के भी दो-चार लोग इस बात की तस्दीक के लिए खड़े हो जाएंगे। इसकी मैं जिम्मेदारी लेता हूँ।"
" ठीक है, जो आप लोग मुनासिब समझे!"
मैं आकर फिर चारपाई पर बैठ गया। अब्बा को कुछ लोगों ने सहारा देकर एक किनारे बिठा दिया था। वह अभी भी सिसकियों के सहारे रोये जा रहे थे। दोनों हथेलियों से आंखें बन्द किए हुए। थोड़ी देर बाद पास में ही सिसकियां सुनायी दी। घूमकर देखा। एक लड़का तनवीर को पकड़े, चारपाई की तरफ ला रहा था। तनवीर लगातार सिसकियां भरे जा रहा था। उस लड़के ने तनवीर को मेरे करीब लाकर छोड़ दिया। तनवीर खड़ा-खड़ा रोता रहा।
मैने धीरे से नजर उठाकर उसको देखा फिर हाथ बढ़ाकर उसके बालों को सहलाने लगा। सहारा पाकर तनवीर की सिसकियां बढ़ गयीं। सोचा, सांत्वना के दो शब्द बोल दूं पर लगा कि अगर मुंह खोलूंगा तो मैं खुद रो पड़ूंगा। मुझे महसूस हुआ कि तनवीर के सिर पर हाथ रखकर मैंने गलती की। आंखों में आंसू रेंगने लगे। मैं उठकर खड़ा हो गया। मैं पूरे जतन से आंसुओं को आंखों में ही जज्ब कर जाने की जद्दोजहद करता रहा पर आंसू थे कि उन्मादी बाढ़ की तरह बढ़ते ही जा रहे थे। कोशिशों के बावजूद जब आंसू तनवीर के बालों में टपक गये तो मैंने अपने-आपको ढीला छोड़ दिया और तनवीर को लिपटाकर खुलकर रो पड़ा।
*****
मेहमानों का आना-जाना लगा हुआ है। जब भी कोई आता है अम्मा रोने लगती हैं। मैं आपा की यादों से बचना चाहता हूँ। तनवीर पर आपा की नामौजूदगी का असर कम हो गया है लेकिन अब्बा गुमसुम हो गये हैं। इसके बावजूद दिल होता है कि अब्बा के ऊपर जब-तब दो-चार फब्तियां कस दिया करूं, 'अब यह नाटक करने से क्या फायदा? इसकी मुराद तो आपने खुद की थी। जाओ, अब सीना ठोककर दुनिया वालों से कहो कि देखो, मैंने अपनी कौम के रहनुमाओं के ऊपर एक बेटी कुर्बान कर दी है। ऐसे रहनुमाओं के ऊपर हमारी हजारों-हजारों बेटियाँ कुर्बान।'
कोई आत्महत्या कैसे करता है? मैं सोचकर ही कांप गया। आपा ने कितनी भी हिम्मत क्यों न की हों लेकिन तालाब के करीब पहुंचने पर पानी में कूदने के लिए फिर से हिम्मत जुटानी पड़ी होगी। पानी में कूदने के बाद पता चला होगा कि मरना कितना मुश्किल है। घुटती हुई सांसें कितनी तकलीफदेह रही होंगी! या अल्लाह! जीने की तमन्ना फिर से जाग उठी होंगी। आपा ने बच निकलने की बहुत कोशिश की होंगी। हाथ-पैर चलायी होंगी। किसी की मदद की उम्मीद की होंगी…… ऊफ!
अगर सोचा जाय तो आपा ने आत्महत्या करके क्या पाया! जिन दुनियाबी तकलीफों से भागीं, कौन जानता है इन तकलीफों से ज्यादा आसमान और जमीन के बीच के हालात बद्तर हो गये हों! कहते हैं, जो लोग जिन्दगी से भागते हैं उनकी रूह को फरिश्ते आसमान में घुसने नहीं देते। उनको अपनी बाकी जिन्दगी के वक्त जमीन और आसमान के बीच भटक-भटककर गुजारनी पड़ती है। हां, मां-बाप को थोड़ी तकलीफ़ के बाद सुकून जरूर मिलेगा।
बकरी अब नहीं चिल्लाती। उसको जब भी देखता हूँ, उससे लिपट जाने को दिल करता है। जानवरों के पास अगर इंसानों की तरह बोलने की शक्ति होती या इंसानों के पास जानवरों की भाषा समझने की ताकत होती तो शायद बहुत सारी दुर्घटनाएं होने से पहले ही लोगों को मालूम हो जातीं। लेकिन खुदा का इंतजाम भी निराला है।
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आपा के जाते ही घर में मनहूसियत जैसे फैल गयी है। घर काटने को दौड़ता है। अब्बा अब बीमार रहने लगे हैं। मन में काफी दिनों से आगे बढ़ जाने की छटपटाहट थी। दानिश कई बार बोला भी था, 'इस वर्कशॉप में पड़े- पड़े सड़ जाओगे। इस तीन सौ रुपल्ली में तरक्की का कोई चांस नहीं है। अखबार लाईन में आ जाओ। वैसे भी साप्ताहिक के लिए लिखते ही रहे हो। दैनिक का समाचार लिखना कोई बड़ी बात नहीं है सिर्फ अभ्यास की जरूरत है। हेडिंग लगाना और इंट्रो लिखना आ जाय तो समझो समाचार लिखना आ गया।'
उस दिन जब जौनपुर के अखबार से दानिश का बुलावा आया तो मेरा मन भी अकुला उठा। दानिश जौनपुर के लिए रवाना होते-होते बात करके खत लिखने को कहकर गया था। आज जब खत आया तो जल्द से जल्द शहर छोड़ देने का फैसला कर लिया।
खालिद साहब को मेरा अचानक काम छोड़ना अच्छा नहीं लगा फिर भी इजाजत दे दी कि अगर तुम्हारा मुस्तक़बिल संवरता है तो जरूर जाओ। इसके अलावा उनके पास चारा ही क्या था!
इंसान को जब अपने साए से पीछा छुड़ाना हो तो उसे किसी अंधी सुरंग की ही तरफ भागना पड़ेगा। अब क्या पता उस सुरंग में कोई मसीहा बाहें फैलाये खड़ा है या कोई शैतान! (शेष भाग-9 में पढ़ें)
