Asha Gandhi

Inspirational


4.8  

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संकल्प की शक्ति

संकल्प की शक्ति

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 रात के दो बजे थे, अर्चना के फ़ोन की घंटी बजी तो कोई अनजाना नंबर देखकर उसने फ़ोन नहीं उठाया, तब तक आदर्श का फ़ोन भी बजने लगा। किसी अनजान डर से उठकर आदर्श को फ़ोन पकड़ा कर, वह ऋषभ के कमरे में गयी, उसे वहाँ न देखकर लौटी, तो आदर्श गाड़ी की चाबी उठा रहा था। “अर्चना जल्दी नीचे आओ मैं गाड़ी निकाल रहा हूँ , ऋषभ का एक्सीडेंट हो गया है ” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

ऋषभ उनकी इकलौती संतान थी। पढ़ाई के साथ साथ वह स्पोर्ट्स में भी बहुत अच्छा था, स्कूल की फुटबॉल टीम का कप्तान था, रोज़ सुबह ६ बजे से ही उसकी कोचिंग शुरू हो जाती। उसकी टीम ने स्टेट लेवल मे जीत हासिल की थी, उस रात जीत की ख़ुशी में क्लब मे पार्टी थी, उसे देर से लौटना था सो घर की डुप्लीकेट चाबी साथ ले गया थ l 

अस्पताल पहुंच कर देखा तो ऋषभ दर्द में बुरी तरह से कराह रहा था, उसकी बायीं टाँग ख़ून से लथपथ थी, खून लगातार बह रहा था इमरजेंसी मे ऑपरेशन करना पड़ा, जहर पूरे शरीर में न फैले, इसलिये टाँग को नीचे से काटना पड़ा। 

 ऋषभ पूरी तरह से बिखर गया था। तरुन मन के सारे सपने चूर हो चुके थे l अर्चना और आदर्श ने देश विदेश के बड़े से बड़े डॉक्टरों को दिखाया, कृत्रिम टाँग लगवाने पर भी वह जीवन में आगे बढ़ने को तैयार न था। अर्चना उसे जीवन के लिए तैयार करने के लिए हर कोशिश कर रही थी, पर वह हताश हो चुका था। वह ऋषभ के स्वभाव को जानती थी, वह कभी भी किसी बात को बिना प्रमाण के नहीं मानता था।  

एक दिन वह ऋषभ को पास की नदी किनारे ले गयी, नदी में स्वच्छ जल बह रहा था। थोड़ी दूर में कीचड़ का सैलाब था, नदी वहाँ उस कीचड़ से मिल अपना जल दूषित कर रही थी। अर्चना ने ऋषभ को कहा, चलो हम कीचड़ के आगे कुछ रेत रख कर नदी के जल को गन्दा होने से रोकते हैं और उन्होंने मिलकर कुछ रेत व छोटे छोटे पत्थर रखे, जिससे नदी का जल कुछ देर वहीं रुक गया, लेकिन थोड़ी ही देर में उन्होनें देखा नदी उन छोटे छोटे पत्थरों व रेत के ऊपर से बहने लगी थी। अर्चना ने उसे समझाया अगर संकल्प शक्ति बलवान होती है, तो कोई भी रुकावट रास्ता नहीं रोक सकती, और ऋषभ की सबसे पसंदीदा गेंद उसके हाथ मे देते हुए कहा तुम भी इन रुकावटों को पार कर बिना रुके आगे बढ़ो अपने दिल के उस जुनून को पूरा करने की मन में ठान लोगे, तो कोई भी रूकावट तुम को रोक नहीं सकेंगी।

उसके बाद वक्त ने अपनी चाल तेज़ कर दी थी, ऋषभ ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू कर दी, अब उसकी पसंदीदा बॉल उसके साथ ही रहती। जब वह स्पोर्ट्स मॅनेजमेंट डिग्री लेकर ऑस्ट्रेलिया से लौटा तो उसकी आँखों में अपना बचपन का वही सपना चमक रहा था। आज ऋषभ एक अंतराष्ट्रीय स्पोर्ट्स कम्पनी में सीनियर मैनेजर पद पर काम कर रहा है। उसके फुटबॉल के ऊपर लिखे ब्लोग्स व ट्विटर विश्व भर मे सराहे जाते है। अपाहिज हो कर भी उसने अपनी इच्छाशक्ति से अपने सपनों को जीना सीख लिया था। 

         

        

         

          

         

        

         

          


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