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Asha Gandhi

Drama Romance


4.3  

Asha Gandhi

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मासूम प्यार

मासूम प्यार

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 जीजी - - बाबा जी की तबीयत बहुत ख़राब है, मां पापा उनको हॉस्पिटल लें गए हैं, “तुम जल्दी आ जाओ ” छोटे भाई का फ़ोन  सुन मैं बहुत  घबरा गयी थी। हमारा घर यू.पी के गोंडा जिला मे था कॉलेज की पढ़ाई के लिए मुझे भी बाहर जाना पड़ा। दिल्ली से गोंडा कीसीधी ट्रेन भी नहीं थी। मै जल्दी से जल्दी घर पहुँचना चाहती थी।

लखनऊ स्टेशन जब गाड़ी रुकी तो अँधेरा हो चला था मैंने स्टेशन के पास के बूथ से घर फ़ोन किया पर कोई भी उत्तर न मिलने से ओरभी घबरा  गयी। घबराहट से मेरे पैर कांप रहे थे, जैसे ही मैं बस स्टैंड की तरफ बढ़ी तो अचानक किसी ने पीछे से मुझ पर वार किया और मेरे  हाथ से पैसे वाला पर्स लेकर भाग गया। मैं ज़ोर ज़ोर से रो रही थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कैसे घर पहुँचूँगा। 

गोंडा की बस तैयार थी, तभी किसी ने मेरे हाथ में बस की टिकट पकड़ा दी “ जल्दी बैठिए बस निकल जाएगी, और हाँ याद रहे, इतनी जल्दी हार नहीं मानते, मैडम” ” मेरी आँखें पूरी तरह से आंसुओं से भरी थी, उसका चेहरा देख कर भी पूरी तरह से देख नहीं सकी।

 बाबा की तेरहवाँ कर दिल्ली लौट आई। उस नेक फ़रिश्ते को व उसकी बात को भूल नहीं पाई थी।

मेरी पढ़ाई ख़त्म हो चली थी। जब भी घर जाती आँखें रास्ते में उसे ही ढूँढती रहती ।

इस बीच मेरे रिश्ते की बात चली तो मैंने माँ को साफ़ साफ़ मना कर दिया कि मुझे छोटे शहर में शादी नहीं करनी “ लड़का डॉक्टर है, बहुत ही नेक है, एक बार मिल तो लेा ” माँ ने कहा। मैंने मिलने से भी न कर दिया था।

उस रात पार्टी से लौटते समय पापा की कार रास्ते में बन्द हो गई , पापा हाथ हिलाकर पार होने वाली हर गाड़ी से मदद माँगने की कोशिश कर रहे थे, तभी तभी उस हाईवे से पार होने वाली एक ट्रक पापा को मारती हूँ निकल गई। पापा खून से लथपथ सड़क के किनारे में पड़े थे। अब मदद माँगने को मैं चिल्ला रही थी। अचानक एक कार रूकी, उस नवयुवक ने पापा को अपनी कार में लेटाया।

आपरेशन थियेटर से बाहर निकल कर उसने कहा “ डोनट वरी ही इस आउट ओफ डेज़र , वह ठीक है।” उसके चेहरे पर मास्क लगा था, पर आवाज़ कुछ जानी सी लगी। माँ ने बताया यह वहीं  है जिसने अपनी कार से हमें यहाँ पहुँचाया खुद डाक्टर है, और जिसका रिश्ता मैं बिना देखे ही ठुकरा चुकी थी।

उस दिन पहली बार अहसास हुआ कि मैने झूठे दिखावे में आकर बिना देखे ही जीवन का कितना बड़ा मौक़ा खो दिया था ।

सुबह तक भी पापा को होश नहीं  आया था, मैं पापा के पास बैठी रात भर सोचती रही , मेरी आँखें अब भी भरी थी, अचानक किसी के शब्दों ने मुझे चौंका दिया “ याद रहे, इतनी जल्दी हार नहीं मानते हैं  मैडम”  मेरे सामने मेरा मसीहा खड़ा था। इस बार भी आँखें भरी थी।

 “ कभी तो इन्हें ख़ाली रख दिया करो, शायद और भी ज़्यादा खूबसूरत दिखेगीं  ” उसने मेरी आँखों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा। मैं उसकी बात का मतलब समझे बिना ही रोते-रोते उसके गले लग गई थी।


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