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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Classics Inspirational

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Classics Inspirational

संभाजी महाराज- एक अजेय योद्धा

संभाजी महाराज- एक अजेय योद्धा

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संभाजी महाराज: मराठा साम्राज्य के अजेय योद्धा।।


"जिन्होंने औरंगज़ेब को उसके घमंड के सिंहासन से नीचे उतार दिया, और धर्म की विजय पताका अपने रक्त से फहराई।"
ऐसे वीरों को कोटि कोटि नमन।


यह कहानी है एक वीर मराठा राजा छत्रपति संभाजी महाराज की, जो न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि भारतीय इतिहास में धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए बलिदान की प्रतिमूर्ति बनकर एक मिसाल बनकर उभरे। यह कहानी है उस सिंह की, जो मुगलों की समस्त सैन्य शक्ति और छल-कपट के सामने निर्भीक होकर खड़ा रहा, जरा भी झुका नहीं।


जन्म और प्रारंभिक जीवन।।


संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुणे जिले के पुरंदर किले में हुआ था। वह छत्रपति शिवाजी महाराज और माता सईबाई के पुत्र थे। दो वर्ष की आयु में ही माता का साया सिर से उठ गया और उनका लालन-पालन दादी जीजाबाई के स्नेह और अनुशासन में हुआ। जीजाबाई ने उन्हें धर्म, नीति, युद्ध-कौशल और मराठा गौरव की अमिट छाप दी।

बाल्यकाल की कथा: बौद्धिक विलक्षणता का आरंभ

संभाजी महाराज का बाल्यकाल सामान्य राजपुत्रों जैसा नहीं था। मात्र 4 वर्ष की आयु में उन्होंने संस्कृत श्लोकों का पाठ करना शुरू कर दिया था। आठ वर्ष की आयु तक वे महाभारत, रामायण, और योगवाशिष्ठ जैसे ग्रंथों का अध्ययन कर चुके थे।

संभाजी ने अल्पायु में ही शस्त्रविद्या, राजनीति, भाषा और इतिहास में अद्भुत प्रवीणता प्राप्त की। मात्र 13 वर्ष की आयु में वे 13 भाषाओं के ज्ञाता बन चुके थे। उन्होंने 1200 किलोमीटर लंबी यात्रा कर स्वयं जीवन के संघर्षों का अनुभव किया था।


उनके पिता शिवाजी महाराज ने उन्हें काशी से लाकर पंडितों के संरक्षण में अध्ययन कराया। 14 वर्ष की अवस्था में उन्होंने संस्कृत ग्रंथ "बुद्धिभूषण" की रचना की, जिससे उनकी विद्वत्ता और सूक्ष्म चिंतन क्षमता का परिचय मिलता है।



मराठा गाथा की नई शुरुआत।



11 जून 1665 को शिवाजी महाराज ने पुरंदर संधि के अंतर्गत मुगलों को 23 किले सौंपे थे। इस क्षण ने संभाजी को राजनीति की असलियत से परिचित करवाया। शिवाजी महाराज का यह निर्णय व्यावहारिक था, लेकिन एक ज्वाला थी जो संभाजी के अंतर्मन में धधकने लगी थी। उन्होंने तभी निश्चय कर लिया था—“मुगलों को उनकी ही धरती पर घसीटूंगा।”



संभाजी की विद्रोही आत्मा और नेतृत्व क्षमता।।



संभाजी महाराज प्रारंभ से ही तेजस्वी, आत्मगौरव से भरे और निर्भीक योद्धा थे। उनके विचार स्वतंत्र थे। पिता शिवाजी भी उनकी उग्रता से विचलित हो जाते थे।


वेल्हा किले में क़ैद और मातोश्री जीजाबाई की नाराज़गी।


एक समय ऐसा आया जब संभाजी महाराज ने स्वभाव में थोड़ी उद्दंडता दिखानी शुरू की। कुछ निर्णयों और मित्र मंडली को लेकर शिवाजी महाराज और उनकी माता जीजाबाई उनसे असंतुष्ट हो गए।


1678 में उन्हें वेल्हा किले में नज़रबंद कर दिया गया। परंतु इस क़ैद के दौरान भी संभाजी महाराज ने विद्वानों के साथ शास्त्रों का अध्ययन जारी रखा और अपने मनोबल को नहीं टूटने दिया। यह दर्शाता है कि उनमें आंतरिक आत्मबल अत्यंत प्रबल था।
 किन्तु वे अपनी पत्नी के साथ वहाँ से निकल भागे और अस्थायी रूप से मुगलों से जा मिले।



मगर जल्द ही उन्हें पता चला कि मुगल सरदार दिलेर खान उन्हें पकड़कर दिल्ली ले जाना चाहता है। स्वाभिमानी संभाजी ने एक पल में निश्चय लिया और मराठा भूमि लौट आए। पन्हाला लौटकर दुर्ग पर पुनः अधिकार किया और अपने पिता के निधन के बाद 1680 में विधिवत सिंहासनारूढ़ हुए। यह सिंहासन केवल सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म और मातृभूमि के रक्षक की जिम्मेदारी थी।


पिता से मतभेद और आगरा कारागार की कथा


जब छत्रपति शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज आगरा किले में औरंगज़ेब द्वारा बंदी बनाए गए थे, तो संभाजी महाराज की रणनीतिक चतुराई ने उन्हें और उनके पिता को उस कारागार से भाग निकलने में मदद की। किंवदंती है कि संभाजी ने ही नकली बारात योजना का सुझाव दिया था जिसमें वे बारातियों के भेष में बाहर निकलने में सफल रहे। यह घटना न केवल उनकी रणनीतिक समझ बल्कि उनके साहस का भी परिचायक है।


औरंगज़ेब के नाम पत्र — "धर्मवीर की हुंकार"



संभाजी महाराज ने एक ऐतिहासिक पत्र औरंगज़ेब को लिखा था जिसमें उन्होंने धर्म, संस्कृति और मराठा अस्मिता की रक्षा करने का संकल्प स्पष्ट किया। उस पत्र में उन्होंने लिखा था:

"हम छत्रपति के वंशज हैं, तलवार हमारा धर्म है, और आत्मसम्मान हमारा व्रत। तुम अपने आक्रांताओं की भाषा में बात करते हो, हम सत्य की आवाज़ में उत्तर देंगे।"


यह पत्र उनकी विद्वत्ता और निर्भीक स्वभाव का प्रतीक है।


शत्रु की छाती पर तांडव।



संभाजी महाराज ने केवल एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक धर्मयोद्धा की भांति शासन किया। उन्होंने 120 से अधिक युद्धों का नेतृत्व किया। उन्होंने गोवा में पुर्तगालियों को, मैसूर में बीजापुर को और उत्तर में मुगलों को उनके ही गढ़ में परास्त किया।


बुरहानपुर पर किए गए उनके प्रहार ने औरंगजेब को स्तब्ध कर दिया। संभाजी ने न केवल शहर को धूल में मिला दिया, बल्कि वहाँ तैनात मुगल सेना को भी छिन्न-भिन्न कर डाला। यह युद्ध मुगल सत्ता के दंभ पर करारा तमाचा था।



रणभूमि से धर्मयुद्ध तक।



1687 की भीषण लड़ाई में मराठा सेना विजयी तो हुई, परंतु अत्यधिक क्षतिग्रस्त भी। उनके सेनापति हंबीरराव मोहिते शहीद हो गए। इस क्षति से संभाजी अकेले रह गए, परन्तु उनका हौसला अडिग था।



मुगल सम्राट औरंगजेब, जो स्वयं इस्लाम की आड़ में कट्टरता का प्रतीक था, अब पूरी ताकत से मराठों को कुचलने को आतुर था। उसकी कूटनीति, धनबल और धूर्तता चरम पर थी। इसी काल में उसने छलपूर्वक संभाजी महाराज को बंदी बना लिया। यह गिरफ्तारी युद्धभूमि में नहीं, बल्कि विश्वासघात की छाया में हुई थी।



संभाजी महाराज और कवि कलश की मित्रता



संभाजी महाराज के सबसे घनिष्ठ मित्रों में से एक थे — कवि कलश, जो एक ब्राह्मण कवि, राजनयिक और विद्वान थे। दोनों का आपसी संबंध केवल मित्रता तक सीमित नहीं था; कवि कलश, संभाजी के विचारों और निर्णयों के प्रेरक स्तंभ थे। जब संभाजी को मुगलों ने बंदी बनाया, तो कवि कलश भी साथ पकड़े गए। 



संभाजी महाराज की शहादत – एक अमर गाथा।।



1689 में संभाजी महाराज को उनके विश्वासपात्र कवि कलश के साथ औरंगज़ेब के दरबार में प्रस्तुत किया गया। बादशाह को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वीर उसके सामने है। संभाजी के तेज को देखकर वह क्षण भर को स्तब्ध रह गया। तभी कवि कलश ने व्यंग्य में कहा:

जो रवि छवि लछत ही खद्योत होत बदरंग,
त्यो तूव तेज निहारी ते तखत तज्यो अवरंग।”




अर्थात् — जैसे सूर्य के प्रकाश के आगे जुगनू का तेज नष्ट हो जाता है, वैसे ही तेरे सामने यह राजा अपने तेज से तेरा सिंहासन छीन सकता है।


धर्मांतरण का प्रस्ताव और वीरतापूर्वक अस्वीकार।

औरंगज़ेब ने जब संभाजी महाराज को बंदी बनाया तो उन्हें इस्लाम धर्म अपनाने का विकल्प दिया गया। यदि वे धर्मांतरण स्वीकार करते, तो उन्हें जीवनदान मिल सकता था। किंतु उन्होंने उत्तर दिया:

"जो शिवाजी की संतान है, वह तलवार से तो मर सकता है, मैं मर जाऊँगा, पर अपना धर्म और सम्मान नहीं बेचूँगा।"


औरंगज़ेब आगबबूला हो गया। कवि कलश की जुबान कटवा दी गई। संभाजी महाराज को बार बार प्रस्ताव दिया था रहा था — “इस्लाम कुबूल करो, किले सौंप दो, जीवन दान मिलेगा।”

परंतु संभाजी, जो वीर शिवाजी का पुत्र था, जिसने हिन्दवी स्वराज्य की शपथ ली थी


तब शुरू हुआ अमानवीय अत्याचार। संभाजी को विदूषक के वस्त्र पहनाकर, नग्न कर नगर में घुमाया गया। उन पर पत्थर फेंके गए, लोहे की कीलों से गोदा गया। उनके नाखून और आँखें तक निकाल ली गईं। फिर भी उन्होंने अंतिम सांस तक “हर हर महादेव” का जाप नहीं छोड़ा।
दोनों ने साथ मिलकर अंतिम सांस तक अत्याचारों का सामना किया।



11 मार्च 1689 को, औरंगज़ेब ने उनके शरीर के टुकड़े कर तुलापुर की नदी में फेंकवा दिए।

अंतिम यात्रा — मराठा चेतना की चिंगारी।

संभाजी की मृत्यु ने मराठा साम्राज्य में चिंगारी की तरह क्रांति की लहर भर दी।
 संभाजी के रक्त से क्रांति की जो लहर उठी और वहीं से मराठा साम्राज्य ने फिर से सिर उठाया।
 उनके बलिदान से प्रेरित होकर मराठाओं ने मुगलों के विरुद्ध और अधिक ताकत से संघर्ष किया।

 यह युद्ध 27 वर्षों तक चला, जिसे "27 वर्षों का मराठा-मुगल युद्ध" कहा जाता है। अंततः औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य पुनः खड़ा हुआ।


औरंगज़ेब की स्वीकारोक्ति और अंत‌।



कहा जाता है, अंतिम क्षणों में औरंगज़ेब ने कहा था:

 “काश मेरे चारों बेटों में से कोई एक भी संभाजी जैसा होता।”



यह शब्द उस बादशाह के थे, जिसने भारत को रुलाया, लेकिन स्वयं अंत में अपनों से भी पराजित हुआ।

संभाजी महाराज: अमर स्वरूप

संभाजी नायक नहीं, वे एक विचार हैं। वे धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए अंतिम साँस तक लड़ने की प्रेरणा हैं। उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि जब धर्म पर संकट आता है, तो एक सच्चा क्षत्रिय अपने प्राण देकर भी उसे बचाता है।

उनकी मृत्यु नहीं हुई, उन्होंने “हर हर महादेव” की गूंज बनकर समस्त भारतवर्ष में अमरता पाई।

“संभाजी मराठा सिंह थे, ना कभी झुके, ना रुके।
उनकी आँखें निकाल ली गईं थीं, पर दृष्टि आज भी राष्ट्र के मार्ग में है।”

ऐसे वीर सपूतों को कोटि कोटि नमन।।






स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
             विरमगांव, गुजरात।




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