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Neetu Shrivastava... ✍️✍️

Abstract

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Neetu Shrivastava... ✍️✍️

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समस्या बुढ़ापा नहीं अकेलापन है

समस्या बुढ़ापा नहीं अकेलापन है

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बरसों बाद तान्या को अपने बचपन के घर गांव में जाने का मौका मिला बाहर द्वार पर बैठे अपने 90 पिता को काफी बूढ़े अवस्था में देख उसका मन तड़प उठा। पिता के बेहद करीब रहने वाली तान्या पिता के हर चीज़ से वाकिफ थी एक जमाना वह भी की पिताजी कितने ठाट बाट से रहते थे। उनके कपड़े की क्रीच हमेशा लगी रहती, सरकारी और अच्छे ओहदे वाली नौकरी के कारण लोगों का आने जाने वाला तांता हमेशा लगा रहता। गांव का माहौल सब साथ मिलजुल कर रहते थे।अपने पिता के पैर छूकर प्रणाम करती तान्या आंखो में आंसू लिए पिता के काफ़ी दुबले शरीर को देख उनसे कही, पापा भाई के पास ऐसी क्या कमी है जो आप इस स्थिति में ऐसे दिख रहे है?"कोई कमी नहीं बेटा , बल्कि मैंने बहुत पुण्य किए है जो आज के जमाने में मेरा बेटा, बहु बहुत सांस्कारी और मेरा ख्याल रखने वाले अपने साथ रखते हैं अगर मैं दुनिया को छोड़कर जाते समय अपनी आंखे बंद भी करूंगा तो अपनो के बीच करूंगा मुझे इस बात की तसल्ली है। पहले मैं यहां गांव में रहता था यहां गांव में लोग साथ -साथ रहते है अपनी खुशियां और गम भी साथ -साथ शेयर करते , पर्व त्यौहार साथ- साथ मनाते है और शहरों में लोग अपने आप में सिमटे हुए मनाते है। और वहां जब आई इंसान बूढ़े हो जाते है हाथ पांव काम नहीं करता तब बिल्कुल तन्हा रह जाते है क्योंकि उनके पास उनके साथ दो घड़ी बैठकर बात करने वाला कोई नहीं होता जो परिवार में होते है वे खुद के जीवन में इतने व्यस्थ होते है की उनके पास किसी के पास बैठने की समय नहीं होता है। बहु दिनभर घर के कामों में व्यस्त रहती है और बेटा ऑफिस में पोता पोती अपने अपने पढ़ाई के साथ मोबाइल फोन, लॉपटॉप पर व्यस्थ रहते हैं, एक समय था जब कोई दो पल बैठ बात कर लेता था अब वह बीते दिनों की बात हो चुकी है अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है बेटा की मुझे जल्द से जल्द अपने पास बुला लें और मैं इस नश्वर शरीर से मुक्त हो जाऊं !

प्लीज़ आप ऐसा मत कहे मुझे आपके मुंह से ऐसी बात सुन तकलीफ़ हो रही है

बेटा मैं नहीं समय की यही मांग है , मुझे दिक्कत महसूस हो रही है मेरी उम्र देखो नब्बे पार कर चुका हूं। मैं ईश्वर का बहुत शुक्रगुजार हूं की आज की इस बदलती दुनिया में भी मेरा बेटा बहु मुझे अपने साथ रखते है खान पान से लेकर फल और दवा हर एक चीज का ख्याल रखते हैं पर मैं किसी से बातचीत करना चाहता हूं। बहु और बच्चें आवश्यकता अनुसार बात करते है क्या करे उनकी भी अपनी मजबूरी है व्यवस्था के कारण। बस अब तो मेरी एक ही इच्छा है अब बहुत जी लिया उदासी भरी उबाऊँ अकेलापन लिए जीवन को अब बिल्कुल भी न तो इसे बर्दास्त कर पा रहा हूं न ही स्वीकार कर पा रहा हूं। मनोरंजन के लिए टीवी पर मैच या न्यूज़ भी ज्यादा देर तक बैठकर नहीं देख पाता क्योंकि शरीर इजाज़त नहीं देता।

जबसे गांव आया हूं यहां के शुद्ध हवा पानी और रोज मुझसे मिलने वाले लोगों का तांता लगा रहता है पर अब तो फिर उस बंद फ़्लैट और दौड़ती भागती जिंदगी में लौट जाना है सच कहूं तो मुझे वहां जाने का बिल्कुल मन नहीं कर रहा पर जाना तो पड़ेगा।गांव के आंगन वाले बड़े से घर में चार -चार भाईयो के परिवार के साथ साथ दादा जी, बुआ लोग, बड़का बाऊजी के घर वाले ढेरों नौकर चाकर हमेशा बड़े द्वार पर लोगों का बैठक लगा रहता खेती बारी सब कुछ देखने वाले पिता को इस हाल में देख उनकी कड़वी सच्ची बात को सुन कर तान्या कितनी विवश महसूस कर रही थी।पिता से मिल तान्या भाभी पास आई उनकी बात सुनी भाभी की बात सुन तान्या को लगा वे भी सही है भाभी ने कहा मैं अपने जीवन में पिता समान ससुर की सेवा को ईश्वर की पूजा के समतुल्य मानती हूं मैं बचपन से सुनते आई हूं की जो व्यक्ति अपना भगवान वृद्ध माता पिता को मानकर उनका सम्मान करता है उन्हें कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है. बुजुर्गों के आशीष वचनों में कामयाबी की शुभेच्छा रसी बची होती है , बस पास बैठकर बात करने की समय नहीं दे पाती हूं।

भाभी ने ईमानदारी पूर्वक अपनी बात बता दी यह बात बचपन से तान्या भी सुनते आई है की जिस परिवार में बड़े बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता उस परिवार में सुख, संतुष्टि और स्वाभिमान नहीं आ सकता। हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमारा स्वाभिमान हैं, हमारी धरोहर हैं। उन्हें सहेजने की जरूरत है। यदि हम परिवार में स्थायी सुख, शांति और समृध्दि चाहते हैं तो परिवार में बुजुर्गों का सम्मान करें लेकिन आजकल तो यह देखने को मिल रहा है बच्चें पापा पिता को बोझ समझ उन्हें वृद्धआश्रम तक छोड़ने में नहीं हिचकिचाते भैया, भाभी अपने साथ तो रखते है जितना हो सकाता है उनसे उतना ख्याल भी करते है। भाभी की बात से संतुष्ट तान्या पिता पास आकर बैठ गई पिता ने उसको समझाते हुए अपनी बातों को कहना जारी रखा।बेटा बदलाव नई शिक्षा व्यवस्था में है जान बूझकर गांव को विकसित करने से रोका गया ताकि लोग शहरों में रोजी रोटी कमाने और बच्चों की अच्छी शिक्षा दिलाने में सफ़ल हो सकेतान्या को महसूस हुआ की पिता को आर्थिक संसाधनों की कोई कमी भाई ने नहीं होने दिया है उनको सिर्फ अकेलेपन की भावाना, बात करने की भावना महसूस होती है शायद इसलिए भी बच्चों के साथ रहने पर बुजुर्गों को उनकी दिनचर्या के अनुसार चलना आवश्यक हो जाता है। बच्चों की समय सारणी के अनुसार भोजन कर लेना या सो जाना इस सामंजस्य को करने में उनको परेशानी होती है। बच्चों की शरारतें भी बहुत से बुजुर्ग लोग परेशानी समझते हैं ऐसे लोग भी बच्चों के घर नहीं रह पाते हैं लेकिन पिता जी इस अवस्था में कहां और कैसे अकेले रहते उनको भाई के साथ रहना मजबूरी है।

सबसे जरूरी कारण यह है कि जिस जगह पर मनुष्य का जीवन गुजरा हो उससे उसे बहुत ज्यादा लगाव हो जाता है तान्या के पिता के साथ भी यह बात लागू हो रही थी। उसने पिता के आंख में उस दर्द को देखा जो उस स्थान को छोड़ने मात्र की कल्पना से उसे कष्ट होता है। सारे परिचित भी उसी गांव और शहर में रहते , आजकल के अधिकतर बच्चे फ्लैट में रहते हैं जहां इतना स्थान नहीं होता है। बुजुर्ग लोग स्वयं की गृहस्थी में संतुष्ट रहते हैं । बच्चों के घर में वह बात नहीं आती। एक संकोच मन में रहता है। इसीलिए हर माता-पिता जब तक ताकत रहे और जीवनसाथी का साथ रहे अपने घर में रहते हैं लेकिन पिताजी अपने बहुत ज्यादा उम्र होने के वजह से विवश थे। जब भैया को अपने परिवार संग जाने की बारी आई तब तान्या भी बाहर खड़ी थी क्योंकि उनके जाने के बाद तान्या को अपने शहर के लिए निकलना था उसने देखा पिताजी बहुत धीरे धीरे गाड़ी के तरफ़ अपने घर बाहर सभी जगह को निहारते भावुक होते जा रहे थे गाड़ी में बैठने से पहले अपनी मिट्टी को छू कर माथे से लगाए और गाड़ी में बैठ गए क्या पता फिर कब आना होगा।भारी मन से तान्या भी जाते पिता को देख रोने लगी क्या पता फिर कभी इन्हें देख पाऊंगी भी या नहीं रास्ते में आते हुए हरियाली उसके मन को लुभा रही थी सच में आज गांव भी गांव और उससे जुड़े कुछ खूबसूरत यादें जेहन में खूबसूरती से पैठ बनकर समाई है।


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