रिश्तों में समझ होनी चाहिए
रिश्तों में समझ होनी चाहिए
मल्टीनेशनल कंपनी में साथ जॉब करते कब अंकित और दिव्या एक दूसरे को पसंद करने लगे, जैसे ही दोनों के घर वालों को इस बात की जानकारी हुई तब दोनों परिवार मिलकर आपसी सहमति से खुशी पूर्वक जून के महीने में उन दोनों की शादी करवा दिया। अंकित के घर में सिर्फ मां है एक बड़ी बहन है जिनकी शादी इसी शहर में अच्छे परिवार में हो चुकी है।
दिव्या अपने माता पिता की एकलौती बेटी है। शादी बाद उसकी मम्मी उससे बोली , बेटा मेरी बात गांठ बांध लो तुम्हारे काम आएंगी , बहू के रूप में थोड़ा शुरु से ही धैर्यवान बनें रहना,सास बहू के रिश्ते में बहू का धैर्यवान और शांति प्रिय होना बहुत जरूरी है. ...
पापा भावुक होकर बोले , "बेटा प्यार से किसी को भी दिल बदला जा सकता है यह हुनर शादी कर घर बसाने वाले लड़के और लड़कीयां दोनों में होनी चाहिए। तुम दोनों एक दूसरे को पसंद करते हो इसलिए शादी किया लेकिन मैं मानता हूं की शादी घर देख कर नहीं लोग देख कर किया जाता है क्योंकि अमीरी गरीबी तो वक्त के साथ बदल जाती है मगर बदलते इंसान और उसके सोच को बदलने में वक्त लगता है। तुम्हारा चुनाव बढ़िया है ससुराल और पति दोनों अच्छे हैं।"
शादी बाद दिव्या ससुराल आई , दिव्या के ननद तनुजा के सामने सास अंकित को समझा रही थी, "बहू नई होती है बेटा तो पुराना होता है न दिव्या की पहली रसोई है कल।"
तनुजा "तुम दिव्या को प्रोफेशन सेफ कहते हो मम्मी भी अच्छा खाना बनाती है। अभी तुम्हारी नई नई शादी है दुल्हन के आगे पीछे मत घूमना नहीं तो अंगुलियों पर नचाएगी।"
उसकी ममतामई सासमां की आवाज सुनाई पड़ी, "सुरत और सीरत में हमेशा फर्क होता है, किताब के कवर देख कर नहीं लेना चाहिए अगर कहानी अच्छी नहीं होती तब दुख होता है , अब जाओ बहु इंतजार कर रही है।"
पहली रात को अंकित दिव्या से ,"होने वाले खुद ही अपना हो जाते है , जबरदस्ती किसी को अपना नहीं बनाया जाता , मेरे दिल में तुम्हारा पहले से राज करती थी , अब मेरे घर में तुम्हारा स्वागत है मैं आज तुमसे वादा करता हूं अगर तुम खुश रहोगी तो मैं भी खुश रहूंगा पहली रसोई दिल से बनाकर सबको खुश कर देना क्योंकि ऑफिस में लाए तुम्हारे हाथों बने स्वादिष्ट टिफिन खाकर यहां तुम्हारे प्रोफेशनल सेफ होने की बात सबको बता चूका हूं|"
दिव्या के रसोई के दिन उसकी ननद तनुजा सुबह ही आ गई दिव्या काफी मेहनत से खाना बनाकर टेबल पर लाकर रखीं।
पहला कौर मुंह में डालते ही उसकी सास , "नमक कितना ज्यादा कह खाना हटा दीं, और अंकित से क्या तुमको नमक तेज़ नहीं लग रहा ? क्योंकि अंकित बहुत प्रेम से खाना खा रहा था मां की बात सुन वह कुछ बोलना तभी दीदी अनुजा दिव्या के तरफ देख....
व्यंग से बोली , "अंकित से क्या पुछ रहीं हो देख नहीं रही कितने प्यार से खा रहा है अरे इसको तो दिव्या अगर ज़हर भी देंगी वह भी यह प्यार से खा लेगा।"
सासू मां और ननद की बातों सुनकर दिव्या बहुत दुखी हुई लेकिन कुछ बोली नहीं, पर कमरे में अंकित से.....
" क्या आपको भी खाना पसंद नहीं आया ?"
"खाना बहुत स्वादिष्ट था !" अंकित
"पर जब मांजी और दीदी बुराई कर रही थी तब आपने कुछ क्यूं नहीं बोला ?" दिव्या
"अरे मां बुढ़ी है और इधर कुछ दिनों से कमजोर और चिड़चिड़ी हो गई है "
"और दीदी "
"दीदी थोड़ी जुबान की तेज़ है पर दिल की बहुत अच्छी है।"
"दिल के अच्छे लोग किसी का दिल दुखाते है क्या? अब किसी के दिल में घुस कर कौन देखता है लेकिन हां मैं बचपन से सुनती आई हूं कि दिल का रास्ता पेट से होकर गुजरता है इसलिए आपको पता है मैंने सबकुछ कितने प्यार से और दिल से बनाया था मेरे पापा कहते इसके हाथों में तो जैसे जादू है खाना बहुत स्वादिष्ट बनाती है पर सब बेकार " दिव्या
"तुम देखना धीरे धीरे घर के सभी को अच्छे से समझ जाओगी और सबके दिलों में अपनी जगह बना लोगी" अंकित
कुछ दिनों से लगातार अनुजा दीदी का घर में बढ़ते दखलंदाजी और सास से हमेशा अच्छी रकम में पैसो की मांग करते और सासू मां को उससे और अंकित से छुपाकर देते देख दिव्या अपने सास को नपे तुले शब्दों में समझाने की एक छोटी कोशिश की मम्मी जी आपकों सच पता है कि मैं घर में कितना काम करती हूं जॉब करने के साथ भी और अपनी सैलरी भी अंकित के तरह आपके हाथों में लाकर देती हूं , फिर आप क्यों अनुजा दीदी के साथ मिलकर मेरी शिकायत करती हैं आपकों पाता है जब अंकित को सच्चाई मालूम होगी तब क्या होगा? झूठ और सच के बीच एक बारीक सी लकीर होती अगर औलाद उस लकीर को क्रॉस कर जाए तो मां बाप के हाथों बेईज्जत हो जाती है।
"और अगर माता पिता उस लकीर को क्रॉस कर जाए तो?" मुझे पता है तुम बहुत पढ़ी लिखी और तेज़ नज़र वाली हों, दिव्या की मम्मी जी
"तो वे अपने बच्चों के नज़र से गिर जाते हैं खास कर के मां अगर उसके जुबान और हाथ पर काबू नहीं हो तो वह अपने औलाद का सिर झुका सकती है मम्मी जी झूठ के पांव नहीं होते हम न ही झूठ को दबा सकते है और न ही उसे छिपा सकतें हैं वो तो एक न एक दिन सामने आकर मुंह पर थपड़ की तरह पड़ जाता है।" दिव्या
"धन कमाना जीवन का मकसद नहीं होना चाहिए असली जीवन तो किसी का जीवन संवारने में है" देख बहू अनुजा तेरी ननद है उसे कुछ पैसों की ज़रूरत होती है मेरे पास होते है मैं दे देती हूं आख़िर बेटी है वह मेरी, अब तुम पैसों का हिसाब लोगी क्या मुझसे?
"मम्मी जी मैंने कभी खुद के लिए जीना नहीं सीखा क्योंकि जब रिश्तो में ख़ुशी नहीं मिलता तब कड़वाहट आ जाती है किसी को कोई धोखा नहीं देता है यह आपकी उम्मीदे होती है उस इंसान से जो उसे पूरा नहीं करता, अगर आप किसी से प्यार करते है तो उनको वह करने दे जो वह करना चाहता है ना की यह जो आप उनसे करवाना चाहते है।" दिव्या
"ठीक है बहू आइंदा मैं तुम्हारी बात का ध्यान रखूंगी " सासू मां
लेकिन कुछ दिनों से दिव्या की ननद बहुत ज्यादा उसके खिलाफ़ अपनी मां की कान भर घर तोड़ने की कोशिश करने लगी तब एक दिन दिव्या रात को अंकित से घर की बातों से दवे स्वर में अवगत कराने की कोशिश करी ....
" अंकित आजकल दीदी की दखलअंदाज़ी कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी है घर में "
"तुम किसी बात को दिल पर क्यूं ले लेती हो " अंकित
"क्योंकि जब बात बुरी लगती है तब दिल दुखता है और जब दिल दुखाता है तब बात दिल पर ली जाती है " दिव्या
"मैंने पहले भी कहा था हर घर के कुछ तौर तरीके होते हैं " अंकित
मुझे घर के तौर तरीकों से कोई शिकायत नहीं लेकिन दीदी हमेशा मम्मी जी का कान भरते रहती है , उनका यह कहना कि मैं मां के घर से कुछ सीख कर नहीं आई , किसी की इज्ज़त नहीं करती , घर के काम नहीं करती क्या पता जो नौकरी करती हूं उन पैसों में से कुछ पैसे छिपाकर अपने मां के घर भेज देती हूंगी। आज अपने कान से सुनी हूं और तबसे मन में ख्याल आ रहा है आखिर वो चाहती क्या है? दिव्या
"जब मैं तुमसे कह रहा हूं की मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं और रहूंगा तब तुम इन छोटी छोटी बातों को नजरअंदाज करो तभी ज्यादा खुश रहोगी और अगर इन बातों पर ध्यान दे कर दिल में रखोगी तब हमें परेशानी होगी " अंकित
"हमें परेशानी होगी नहीं बल्कि हो रही है और यह तनाव परेशानी दुसरे की वजह से है अब तो मुझे डर लगने लगा है " दिव्या
"किस बात से, क्या डर?" अंकित
"यही की बड़ों को छोटे की ज़िन्दगी में दख़ल देना ज़रूरी है लेकिन बात बात में रोक टोक बात बात में दखलअंदाजी यह ठीक नहीं है " दिव्या
"अब रात ज्यादा हो गई तुम अपना मूड ठीक करों और सो जाते है, मैं कल मम्मी से बात करता हूं " अंकित
सुबह अंकित अपनी मां के हाथ अपने हाथ में लेकर मम्मी आपको दिव्या में अगर कोई कमी नजर आती है तो उससे बेझिझक बोलिए वह उस कमी को दूर करने की कोशिश करेगी पर दीदी से शिक़ायत क्यों?आप सोचिए दीदी ने ख़ुद बड़ी बेटी को ससुराल से बुला लिया है कि वह ससुराल में काम नहीं करेंगी जबकि उसको सिर्फ घर के काम करने के अलावा कुछ नहीं आता। आपकी बहू अच्छी है घर और नौकरी दोनों संभाली है पूरे महीने की तनख्वाह आपके हाथ में देती है और अब क्या चाहिए आपकों? कहीं ऐसा न हो कि रोज रोज के चिकचिक से तंग आकर वह घर छोड़ने पर मजबूर हो जाए क्योंकि जॉब करने वालों को कम से कम अपने घर में शांति होना चाहिए, आसान नहीं होता घर और ऑफिस में रोज़ तरह -तरह की बातें झेलना। मैं आपको बता दूं अगर ऐसी नौबत आएगी तब मैं तो भाई दिव्या के साथ चला जाउंगा यह बात आज आप कान खोलकर सुन लिजिए। उसके बाद रहना आप दीदी के साथ। कभी कभी मां अपनी बहू से नफ़रत करने के चक्कर में कई बार अपने बेटे के रास्ते में कांटे बिछा देती है और उनको इस बात का अंदाजा तब होती है जब बेटा रास्ता ही बदलने पर मजबूर हो जाता है।
सच तो कह रहा है अंकित अनुजा ख़ुद अपने सास ससुर की सेवा कभी नहीं की , न बेटी को करने देती है। जब मन करे यहां आए आखिर मायका है उसका , लेकिन क्या यह उचित है कि जब आए तब सिर्फ़ मुझसे दिव्या की शिक़ायते करें, अब और नहीं मुझको दिव्या की शिकायत सुनना है बल्कि अनुजा को प्यार से समझाना होगा कि तुम दुसरो की शिकायतों को छोड़ हमेशा अच्छा कर्म करो क्योंकि हम जो भी भी करते है वापस हम वैसा ही पाते हैं इसलिए सदैव अच्छा कर्म करो और और जिंदगी को सकारात्मक बनाओ आज के ज़माने में बहुत कम बहुएं होती है मेरी बहू जैसी दोनों कितना ख्याल रखते है कितने आज्ञाकारी है और पता नहीं मैं उनसे और क्या चाहती हूं ?
कई बार जीवन में ऐसा होता है कि कमी ख़ुद में होती है लेकिन इंसान खुद कि कमी को नहीं देख दुसरे पर आरोप लगाते रहता है ख़ुद समस्या होते हैं और सोचते हैं लोग हमारे लिए समस्या कर रहे हैं इसलिए हम अपना रिश्ता ख़राब कर लेते हैं।
