दुख में भावुक नहीं मजबूत बने
दुख में भावुक नहीं मजबूत बने
सबकी लाइफ में कोई न कोई तो दुख होता ही है.... न बेटा इसलिए तो तुमको समझता रहा हूं परिस्थितियां कभी एक समान नहीं होती , जीवन एक खेल है और जो इसे एक खेल की तरह खेलते हुए व्यतीत कर आगे बढ़ते जाते है, वे ज्यादा कुछ नहीं सोचते बस जीवन का आनंद लेते है , क्योंकि जो होता है या जो होने वाला होता है उसमें से कुछ भी न तो उनको मालूम होता और न ही कुछ उनके वश में होता है ; और जो इसे खेल नहीं समझते वे सिर्फ कमियां निकालते हुए कि मेरे साथ ही यह क्यूं और कैसे हुआ में उलझ हमेशा दुखी रहते हैं सुख-दुख दोनों ही जीवन के दो पहलू है बेटा तो आना जाना लगा रहता है।
पर पापा मुझे लगता है मेरे हिस्से दुख कुछ ज्यादा ही है इतने अच्छे से गर्व की परवरिश और देखभाल करती हूं फिर भी यह अक्सर बीमार पड़ जाता है और मैं इसे बीमार देख उदास हो जाती हूं ऐसा सिर्फ मेरे ही साथ क्यूं होता है पापा ?? आप ही बताओं तो क्या मैं ऐसी स्थिति में उदास भी नहीं होऊं और क्या करूं मुझे अपने बच्चें को इस हाल में देखकर सिर्फ़ रोना आ रहा है?
क्या तुमने कभी यह सोचा है की ईश्वर तुम्हे ही उतना बड़ा घर क्यूं दिया किसी और को क्यूं नहीं या फिर गाड़ी नौकर चाकर तुम्हे ही क्यूं दिया उन हजारों लाखों की संख्या वाले बेहद गरीबों को क्यूं नहीं दिया ?? इसलिए बेटा इस समय इस दुख की घड़ी में अपने मन की भावुकता पर काबू पाओ और उस स्थिति में भावुक नहीं बल्कि हिम्मत और मजबूती के साथ उदासी की इस घड़ी में भी अपनी उम्मीद को मत खोयो तुमको उदास देखकर गर्व उदास होगा जिसका प्रभाव उसके सेहत के ऊपर पड़ेगा और वह हालत और स्थिति के हिसाब उसके सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा।
ठीक है पापा मैं बीमार गर्व के सामने नॉर्मल रहने की कोशिश करती हूं
मुझे तुमसे यही उम्मीद थी बेटा आपने आस पास नजरे दौड़ाओ और एक जगह पर बैठकर एक लंबी सांस खींचो और धीरे धीरे छोड़ो काफी रिलैक्स महसूस करोगी| तुम देखना अब गर्व बहुत जल्द ठीक हो जाएगा और तुम उसे जल्द ही डिस्चार्ज करवा कर घर लाओगी जीवन में किसी से अपनी तुलना करने की गलती कभी मत करना सब ठीक हो जाएगा ...
निशा हमेशा अपने पापा से अपनी खुशी और गम बताती और हजारों किलोमीटर दूर बैठे उसके पापा उसके खुशी से खुश होते और गम को सुलझाने की कोशिश करते हुए उसे सांत्वना दे कर ढाढस बंधाने की कोशिश करते रहते आज भी निशा अपने बेटा गर्व को हॉस्पिटल में एडमिट करवाई है और बेटा की हालत देख पापा से दुखड़ा सुना रही। पापा की बातो को समझने के बाद निशा एक निगाह अपने आस पास मौजूद लोगों पर दौड़ाई तो देखा की सिर्फ वही अकेले वहां दुखी और उदास नहीं थी बल्कि न जाने कितने और लोग भी तरह- तरह के दुख लिए एडमिट थे लोगों को देख उसका मन कुछ हल्का महसूस हुआ और बेटे की टेबियत में भी सुधार होने लगा। एक दिन ऐसा भी आया की गर्व पूरी तरह स्वस्थ हो कर हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो कर घर आ गया निशा को अपने पापा की कही हर बात सच लगी|
दोस्तो दुख सबके जीवन में जरूर होता है पर अगर जो इंसान दुख को संभालना नहीं जानता उसे वह ज्यादा महसूस होता है।
