आखिर कौन थी वो
आखिर कौन थी वो
जुलाई के महिना में उस दिन का मौसम बहुत सुहना था, रागिनी और राजीव माँ विंध्यवासिनी देवी के दर्शन करने जाने का प्लान बनाए , रागिनी ख़ुश होकर अपनी ननद को यह बात फोन से बताई , माता जी के दर्शन की बात सुन ननद बोली रास्ते से उनको भी ले लें क्योंकि वे भी अभी तक माता जी का दर्शन नहीं कर पाई है। माता जी का दर्शन तो रागिनी और अजय भी पहले नहीं किए थे अजय ड्राइवर को गाड़ी धुलाने भेज जाने की तैयारी करने लगे।
उत्तरप्रदेश की सीमा से लगे बिहार में आकर फिर दीदी ,जीजा जी को ले कर बिहार से ही होते हुए मिर्जापुर जाना था। यात्रा के लिए घर से निकलने में ही देर हो गई नेशनल हाइवे 28 पर गाड़ी सरपट दौड़ने , लेकिन दिक्कत बिहार के कच्ची और टूटी फूटी सडक पर होने वाली है इस् बात की जानकारी पहले से थी। ड्राइवर मातजी का भक्ति वाला गाना बजाकर माहौल भक्तिमय कर दिया। एक जगह रास्ते में बहुत भीड़ देख रागिनी उत्सुकतावस जानना चाही की भीड़ क्यों है ? तो लोगो से पता चला वह बिहार के प्रसिद्ध लछवार नामक स्थान था जो " भूतो का सुप्रीम कोर्ट" के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ के बारे में लोगों ने बताया की उस स्थान पर बहुत तरह के मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान लोग आते है और अपनी परेशानियों से मुक्ति पाते है , इसलिए वहाँ बहुत दूर -दूर से भी लोग आते है। लोगों का कहना था उनकी समस्याओं से यहां आने के बाद छुटकारा मिल जाता है। रागिनी और अजय देखे की कोई भी इंसान बिना हिले नहीं था , अजीब डारवाना माहौल था । वे लोग वहाँ से जल्दी से निकल गए , वहाँ से कुछ किलोमीटर के दूरी पर कुछ और रिश्तेदार थे उसके बाद दीदी का गांव था।
गांव-देहात में बाजार में या रोड़ पर घर का कोई शख्स अगर आपको देख ले और आप उसके यहां गए बगैर वहां से निकल जाएं तो नाराजगी हो जाती है इसवजह से हम बाकी रिश्तेदरो के यहां होते हुए जा रहे थे। हर रिश्तेदारी में तकरीबन एक से डेढ़ घंटे लग ही जा रहे थे। दीदी का घर गॉव में था इसी वजह से दीदी के यहां हमें जाना था, वहां हम देर से पहुंचे। वहाँ खाना खाया इस पूरे कार्य के बाद घर में सभी रिश्तेदारों से मिलना शुरू किया। उसके बाद जीजा जी और दीदी को साथ लेकर शुरू हुआ सफर शाम को , समय तेजी से निकलने लगा।बिहार के गांव में 7 बजे भी सुनसान जैसा माहौल हो गया था टूटी फूटी गढ्ढे वाली सड़क पर रेंगति हुई बोलेरों गाड़ी चलती जा रही थी। जब 9 बजे से भी ज्यादा का समय हो गया तब थोड़ा ठीक रोड आया। गांव के रास्ते में एक जगह खासी चर्चित बात यह थी की कुछ जगह किसी जमाने में लुटेरों का आतंक रहा करता था। यहां के किस्से घर घर में बहुत सुनने को मिलते थे। उस दिन पहली बार इतनी रात को हमें वहां से निकलना था। पूरा रास्ता कीचड़ सना हुआ था। जरा सी चूक से गाड़ी स्लिप कर सकती थी। सड़क तो गांवों में आज भी बुरे हाल में है 20 साल पहले उसका क्या हाल होगा समझ ही सकते।
झमाझम बारिश शुरू हो गई। वह तो मानों तय करके आई थी कि आज रुकना ही नहीं है तकरीबन 40-45 मिनट बाद बारिश काफी कम हुई। हालांकि बूंदाबांदी अभी भी हो रही थी। जहाँ भी हमारी गाड़ी को ठीक ठाक रोड मिलती थोड़ी तेज़ रफ्तार से सरपट भागने लगती।
रोड काफी सुनसान था सिर्फ गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी ही नजर आ रही थी। बाकी कहीं कोई निशान न था। रागिनी और उसकी ननद डर से सहमी जा रही थी कहीं शरपत के पीछे से लाठी लिए लोगों का झुंड न आ जाए। बारिश की बूंदाबांदी के बीच भी इस डर से दोनो का गला सूख चुका था। गाड़ी से सबने देखा कि सामने एक बड़ा सा साँप सड़क पार कर रहा था. उसकी लंबाई करीब 4 फीट रही होगी. इसके 4 सेकेंड बाद ही एक काली बिल्ली हमारा रास्ता काटकर चली गई अज्ञात भय से मन अशांत होने लगा अभी कुछ ही दूर आगे बढ़ने के बाद नेवला रोड़ से दाए से बाए पर कर निकल गया।इस सुनसान रास्ते में सबका हौसल पास्त हो गया था क्योंकि सुनसान ड्राइवर से लेकर सभी के लिए अनजान और सुनसान था और डरावना भी। में हमारी गाड़ी के सामने हम लोगों ने जो देखा वो होश उड़ा देने के लिए काफी था। सफेद साड़ी में एक बूढ़ी महिला चले जा रही थी। गाडी की रोशनी ने उसकी साड़ी की चमक और बढ़ा दी थी लगभग 7 फिट लम्बी , घने घुटनों तक लम्बे खुले बिल्कुल सफ़ेद वालों वाली। उस समय रात के ठीक बारह बज रहा था। लगातार बारिस हो रही थी कुछ दूर जाने के बाद ऐसा महसूस हुआ हम रास्ता भटक चुके है और गलत रास्ते पर जा रहे हैं उस समय के जमाने में ना स्मार्ट फोन था ना गूगल मैप। रात को हाइवे से दूर बंद घरों से टिमटिमाती हुई रोशनी दिखाई दे रही थी। हल्की बूंदा बंदी कुछ कदम और बढ़ने के बाद सामने अचानक एक रेलवे ढाला दिखा जो बंद था शायद कोई ट्रेन आने का समय था। अचानक ड्राइवर के खिड़की के पास काला कंबल ओढ़े एक बुढ़ियां हाथ मे लालटेन लिए ठक -ठक कर खिड़की पर इशारो से टूटी -फूटी आजमगढ़ के स्थानीय भाषा में बताई की हम माता जी के दशर्न करने जा रहे है और रास्ता भटक चुके है और हमे कैसे किस सही रास्ते से होते हुए अपनी मंजिल तक जाना होगा तब माता जी की दर्शन करना संभव होगा गाड़ी में बैठे सभी लोगों के साथ ड्राइवर भी इस बात से अचंभित था की इनको बिना बताए कैसे इस बात की जानकारी हुई की हम सब देवी दर्शन को जा रहे है। लेकिन सभी ने उनकी बात पर ध्यान दिया और उनके बताए रास्ते पर गाड़ी मोड़ दिया। जैसे गाड़ी मुड़ी रागिनी के साथ गाड़ी में बैठे सभी ने पीछे मुड़कर देखा तब ना कोई ढाला था ना ही कोई बुढ़ियां फिर आखिर कौन थी वो ? सभी के साथ बहुत ज्यादा डर गई थी रागिनी ,सब लोग सही सलामत विध्याचल पहुंच गए।
विध्याचल पहुँच रात को होटल बिड़ला में रुकना हुआ। अगले दिन सुबह तड़के 4 बजे उठकर गंगा नहाकर प्रसाद लिए और लाइन में सभी दर्शन के लिए खड़े हो गए। मंदिर के पुजारी पास आया और बोला अगर आप लोग अंदर जा कर ठीक से देवी दर्शन करना चाहते है तो उसके लिए पैसा निकालिए , उन्हे पैसा दिया गया तब पता नही कैसे माता जी के पास अंदर ले गए और उनकी पैरों को छु कर दर्शन करने का सौभाग्य मिला।
वापसी समय भी आने में देरी हुई लेकिन कल से कम गाड़ी सुनसान सड़क पर रेंग रही थी तभी बिच खेत में लालटेन लिए उजाला धोती पहने इंसान गाड़ी रोक जाति का नाम पूछा सबको डरे
देख आगे जाने दिया और वह इंसान भी गायब हो गया। 9 बजे दीदी , जीजा जी को छोड़ रागिनी , राजीव अपने घर आने लगे दीदी बहुत रोकना चाही लेकिन नहीं रुके।
लगभग 11 बजे वे लोग अपने घर आ गए। ताला खोल सही सलामत जब अपने घर में प्रवेश किया तब सुकून की सांस लेती रागिनी , राजीव के कंधे का सहारा लेते हुए अपने कमरे की ओर धीरे धीरे बढ़ रही थी। वह 24 घंटे की खौफनाक उस अनजान रास्ते से सबक ले चुकी थी। जीवन में कभी नहीं भूलने वाले उस यात्रा को भुलाने कि कोशिश कर रही थी जो की असंभव था। उस यात्रा से उसको एक सबक जरूर मिला अगर बहुत जरूरी नहीं हो तब रात रास्तो वाला अनजान सफ़र रोक देना चाहिए।

