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Pradeep Kumar Tiwary

Abstract

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Pradeep Kumar Tiwary

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समंदर

समंदर

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समंदर ....मैंने आज तुम्हें नही देखा कभी मन ही नही किया तुम्हें देखने का ,पर आज ..आज मैं सोचता हूँ कि कभी तुमसे मिलूँ आकर..किनारे पे बैठ के तुमसे कुछ बातें करूँ और ये सिर्फ यूँ ही नही है ऐसा अब इसलिए लगता है क्योंकि मुझे पता नही क्यों ऐसा लगता है कि हम दोनों एक जैसे है । हमारी शुरुआत तो हुई पर अंत कब होगा कहाँ होगा कैसे होगा हम दोनों ही नही जानते । तुम भी तो खारे पानी को ढ़ोते हुए चल रहे हो और तुम्हें बता दूँ मैंने भी अपने अंदर खारे पानी को संभाल रखा है..हां तुमने अपने सीने में तो मैंने अपनी आँखों में ।

तुम्हारे सीने में भी रंग बिरंगी मछलियाँ है मेरे सीने में भी है और वो रंग बिरंगी मछलियाँ है मेरा बचपन , कुछ खुशी के लम्हें कुछ दोस्तों के साथ बिताए हुए पल कुछ अच्छी यादें ; मैं भी इन रंग बिरंगी मछलियों के साथ एक अंतहीन सफर पे हूँ कहने को रिश्तों के किनारे भी है पर वहां तक पहुंच पाना मेरे नसीब में नही है जैसे तुम्हारी लहरें किनारे से टकरा के वापस आ जाती है वैसे मैं भी उन रिश्तों से टकरा के वापस आ जाता हूँ आगे के सफर के लिए । जैसे बड़ी बड़ी शार्क उन रंग बिरंगी मछलियों को जो ख़ुशियों की प्रसन्नता की हर्ष की प्रतीक है को खा जाती है वैसे मेरी तकलीफों मेरे दुःखो की ये शार्क मेरे अंदर की खुशियों को खाए जा रही है ..कई लोग मिलते है नाव की तरह जहाजों की तरह पर उन्हें मुझसे कोई प्रेम नही है..नही उनके लिए मैं भी एक जरिया हूँ तुम्हारी तरह जिसका इस्तेमाल कर वो अपनी मंज़िल तक पहुंच जाते है और हमें अकेले छोड़ जाते है कुछ यादों के साथ तिल तिल कर मरने के लिए । मैं और तुम एक जैसे ही है मेरे दोस्त समंदर..मैं आऊँगा तुमसे मिलने क्योंकि मैं खुद को देखना चाहता हूँ तुम्हारे अंदर चीखते शोर मचाते एक अंतहीन सफर पे अग्रसर....


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