शून्य का रहस्य.
शून्य का रहस्य.
शून्य का रहस्य.
हिमालय की गहरी वादियों में बसा एक छोटा सा गाँव था, जो धुंध और ठंडी हवाओं की गोद में साँस लेता था। बर्फ से ढकी चोटियाँ उसे चारों ओर से घेरे रहतीं और संकरी पगडंडियाँ देवदार के जंगलों से होकर गुजरतीं। हर मोड़ पर ऐसा लगता मानो कोई अनदेखी आँखें देख रही हों। यहाँ की निस्तब्धता साधारण नहीं थी—उसमें एक अजीब कंपन था, जैसे पहाड़ों के भीतर कोई प्राचीन रहस्य दबा हो।
इसी गाँव में रहता था कासम। गहरी आँखों वाला, चुपचाप रहने वाला, और हमेशा किसी अनजाने विचार में डूबा हुआ। लोग कहते थे कि वह बचपन से ही अलग था—कभी अकेले जंगलों में भटकता, कभी रातों को आसमान को घूरता। उसकी सबसे बड़ी जिज्ञासा थी "शून्य तारा"। गाँववाले उसे शुभ मानते थे, पर कासम को उसमें अजीब बेचैनी महसूस होती थी। उसे लगता था कि उस तारे में कोई रहस्य छिपा है, जो सिर्फ उसी को पुकार रहा है। बुज़ुर्ग अक्सर कहते—कासम की आँखों में अंधकार है, और जिस रहस्य को वह खोज रहा है, शायद वही उसे निगल ले।
हर रात वह तारा बदलता—कभी बिंदु, कभी गोल, और कभी अचानक गायब। कासम को लगता था कि यह तारा उसे बुला रहा है। धीरे-धीरे उसकी नींद गायब होने लगी, और उसकी सोच अजीब हो गई। वह दीवारों पर गोल निशान बनाने लगा, मानो शून्य को पकड़ लेना चाहता हो। एक रात उसने ध्यान लगाया और उसकी चेतना शून्य में उतर गई। वहाँ न समय था, न दिशा—केवल सन्नाटा। अचानक उसने देखा कि अंधेरे में परछाइयाँ हिल रही हैं। वे इंसानों जैसी थीं, पर उनके चेहरे नहीं थे। एक आवाज गूँजी—“शून्य खाली नहीं, यह भूखा है। हर आत्मा को निगलने के लिए तैयार।”
कासम ने भागने की कोशिश की, पर उसके चारों ओर अनगिनत आँखें चमक उठीं। वे आँखें शून्य से जन्मी थीं, और उनमें कोई दया नहीं थी। जब वह लौटा, उसका चेहरा पीला था और उसकी आँखें खाली। उसने गाँववालों से कहा—“शून्य हमें सृजन नहीं देगा, यह हमें मिटा देगा। जो इसे देखेगा, वह धीरे-धीरे गायब हो जाएगा।”
उस रात से गाँव में अजीब घटनाएँ होने लगीं। लोग नींद में चलते-चलते गायब हो जाते। घरों की दीवारों पर गोल निशान उभरते, जैसे किसी ने शून्य को उकेरा हो। और फिर एक ठंडी रात, गाँव का पूरा चौक खाली मिला। केवल एक बड़ा गोल निशान ज़मीन पर था। कासम कहीं नहीं था। उसकी आवाज़ हवा में गूँजी—“शून्य ही आरंभ है, शून्य ही अंत। अब तुम सब मेरे साथ हो।”
गाँव का अस्तित्व मिट गया। हिमालय की वादियों में अब केवल धुंध और सन्नाटा बचा था। लोग कहते हैं कि कासम खुद मिट चुका था, पर असल में वह अपने ही मन के शून्य में समा गया।
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