शुभ मुहूर्त
शुभ मुहूर्त
अपने परिवार में विवाह का उत्सव था,सभी से मिलने ,पुरानी यादें ताज़ा करने का शुभ अवसर भी..इसी लिए मेधा जाने को उत्सुक थी..मायके पहुँचने पर सभी से मिली। मेहमानों की गहमा- गहमी ,नाच-गाना ,खाना पीना ,बच्चों की मस्ती शोर गुल में दिन कब बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम तक नीलू चाची दिखाई नहीं दी। वही तो घर की रौनक थी हर काम में आगे, सभी उसी को बुलाते थे।
पूछने पर माँ ने बताया ''मेधा! क्या कहूँ? तेरे चाचा के एक्सीडेंट में स्वर्गवासी होने के बाद यहाँ सबकुछ बदल गया..घरवालों के व्यवहार से दुखी होकर उसे मायके जाना पड़ा, वहाँ भी अब उसकी ज़िन्दगी सब पर एक बोझ ही है। ''
''अब शुभ कार्यों में उसे शामिल नहीं किया जाता इसी लिए बुलाई नहीं गयी ''
पर माँ ! चाची तो पढ़ी लिखी थी। उनके आने के बाद ही तो हमारे घर की लड़कियों को भी पढ़ने का अवसर मिला था, मेरे कॉलेज जाने में उन्हीं का कितना योगदान था ?तो आपने उन्हें कैसे जाने दिया ? नौकरी कर अपना जीवन जी सकती थी ?''
''बेटी ! तुम ही कुछ कर सकती हो, हम तो इन रूढ़ियों को तोड़ नहीं पाए। उसने तुम को शिक्षा से समर्थ बनाया न ?
'और हाँ ! दादा- दादी को कौन समझाए ? उनके अनुसार तो दोष उसका ही था जो पति का एक्सीडेंट हुआ। उनका बेटा न रहा। उसी की सजा दी गयी।''
मेधा को अतीत में खींच ले गयी माँ की बातें।
वह सातवीं -आठवीं में थी जब चाची इस घर में आई थी, मेधा और उसकी बहन पढ़ना चाहती थीं और घरवाले उन्हें चूल्हे चौके की शिक्षा देना ज़रूरी समझते थे। तब चाची ने ही हर किसी को मनाया। माँ -पापा को समझाया। दादा -दादी भी बेमन से ही सही माने तो सही। उसे याद आया चाची तो घर की लाड़ली बहू थी फिर जब उसे परिवार का साथ चाहिए था तो सब कैसे बदल गए ? रिश्तों का स्वार्थीपन या अंधविश्वास ?
तभी विवाह के मुहूर्त की बातें होने लगी सब मंडप की ओर जाने लगे।
मेधा अचानक उठी ''माँ ! मुझे जल्दी ही निकलना होगा। मैं चाची को अपने घर ले जाऊँगी। अपनी योग्यताओं से उन्हें स्वयंसिद्धा बनाने का मुहूर्त निकट आ गया है।
