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Krishan Dutt

Abstract Inspirational Others

4  

Krishan Dutt

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

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श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
    

श्री कृष्ण की पर्सनेलिटी और उनकी आध्यात्मिक स्थिति वास्तव अवर्णनीय है। उसे वर्णन करते समय हमारे शब्द छोटे पड़ जाते हैं। कहते हैं, जिस बात को नहीं कहा जा सके, उसे नहीं ही कहना चाहिए। That which cannot be said, must not be said. लेकिन फिर भी अतीत के समय के कुछ अध्यात्म के योगियों (अनुभवियों) ने अध्यात्म के गूढ़ अवर्णनीय ज्ञान को कुछ संकेतों में कहने का प्रयत्न किया है। जिन्हें हम अध्यात्म के शास्त्र कहते हैं उन संकेतों से भरे हुए हैं। उन्होंने ये संकेत इसलिए दिए थे ताकि इन संकेतों से मानव मात्र की बुद्धि में यथार्थ ज्ञान की एक किरण उद्भूत हो जाए और सम्पूर्ण मानवीय दुनिया का कल्याण हो सके।

    लगभग 5000 वर्ष पुराने श्री कृष्ण के जीवन के सभी वृतान्तों का ठीक उसी रूप में मौजूद रहना जैसे कि वे वास्तव में थे, यह कठिन बात है। क्यों?  क्योंकि मानवीय स्मृति की भी एक सीमा होती है। मनुष्य समय के साथ बहुत सी बातों को भूलता चला जाता है। अतीत के समय में  ऐतिहासिक वास्तविक स्मृतियों को रिकॉर्ड करने का कोई उपाय नहीं था। मनुष्यों के स्मृति पटल पर स्मृतियां पुनः पुनः उभरती रहती हैं और समय बीतने के साथ उसी पुराने इतिहास में कथा-कहानियों, अनुमानों और प्रक्षेपों का जुड़ जाना स्वाभाविक सी बात है।

   श्री कृष्ण के बाल रूप में मक्खन खाने और चुराने के चित्र का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ 'गुणग्राहक अंतर्दृष्टि' होता है। जैसे दूध से मक्खन निकाला जाता है, वैसे ही हर स्थिति, हर व्यक्ति या हर वस्तु में से केवल साररूप गुण को ग्रहण करना चाहिए और व्यर्थ को त्याग देना चाहिए। परिस्थितियों या विघ्नों के बावजूद कृष्ण का मक्खन पर से ध्यान न हटना यह दर्शाता है कि हर परिस्थिति में उनकी गुणग्राहक वाली सूक्ष्म दृष्टि सदा कायम रही। श्री कृष्ण अध्यात्म के प्रथम प्रणेता थे। अध्यात्म विज्ञान भी यही कहता है कि बौद्धिक तर्क वितर्क कुतर्क की बजाय उतना ही ज्ञान (समझ) पर्याप्त होता है जिससे आत्म चेतना का उत्थान हो सके और जीवन सतोप्रधान स्थिति वाला हो सके। 'गुणग्राहकता' ही जीवन और ज्ञान के विकास का मूल आधार है।

   अतीत के समय में ज्ञान के गूढ़ सत्यों को समझाने के लिए भाषा की सीमाओं के कारण रूपकों और चित्रों का सहारा लिया गया। अध्यात्म में सांवला रंग सर्वाधिक गहराई का प्रतीक है। यह श्री कृष्ण की आत्मा की अंतर्मुखता, अनासक्ति और ज्ञान की अतल गहराई को दर्शाता है। जो आत्मा जितनी अंतर्मुखी और अनासक्त होगी, उसकी अंतर्दृष्टि उतनी ही ज्यादा गुणग्राहक होगी और विकसित होगी।

   श्री कृष्ण के व्यक्तित्व को परिस्थितियों से घिरा हुआ, उलझा हुआ दर्शाया गया है। लेकिन वास्तव में श्री कृष्ण एक सुलझे हुए व्यक्तित्व थे। उस समय की परिस्थितियां ही उलझी हुई जटिल थीं। उस समय के लोग ही उलझे हुए थे। लेकिन श्री कृष्ण तो स्वयं में सुलझे हुए अलौकिक व्यक्तित्व के रूप में उभरकर विश्व के समक्ष प्रत्यक्ष हुए थे।

    उनका विश्व रूप दर्शन भी दर्शाया गया है। यह आत्मा द्वारा ज्ञान-योग की साधना की पराकाष्ठा और दिव्य चेतना की अवस्था का सूचक है। इससे पता चलता है कि उनकी आध्यात्मिक शक्तियों के माध्यम से परमात्म शक्तियां कार्य कर रही थीं। गौर से देखें तो श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन और अभिनय मुख्य रूप से तीन आत्मिक गुणों जैसे आत्मिक ज्ञान, आत्मिक शांति और आत्मिक प्रेम को ही दर्शाता है। श्री कृष्ण की पर्सनेलिटी के बारे में, उनके चरित्र के बारे में अन्य भी अनेक कथा कहानियों का वर्णन है। उन सबका जिक्र हम यहां नहीं कर रहे हैं। वास्तव में उन सबका भी आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ होता है।

    *श्री कृष्ण की पर्सनेलिटी के बारे में सब बातों की एक बात - श्री कृष्ण के उनके सभी कर्तव्यों और वृतांतों में, उनके व्यवहार में केवल अनासक्ति, निश्छल प्रेम और शांति ही झलकती है। फिर भी उनकी पर्सनेलिटी अनसमझी रही है, जिन्हें सम्पूर्ण तरह से समझा नहीं जा सकता। श्री कृष्ण को यथार्थ रूप से समझने के लिए अध्यात्म की गहरी अंतर्दृष्टि अनिवार्य है। कितना भी समझें फिर मानवीय बुद्धि एक सीमा पर आकर "सर्व धर्माणी पारिताज्य, मामेकम शरणम् बज्र:" हो जाती है। हे प्रभु, तेरी लीला, तू ही जाने - ऐसा कहकर मनुष्य का अहंकार घुटने टेक देता है। सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।* Share it to others and inspire. Thank you. 


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