शिवबाबा को भैया बनाऊंगी
शिवबाबा को भैया बनाऊंगी
शिवबाबा को भैया बनाऊंगी। "एक बाबा दूसरा ना कोई" परमात्मा शिवबाबा के ही साथ सर्व संबंध के परिप्रेक्ष्य में... शिवबाबा को राखी बांधने के परिप्रेक्ष्य में..... यह कैसी अद्भुत राखी !? यह कैसा भैया का संबंध !? क्या यह ऐसा संभव भी है? बहुत से भावनाओं में बहने वाले लोग इसे यथार्थ रीति नहीं समझते हैं। बहुत से भावना प्रधान लोग अपने जीवन का भौतिक और अभौतिक स्थितियों का संतुलन खो देते हैं। मानवीय मनोविज्ञान कहता है कि यदि एक बार जीवन का यह संतुलन खो जाता है, तब जीवन के अनुभव सदा अधूरे रहते हैं। मनुष्य कलाहीन (अपूर्ण) रहकर भटकते रहते हैं। इसे संक्षिप्त में ठीक से समझते हैं। क्यों नहीं। कोई भी जीवात्मा अवश्य शिवबाबा को भैया बना सकती है। उसको राखी बांध सकती है। यह उसका अपना विवेक और भावना का विषय है। यह किसी भी जीवात्मा की एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक सच्चाई हो सकती है। यह नितान्त निजी आध्यात्मिक और भावनात्मक अनुभव की बात है। इसमें कोई भी किसी को नहीं रोक सकता है। इसलिए शिवबाबा सदा ही कहते हैं कि मैं भोलाभंडारी हूं, मेरे द्वार दरवाजे सदा सबके लिए खुले हैं। अमृतवेले के समय के लिए भी इसलिए विशेष कहते हैं, क्योंकि उस समय आप जीवात्माएं मेरे पास आने के लिए मानसिक रूप से ज्यादा comfortable रहते हो। मैं तो आठ पहर चौसठ घड़ी comfortable ही रहता हूं। कोई कभी भी आओ और अपनी झोली भरो। शुद्ध भावनाओं की उड़ान भरकर कभी भी आओ और आत्मिक खजानों के अनुभव को बढ़ाओ। इसके लिए किसी गणितीय या वैज्ञानिक प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। इसी संदर्भ में संसार में एक कहावत प्रचलित है कि "जहाँ ना पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि"। भावनाओं की fantasy की दुनिया किसी भी व्यक्ति की निजी दुनिया है। पूरा भक्ति का विज्ञान ही इसी अवधारणा पर खड़ा हुआ है। भक्ति की परंपरा में अनुभव हैं पर प्रमाण नहीं हैं। कोई इक्का दुक्का प्रमाण देखे जा सकते हैं, वह बात दूसरी है। शुद्ध भावनाओं से निर्मित जीवात्मा अपने इमेजिनरी संसार में जो चाहे वह सोच सकती है। अपनी शुद्ध भावनाओं के बल पर जो चाहे सूक्ष्म लेवल पर अनुभव कर सकती है। उसमें मन और भौतिक शरीर की कोई बाधा नहीं होती है। कोई भी जीवात्मा जिसकी भावनाएं शुद्ध हैं, वह शुद्ध भावनाओं से कहीं भी जाकर आ सकती है। इसे astral journey कहते हैं। इसमें स्थूल रूप का कहीं जाना आना नहीं होता है, पर सूक्ष्म अदृश्य रूप का आना जाना हो जाता है। यह व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव की बात है। इसमें कोई नुकसान नहीं, बल्कि चेतना के बहुत गहरे लेवल पर लाभ ही लाभ होता है। इससे अनुभव करने वाली जीवात्मा की आध्यात्मिक समृद्धि बढ़ती है। आध्यात्मिक समृद्धि अनेक प्रकार की प्राप्तियां के होने के लिए आधारभूमि बनती है। इसके मर्म को समझें। सर्व संबंध एक बाबा से रखना या मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा ना - जीवात्माओं की इस मनोदशा और भावदशा को बढ़ाने का प्रयास पुरुषार्थ जो कराया जाता है, वह आखिर है क्या? इसे ठीक से समझें। इसे यथार्थ नहीं समझोगे तो जीवन में असंतुलन की स्थिति रहेगी। असंतुलन की स्थिति से भी जीवन किसी तरह के परफेक्शन से जिया जा सकता है लेकिन संपूर्णता और जीवनमुक्ति के अनुभव से नहीं जिया जा सकता है। दरअसल इसका भावार्थ क्या है? ऐसी मनोदशा और भावदशा को बढ़ाने का पुरुषार्थ इसलिए करवाया या किया जाता है, क्योंकि हम जीवात्माओं के आध्यात्मिक स्तर (लेवल) कम होते होते अब वह केवल टिमटिमा रहा है। हमने अन्य भौतिक दिशाओं में उन्नति की है, लेकिन लंबी जीवन यात्रा में हमारा अध्यात्म का कोना खाली हो चुका है। हमारे अंदर हजारों वर्षों से आध्यात्मिक विपन्नता पैदा हो गई है। यह भी चेतना का खालीपन (hollowness) है। यह भैया बनाऊंगी और एक शिवबाबा दूसरा ना कोई, यह हमारे जीवन के उस आध्यात्मिक कोने को भरने का संकल्प /पुरुषार्थ है। यह आत्मा का अनुभव करने के पाठ को ही पक्का करके के लिए पुरुषार्थ कराया जाता है। यह आत्मिक दृष्टि को ही पक्का कराने के पुरुषार्थ की बात है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम भौतिक या जीवन के व्यावहारिक पक्ष को इग्नोर कर दें। जीवन मे भावना और विवेक का, स्पिरिचुअल एनर्जी और फिजिकल एनर्जी का, लौकिक और अलौकिक संबंधों का अनिवार्य संतुलन जरूर होना चाहिए। शुद्ध भावना आत्मा के ज्यादा निकट है। इसलिए शुद्ध भावना का पलड़ा आत्मा के ज्यादा निकट होता है। इसलिए शुद्ध भावना का पलड़ा ऑटोमेटिकली (नेचुरली) ही परसेंटेज में ज्यादा भारी होता है। बुद्धि का पलड़ा आत्मा के निकट नहीं है। इसलिए बुद्धि का पलड़ा भावना के पलड़े से परसेंटेज में कम भारी होता है। भावनाओं के पलड़े को अतिशय इकतरफ ही झुका देना, यह अतिरेक (expreme स्थिति) की स्थिति भी ठीक नहीं होती है। यह एक इमोशनल imbalance स्थिति बन जाती है। इसलिए आध्यात्मिक जगत के अनुभव विशेष करते हुए यह ध्यान रखना जरूरी होता है कि आध्यात्मिक साधक (राजयोगी) जीवन के दूसरे आयाम, भौतिक आयाम का भी संतुलन रखे, जिसे हम जमीन से जुड़ा रहना कहते हैं। अनुभवी प्रबुद्ध पुरुष कहते हैं कि भक्ति का पलड़ा अपनी शुद्धता की पराकाष्ठा में सदा ही ज्ञान के पलड़े से भारी रहता है। मनुष्य जीवन की सच्चाई यह है कि जीवन के व्यावहारिक पक्ष में भावनाओं का पलड़ा 60% से ज्यादा ही रहता है। बुद्धि का पलड़ा 40% से ज्यादा नहीं हो पाता। सृष्टि के सतोप्रधान समय में सभी आत्माओं का यह परफेक्ट संतुलन 60%और 40% का रहता है। इसलिए आप अपनी शुद्ध भावनाओं की अश्रु धारा बहाते हुए परमात्मा शिवबाबा के संग खूब राखी बंधवाने और बांधने का अनुभव कर लीजिए, आप शिवबाबा को खूब भैया बना लीजिए। उसके साथ अपने सभी संबंधों का अनुभव कर लीजिए। यह आपका व्यक्तिगत आध्यात्मिक सत्य अनुभव है जो आपके अन्तर्जगत में घटता है। लेकिन व्यावहारिक सत्य अलग है। इसलिए ही आपका केवल परमात्मा शिवबाबा के संग ही राखी मनाना साकार व्यावहारिक जगत में मान्य नहीं होगा। क्यों? क्योंकि आपके जो साकार संसार में लौकिक/अलौकिक संबंध हैं, उनका क्या करिएगा? क्या आप उन्हें इग्नोर करिएगा? नहीं। आप उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते हैं। आप जीवात्मा हैं। आप इस संसार में सिर्फ आत्मा नहीं हैं। व्यावहारिक जगत में मानवीय संबंध भी आपसे आत्मिक मूल्यों की मांग करते हैं। आपका जीवन सामूहिक/पारिवारिक है। भौतिक धरातल पर संबंधों में आत्मीयता का अनुभव होना अनिवार्य होता है। शुद्ध भावनाओं के धरातल पर शिवबाबा के साथ और मानवीय संबंधों के धरातल पर जीवात्माओं के साथ राखी बांधने बंधवाने के अनुभव में समरसता होनी चाहिए। जीवात्माओं के जीवन में fundamental आत्मिक और भौतिक अनुभवों में अद्भुत समरसता सुकून भरे जीवन का एक अनिवार्य तत्व है। तब उस स्थिति में व्यावहारिक संसार/समाज आपके आध्यात्मिक अनुभवों को स्वीकार करता है, मान्यता देता है। साकार संबंधों की दुनिया में केवल कवि बनने से ही काम नहीं चलता है। साकार संबंधों की दुनिया में जीवात्मा के रूप में केवल शुद्ध भावनाओं से रवि के साथ निराकारी स्थिति में रहने से भी काम नहीं चलता है। रवि अर्थात् (ज्ञान सूर्य) के साथ भैया (सर्व संबंध) का अनुभव करने से या मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा ना कोई - ऐसा अनुभव कर लेने से भी काम नहीं चलता है। ईश्वरीय महावाक्य कई बार रिपीट हो चुके हैं कि साकार सृष्टि में हम जीव आत्माओं का जीवन अद्वैत नहीं है। जीवन सदा भौतिक ऊर्जा और आध्यात्मिक ऊर्जा से चलता है। परमात्मा शिवबाबा के प्रति शुद्ध भावनाएं और संबंध मानवीय भावनाओं को सुदृढ़ और शुद्ध बनाती हैं। पर दूसरी ओर हमारा पूरा जीवन ही मानवीय संबंधों का ही ताना बाना है। मानवीय संबंधों पर ही टिका है। इसलिए व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव प्रैक्टिकल में मानवीय संबंधों में भी करना पड़ता है। जब जीवात्माओं के जीवन में अभौतिक और भौतिक का असंतुलन रहता है तो उनकी स्थिति कैसी रहती है, हम समझ सकते हैं। सम्पूर्ण संतुलन ही सम्पूर्ण जीवन है। जीवन की अपूर्णता में अनुभव भी अपूर्ण ही होंगे। अपूर्णता में अनुभव भी अपूर्ण (अधूरे) ही होंगे। सार में तात्पर्य यह हुआ कि अलौकिक जगत के व्यक्तिगत आध्यात्मिक सत्य को अनुभव करने लिए अलग प्रकार का पुरुषार्थ अनिवार्य होता है। लौकिक व्यावहारिक सत्य का अनुभव करने के लिए अलग प्रकार का पुरुषार्थ करना अनिवार्य होता है। बुद्धिमत्ता कहती है कि लौकिक व्यावहारिक सत्य को अनुभव करने का पुरुषार्थ पहले करना चाहिए। जो श्रेष्ठ पुरुषार्थी दोनों तरह के पुरुषार्थ को कर लेते हैं, उनके जीवन की लौकिक/ अलौकिक छवि के तो क्या कहने!! इसलिए हम जीवात्माओं को भावनाओं में बहक कर बहना नहीं है। इसके अंतर्निहित अर्थ को समझें। शुद्ध भावनाओं का आध्यात्मिक पलड़ा हमारे विवेक ज्ञान के (भौतिक) पलड़े को चार चाँद लगा देता है और जीवन को संतुलन में रखते हुए हमें सतोप्रधान स्थिति रखता है। इसलिए यह आध्यात्मिक पुरुषार्थ किया और कराया जाता है। मैं तो शिवबाबा को भैया बनाऊंगी.....इसपर recently ही किसी भाई ने एक गीत भी बनाया हुआ है.... 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