शहतूत के पेड़....
शहतूत के पेड़....
फोन की घंटी बजी,
hello,
दीदी, कैसी है आप ? और कब आ रही है? अब तो बच्चों की भी छुट्टियां हो गई है, लेकिन आपने आने का तो कुछ बताया नहीं, रेनूका भी कह रही थी, कि वो यहां bore हो रही है, दीदी और बच्चों को बुला लो, हां एक खुशखबरी भी है, आप ना बुआ बनने वाली हैं।
अरे, नालायक तुझे शर्म नहीं आ रही, ये बताते हुए
कहां है तेरी बीवी? जरा उसे phone दे,
दीदी, मुझे तो नहीं आ रही शर्म लेकिन उसे शर्म आ रही है, तभी मुझसे कहा, आपसे बात करने को।
जरा उसे phone दे, उसे समझाना पड़ेगा ना कि उसे कैसे अपना ख्याल रखना है?
हां, दीदी नमस्ते, कैसी है आप?
मैं, ठीक हूं, तू बता, कोई परेशानी तो नहीं है, रेनूका बोली
और अगर है तो तू मुझसे खुल कर बोल सकती है, मैंने कहा
नहीं कोई परेशानी नहीं है, अकेलापन लग रहा था ,शरद तो दिनभर के लिए institute चले जाते हैं, तो अकेले अच्छा नहीं लगता, बस, रेनूका बोली।
तू चिंता मत कर मैं current का reservation देखती हूं, जल्द से जल्द मैं बच्चों के साथ आने की कोशिश करती हूं, मैंने कहा।
और दीदी आपके लिए एक surprise है, आप आओगी तभी पता चलेगा आपको, रेनूका बोली।
अच्छा अब रखो, मैं reservation देखती हूं कब का मिलता है।
और मैंने phone रख दिया।
और दो दिन बाद का reservation मिल गया, मुझे और मेरे दोनों बच्चों को मेरे husband, station तक छोड़ने आए, हम लोग platform की bench पे बैठ गये और train के आने का wait करने लगे, तभी दूसरी bench पर बैठा हुआ एक शख्स मुझे जाना पहचाना सा लगा, लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा था और वो मुझे पहचानने की कोशिश कर रहा था या शायद पहचान गया था, आखिर कौन है, मैं अपने दिमाग पर बार -बार जोर डाल रही थीं कि आखिर मैंने इसे कहां देखा है,
फिर train आ गई, और हम अपनी सीटों पर जा पहुंचे लेकिन यह क्या? वहीं शख्स फिर से मेरी सामने वाली सीट पर था और थोड़ा nervous था।
फिर train चल पड़ी और husband भी हमें बाहर से बाय बोल रहे थे, फिर थोड़ी देर में बच्चों को भूख लगी तो मैंने उन्हें खाना दिया, फिर ticket check करने आए व्यक्ति ने सबके ticket check किए और सबका नाम पूछा, तब मुझे उस शख्स का नाम पता चला और फिर सब याद आने लगा।
फिर मैंने उस शख्स से पूछा!
क्यों, धीरेन्द्र पहचाना ही नहीं? कि ना पहचानने का नाटक कर रहे हो।
तब उसने, मेरी तरफ देखा और कहा , मैंने तो station में ही पहचान लिया था लेकिन बात करने की हिम्मत नहीं हुई।
और सुनाओ कैसी हो? उसने पूछा।
मैंने कहा, मैं तो ठीक हूं लेकिन तुम ठीक नहीं लग रहे और तुम अपनी इस हालत के जिम्मेदार खुद हो, काश तुमने जो बीस साल पहले फैसला लिया था, वो उस समय ना लेते।
और शादी की, मैंने पूछा।
तो उसने सर हिलाकर ना में जवाब दिया।
कहां, गायब हो गये ना Facebook हो, ना Twitter, ना Instagram पर, हम दोनों लोग तुम्हें ढूंढ-ढूंढकर थक गये लेकिन तुम नहीं मिले, मैंने कहा।
दूसरा कौन? उसने पूछा
रश्मि और मैं, रश्मि याद है कि नहीं, मैंने पूछा।
मैं किसी भी social site पर नहीं हूं, उसने जवाब दिया।
अच्छा ठीक है, बाकी बातें बाद में करते हैं, खाना खाओगे, मैंने पूछा।
और उसने हां में सिर हिला दिया,
मैंने उसे कुछ पूडियां, आलू की सूखी सब्जी और आचार दिया और उसने खाते हुए कहा कि मां के मरने के बाद आज घर का खाना खाया है,
क्या, बुआ नहीं रही, मैंने पूछा
हां, दो साल हो गए, लम्बे समय से बीमार थी, उसने जवाब दिया।
फिर मैंने भी खाना खाया।
रात के दस बज गए थे, हम सब ने अपने -अपने बिस्तर लगाये और लेट गये, लेकिन मुझे नींद कहां।
मुझे तो वो दिन याद आने लगे, कितना आजाद महसूस किया करते थे हम, खुद को, ऐसा लगता था कि हमारे पंख लग गए और हम पंछी की तरह खुले आसमान में उड़ रहे हैं।
हमने, मतलब मैं और मेरी दो सहपाठी, दसवीं पास करने के बाद हमें science से पढ़ना था तो लड़कियों का कोई school नहीं था, तो हमें लड़कों के school में admission लेना पड़ा, पूरे school में हम ही तीन लड़कियां थे, बहुत ही अच्छा school था British जमाने का इतना बड़ा auditorium था, और हम तीनों लड़कियों को खाली period और lunch के समय उसी auditorium में रहना पड़ता था, safety की वजह से क्योंकि auditorium ठीक principal room के बगल में था, बड़े-बड़े classroom, और बड़ी सी laboratory हमने पहली बार देखी थी, हमें सब बहुत अच्छा लग रहा था, मेरे घर से intercollege तक का लगभग तीन किलोमीटर का रास्ता था और रास्ते में नहर वाला पुल भी आता था, सड़क के दोनों ओर महुआ के पेड़ थे, रश्मि का घर तो मुझसे भी दूर था, पहले वो मेरे घर आती थी तब हम दोनों मिलकर आकांक्षा के घर जाते थे उसे लेने।
आकांक्षा के घर जाने को तो हम हमेशा तैयार रहते थे, क्योंकि वो बहुत अमीर थी, उसका घर भी बहुत बड़ा था, घर था तो पुराना बना हुआ लेकिन था बहुत सुंदर।
पुराने जमाने का बहुत बड़ा सा gate लगा था, अंदर जाने के लिए एक कच्ची सी गली, गली के अगल-बगल शहतूत के पेड़ थे, फिर आलीशान बड़े बड़े कमरों वाला घर और घर के पीछे तरफ भी थोड़ी जगह थी जहां और भी शहतूत के पेड़ थे दो -तीन अमरूद के पेड़ , एक बेर का पेड़ था और छोटी सी तलैया थी, जिसमें जलकुंभी छितरी थी, तलैया के उस पार देवी मां का मंदिर था, जहां से घण्टियों की आवाज आती रहती थीं।
तो हम सब intercollege से लौटते समय, थोड़ा समय आकांक्षा के घर जरूर बिताते थे, हमें अच्छा लगता था।
लेकिन एक रोज, हमने देखा कि पीछे तलैया के पास जो कमरा बना था, वहां कोई है, मैंने और रश्मि ने आकांक्षा से पूछा? कि कौन हैं, आकांक्षा ने कहा, मेरे दूर के रिश्ते की बुआ का बेटा है, बहुत गरीब है बेचारा ,मां लोगों के घरों में झाड़ू बर्तन करती हैं, पढ़ाई के लिए पैसे पूरे नहीं पड़ते तो, पापा ने यहां बुला लिया पढ़ने के लिए क्योंकि बहुत होशियार है, पढ़ने में।
मुझसे बड़े हैं, तुम लोगों को अभी मिलवाती हूं,
आकांक्षा ने आवाज दी कि, धीरेन्द्र भइया जरा बाहर तो आइए,
फिर आकांक्षा ने हमें धीरेन्द्र से मिलवाया।
लेकिन एक दिन ऐसा हुआ, हम लोग अमरूद तोड़ रहे थे, अमरूद थोड़ी ऊंचाई पर थे, हमारी पहुंच से बाहर थे, तो रश्मि डंडे से अमरूद तोड़ रही थी, वो ऊपर देख रही थी, नीचे पैर में पत्थर की ठोकर लगी और वो गिर गई, आवाज सुनकर, धीरेन्द्र बाहर आया, सहारा देकर रश्मि को उठाया और अपने कमरे में चारपाई पर बैठा दिया, मैं और आकांक्षा भी कमरे में गये, देखा तो दोनों एक-दूसरे की आंखों में खोये है, हमलोगों को देखते ही सकपका गये और इधर-उधर देखने लगे।
कमरे में एक चारपाई थी, कोने में कुर्सी-मेज और कुछ किताबें, कमरे में चारों तरफ सीलन थी, क्योंकि कमरा तलैया के किनारे था, एक बल्ब लगा था जिसकी पीली सी रोशनी कमरे में फैलीं थी।
उस दिन धीरेन्द्र और रश्मि की नजरें मिली और प्यार पनपने लगा, मैं और रश्मि जब भी आकांक्षा के घर जाते, रश्मि कहती चलो शहतूत खाते है, उस समय शहतूत का मौसम चल रहा था जबकि उसे शहतूत पसंद नहीं थे और शहतूत के कुछ पेड़ आगे भी लगे थे लेकिन उसे तो तलैया वाले ही शहतूत खाने थे, असली मतलब तो धीरेन्द्र को बस एक बार देखना होता था।
बस दोनों एक-दूसरे को एक झलक देखकर मुस्कुरा देते थे, इसी तरह दो साल बीत गए, हमने बारहवीं पास कर ली और धीरेन्द्र b.s.c.finel में पहुंच गया फिर हमने b.s.c. में degree college में admission लिया, धीरेन्द्र हमें college में ही मिल जाता था, दोनों मिलते जरूर थे लेकिन अभी तक दोनों ने इजहार नहीं किया था।
हमलोगों ने b.s.c.कर ली, धीरेन्द्र ने m.s.c.कर ली, वो agriculture से था, इसी बीच आकांक्षा की शादी तय हो गई, लड़का बहुत बड़ा business man था ,उसका खानदानी business सम्भाल रहा था ,आकांक्षा से शादी के बाद विदेश में बसना चाहता था क्योंकि कुछ business विदेश में भी था।
मैं और रश्मि आकांक्षा की शादी में गए, मैंने रश्मि से कहा कि आज इजहार कर लें, मौका देखकर ,नहीं तो पूरी जिंदगी बैठी रहेगी।
मैंने धीरेन्द्र से कहा कि रश्मि तुमसे कुछ बात करना चाहती है तो धीरेन्द्र अपने कमरे में ले गया।
और रश्मि से उसने कहा कि मुझे मालूम है कि तुम मुझसे क्या कहना चाहती हो लेकिन अभी मैं तुम्हारा साथ नहीं दे सकता, मेरे ऊपर बहुत सी ज़िम्मेदारियां हैं, मुझे अभी कुछ बनना है, अपने पैरों पे खड़ा होना है, दो बहनों की शादी करनी है, मेरी मां ने बहुत दुःख उठाये है पिताजी के जाने के बाद, मुझे कैसे पढ़ाया है, ये मैं ही जानता हूं।
रश्मि मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं लेकिन अभी तुम्हें अपना नहीं सकता और वही घुटनों के बल बैठ कर फूट-फूटकर रोने लगा, मैं और रश्मि भी खूब रोये, लेकिन जाते-जाते रश्मि ने कहा कि मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी ।
और रश्मि ने अभी तक शादी नहीं की, रश्मि की छोटी बहन ही तो मेरी भाभी रेनुका है, हुआ यूं कि लोग तरह-तरह की बातें बना रहे थे कि बड़ी बहन की शादी नहीं हुई तो कोई ना कोई बात होगी, तो मैंने ही अपने मम्मी-पापा से कहकर रश्मि की बहन के लिए रिश्ता भेजा ,शरद और रेनुका की शादी करा दी।
आकांक्षा तो शादी के बाद विदेश बस गई,त ब phone भी इतने प्रचलित नहीं थे तो कभी कोई बात नहीं हो पाई, इसलिए धीरेन्द्र के बारे में भी कुछ पता नहीं चला।
ये ही सोचते-सोचते ,पता नहीं कब आंख लग गई, देखा तो सुबह के दस बज रहे थे, हमारी train ग्यारह बजे तक पहुंच जाएगी, देखा तो बच्चे भी सो रहे थे, मैंने बच्चों को जगाया, सारा सामान check किया, देखा तो धीरेन्द्र कब से जगकर खिड़की से बाहर झांक रहा था, मैंने पूछा कि कहां तक जा रहे हो, उसने कहा Mysore।
मैंने कहा मैं भी वहीं जा रही हूं,
क्यों जा रहे हो? मैंने पूछा।
central sericultural research and training institute है, Mysore में, वहां शहतूत के पेड़ों की research के लिए जा रहा हूं, उसने कहा।
अभी भी याद है, तुम्हें शहतूत के पेड़, मैंने गुस्से में कहा।
कैसे भूल सकता हूं, वो तो मेरी जिंदगी का हिस्सा है, वो बोला और उसकी आंखें भर आई।
उसने कहा कि , मुझे मालूम है कि तुम मुझसे बहुत गुस्सा हो लेकिन मेरी मज़बूरी भी तो समझो।
अच्छा ठीक है, वहां कहां रहोगे? मैंने पूछा।
institute के guest House में, वो बोला।
मेरा भाई भी वहीं रहता है, institute में, वो भी silk worm पर research कर रहा है, मैंने कहा।
बस, ऐसे ही बातें करते-करते station आ गया, हम सब train से उतरे, शरद भी आ गया था, अपनी car लेकर।
शरद से मैंने धीरेन्द्र का परिचय करवाया, शरद ने कहा कि जब वही तक जाना है तो आप भी चलिए, चाय पीकर फिर guest House चले जाइएगा, धीरेन्द्र ने शरद की बात मान ली, हम सब शरद के घर पहुंचे।
रेनुका ने दरवाजा खोला, मेरे पैर छुए और गले मिली, हमें बैठाकर, कहा कि मैं पानी लेकर आती हूं।
तभी रेनुका की जगह कोई और पानी लेकर आया, रेनूका ने जोर से कहा, surprise!
देखा तो रश्मि थी,
रश्मि धीरेन्द्र को देखकर, आत्मविभोर हो गई,
धीरेन्द्र की आंखों में आंसू थे, वो रश्मि के पास गया और घुटनों के बल बैठ कर बोला, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?
और रश्मि ने रोते हुए, हां में सिर हिलाया, धीरेन्द्र के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी और धीरेन्द्र भी बस रोये जा रहा था।
मेरी भी आंखें भर आईं।

