मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Inspirational


4.0  

मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Inspirational


साथी हाथ बढ़ाना (कहानी)

साथी हाथ बढ़ाना (कहानी)

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अभी तक दुनिया में इस सदी में जितने भी तूफान आये थे। उन सब से बड़ा था यह। बस फर्क इतना था कि उन तूफानों में तेज़ हवाओं के साथ आंधी और बारिश भी आते थे। जो लोगों के साथ जानवरों, इंसानों के बसने के ठिकानों, बड़े-बड़े पुलों, बांधों और इंसान से जो कुछ भी रचनात्मक काम किये थे। उनको तबाह और बर्बादी करना ही उनका मुख्य उद्देश्य होता था। लेकिन ये एक अनोखा तूफान था। न तो जिसे जलवायु को प्रभावित करना था। न किसी भी रचनात्मकता से इसे कोई लेना देना था। न इसके पास तेज़ हवा की रफ्तार थी। न इसको इंसान के अलावा किसी भी जीव अर्थात चरिन्दे-परिन्दे से कोई सरोकार था। न ये दुनिया में मानव निर्मित किसी भी वस्तु को नुक्सान पहुँचाना चाहता था। 

बस इसे तो जो कुछ भी लेना देना था। केवल और केवल मानव मात्र से लेना देना था। दुनिया की तमाम वैज्ञानिकता के बावजूद इसका मानव मात्र के पास कोई इलाज न था। इसकी रफ़्तार बिना हवा के बहुत तेज़ थी। दरअसल इसे किसी भी प्रकार के अन्य कारक की ज़रूरत ही नहीं थी। ये तो जिसे प्रभावित करता, उसे ही अपना एजेंट बना लेता था। हद तो ये थी कि ये दुनिया सिमट कर बहुत छोटी सी लगने लगी थी। पहली बार इंसान, इंसान से जितना अभी डरने लगा। उस से पहले तो आदिकाल में भी नहीं डरता था। इसी का नाम कॅरोना वाइरस था। 

सारी दुनिया में इसके प्रकोप ने लॉक-डाउन की स्थिति निर्मित कर दी थी। दुनिया की तेज़ रफ़्तार को इसने विराम लगा दिया था। जो जहाँ था या तो वहीँ रुक गया या किसी तरह अपने गृह-नगर पहुँच पाया। 

अपूर्व, भास्कर, हेमन्त, अलीशा, दीपशिखा और इशिता एक ही स्कूल में पढ़ते थे। नौकरियों के सिलसिले में शहर से बाहर थे। कोई विदेश में था तो कोई अपने ही देश में। लेकिन लॉक डाउन के कारण अभी, सभी अपने होम टाउन में थे। कोई सॉफ्ट वेयर इंजीनियर था तो कोई किसी कंपनी का सीईओ कोई सीए तो कोई बिसनेस मैन। सभी अपने-अपने कामों में दक्ष थे। इनका "साथी हाथ बढ़ाना" नाम से एक एल्युमिनाइ व्हाट्स एप्प ग्रुप भी था। जिसमें उस स्कूल के अधिकाँश विद्यार्थी सदस्य थे। लॉक-डाउन के परिणाम सामने आने लगे थे। गरीब और बेसहारा लोगों के दुःख दर्द की दास्तानें अखबारों और न्यूज़ की सुर्खियां थीं। खास तौर से पलायन करते बेसहारा मज़दूरों की ख़बरें देख कर और सुन कर, सभी लोग व्यथित थे। तभी एडमिन अपूर्व ने ज़रूरतमंदों और पलायन करते मज़दूरों को खाना और राशन बाँटने का संकल्प लिया। अपने सभी दोस्तों से आग्रह किया कि वे भी आगे आएं और इस वैश्विक आपदा से मुकाबला करने में सहयोग करें। धीरे-धीरे सभी लोगों ने इस परोपकारी कार्य में हिस्सा लेने की सहमति व्यक्त की।

"साथी हाथ बढ़ाना" नाम से एक और वेलफेयर ग्रुप बनाया और जुट गए। भास्कर, हेमन्त के अलावा अलीशा, दीपशिखा और इशिता भी बढ़-चढ़ कर इस परोपकारी कार्य में हिस्सा ले रहीं थीं। भास्कर अपूर्व और हेमन्त पैसे और ज़रूरी सामान की व्यवस्था करते तो अलीशा, दीपशिखा हुए इशिता स्थानीय लोगों की एक चैन बना कर उसे बांटने में जुट गईं । अब इनके साथ स्थानीय लोग भी जुड़ते जा रहे थे। जो न केवल श्रमदान कर रहे थे बल्कि आर्थिक मदद भी कर रहे थे। 

वास्तव में एक-एक कतरा मिलकर ही तो दरिया बनता है जो समुद्र जैसे महासागर में अपनी अलग अहमियत रखता है। धीरे-धीरे इन सबको अपनी एकता का अहसास होने लगा था। इनको आभास हो चला था कि एकता में इतनी ताक़त होती है कि वह किसी भी विपत्ति का रुख मोड़ सकती है। 

आज सब अपने-अपने घरों में टीवी से चिपके बैठे हुए थे। सबको प्रतीक्षा थी तो बस प्रधानमंत्री महोदय के उद्बोधन की। सभी सोच कर बैठे थे कि शायद प्रधानमंत्री लॉक डाउन- 3.0  को समाप्त करने की घोषणा करेंगे। लेकिन अपेक्षाओं के विपरीत उन्होंने लॉक डाउन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न वैश्विक आर्थिक संकट के साथ देश की आर्थिक स्थिति के बारे में भी आगाह किया। उन्होंने बताया कि देश की अर्थ व्यवस्था को तेजी से बढ़ाना होगा। इसके लिए तेज रफ्तार से ज़्यादा ज़ोरदार छलांग लगाने की ज़रूरत है। जिससे इस संकट से निपटा जा सके। हमें लोकल को ही वोकल बनाना होगा। तभी हम दूसरे विकसित देशों पर निर्भरता को दूर कर सकते हैं। आत्मनिभर्रता का यही मूल मन्त्र है। इससे एक तो लोकल में बनी वस्तुओं को अपना ही बाजार मिलेगा। साथ ही मज़दूरों के विस्थापन की समस्या भी हल होगी। 

अलीशा प्रधानमंत्री की आर्थिक समस्या से निपटने की इस "लोकल ही वोकल" वाली रणनीति से बहुत प्रभावित हुई। उसने तो इस पर विचार-विमर्श करने हेतु एक ऑन-लाइन मीटिंग रखने का प्रस्ताव ही रख दिया। जिसे सभी ने सराहा। 

हेमन्त तो विदेश से ही था। उसने आर्थिक विकास दर कैसे बढ़ाया जाए?, इस पर ही शोध किया था। दीपशिखा भी इस बात से सहमत थी कि अगर हमें तरक्की करना है तो एक न एक दिन आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। परन्तु इशिता को ये डर था कि ये सब कैसे संभव होगा। लॉक-डाउन तो एक न एक दिन समाप्त हो जाएगा और हमें अपने-अपने कामों पर लौटना होगा। 

लेकिन अपूर्व ने इस संशय को दूर किया। उसने कहा अब वक़्त आ गया है कि हमें अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा। अभी तक हम केवल अधिकार जताते आए हैं। हम अपनी जगह वैसे ही काम करते रहेंगे। जैसे करते आए हैं। हमारे बहुत सारे साथी जो अभी तक बेरोज़गार हैं। उनको भी हमारे साथ जोड़कर एक लघु उद्योग इकाई का निर्माण करना होगा। जिसके तहत हम एक कारखना डालेंगे। जिसमें यही लोग काम करेंगे लेकिन हम इसे मॉनिटर करेंगे। 

सभी ने इस पर सहमति व्यक्त की और अपनी और से भरपूर समर्थन का वादा भी किया। बस प्रतीक्षा थी कि लॉक-डाउन 4.0 समाप्त हो और हम इसे कार्यान्वित करने में जुट जाएं। सभी ने आभसी रूप से एक दूसरे के हाथ पर हाथ रख कर संकल्प लिया।

कि "कोरोना को भागना है और देश को आर्थिक संकट से उबरना है।"   



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