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Sukhwinder Singh Rai

Romance

4  

Sukhwinder Singh Rai

Romance

रूह का आखिरी सफ़र

रूह का आखिरी सफ़र

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3

रूह का आखिरी सफ़र ​प्लेटफ़ॉर्म नंबर चार की सीढ़ियों पर बिछा कोहरा किसी पुरानी कब्र की धूल जैसा महसूस हो रहा था। हवा में ठंड नहीं थी, बल्कि एक ऐसी चुभन थी जो फेफड़ों में उतरते ही सांसों को ज़हर कर रही थी। आर्यन और रिया एक-दूसरे के इतने करीब खड़े थे कि उनकी धड़कनें आपस में टकरा रही थीं, लेकिन उनके बीच की दूरी किसी मीलों गहरे समंदर जैसी थी। ​रिया की आँखों का काजल अब उसके गालों पर काली लकीरें बन चुका था। उसके होंठ बुरी तरह कांप रहे थे, मानो वे उन हज़ारों शब्दों के बोझ तले दबे जा रहे हों जो उसने कभी कहे ही नहीं। उसने अपनी कांपती उंगलियों से आर्यन के कोट के कॉलर को इतनी मजबूती से पकड़ लिया कि उसके पोर सफेद पड़ गए। वह उसे थामे नहीं थी, वह उस डूबती हुई आख़िरी उम्मीद को पकड़ रही थी जिसे आज रात हमेशा के लिए दफन हो जाना था। ​आर्यन ने बिना किसी आहट के अपना हाथ बढ़ाया और रिया के ठंडे पड़ चुके चेहरे को अपनी हथेलियों के प्याले में भर लिया। उसका स्पर्श किसी दहकते अंगारे जैसा था। उसने अपना माथा रिया के माथे से टिका दिया। दोनों की पलकों से गिरते आंसू आपस में मिलकर एक हो रहे थे। आर्यन के अंगूठे रिया के आंसुओं को पोंछने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, लेकिन हर गिरती बूंद के साथ उसका अपना वजूद पिघलता जा रहा था। ​"क्या आज भी उसी शिद्दत से मोहब्बत करती हो रिया?" आर्यन की आवाज़ एक दबी हुई चीख जैसी थी, जो गले के किसी अंधेरे कोने से निकल रही थी। "क्या आज भी मेरी उन यादों के बोझ तले हर रोज़ तिल-तिल कर मरती हो, जैसे मैं मर रहा हूँ?" ​रिया ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना पूरा वज़न आर्यन के सीने पर डाल दिया। उसकी सिसकियां अब बेकाबू होकर एक हिंसक शोर में बदल चुकी थीं। वह आर्यन के कोट को अपनी मुट्ठियों में भींचते हुए उसे अपने जिस्म के और करीब खींचने लगी, जैसे वह चाहती हो कि समय वहीं जम जाए और वे दोनों पत्थर के बन जाएं। वह पागलों की तरह आर्यन की गर्दन में अपना चेहरा छुपाकर उसकी खुशबू को अपनी रूह के आखिरी कोने तक भर लेना चाहती थी। उसे पता था कि कुछ ही मिनटों बाद उसे सिर्फ कोहरे और लोहे की गंध के साथ जीना होगा। ​अचानक, दूर से आती ट्रेन की वो काली परछाईं किसी शिकारी की तरह नज़दीक आने लगी। उसकी रोशनी ने कोहरे को चीर दिया, और रिया के चेहरे पर फैली उस खौफनाक हकीकत को उजाला कर दिया—कि बिछड़ने का वक्त आ गया है। ट्रेन की चीख पूरे स्टेशन की खामोशी को चीरती हुई निकली, मानो कोई रूह तड़प कर शरीर छोड़ रही हो। ​"मत जाओ आर्यन... खुदा के लिए रुक जाओ! मेरा दम घुट रहा है, मैं मर जाऊँगी!" रिया की आवाज़ अब एक ऐसी पुकार बन चुकी थी जिसे सुनकर कुदरत भी कांप जाए। वह पागलों की तरह आर्यन के चेहरे को चूमने लगी—उसके माथे, उसकी बंद आँखों, और उसके उन हाथों को जो अब धीरे-धीरे रिया की पकड़ से छूट रहे थे। हर चुंबन में एक ऐसी तड़प थी, जैसे कोई मरने वाला अपनी आख़िरी सांस बचाना चाहता हो। ​आर्यन ने एक झटके के साथ खुद को रिया से अलग किया। उसका चेहरा आंसुओं से इतना भीगा हुआ था कि उसकी आँखों की लाली खौफनाक लग रही थी। उसने मुड़कर ट्रेन की सीढ़ियों पर कदम रखा। हर कदम के साथ ऐसा लग रहा था जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी के टुकड़े हो रहे हों। ​ट्रेन ने एक ज़ोरदार झटके के साथ रेंगना शुरू किया। ​रिया बेसुध होकर ट्रेन के साथ दौड़ने लगी। कोहरा उसे अपनी चपेट में ले रहा था, लेकिन उसकी चीखें आर्यन का पीछा नहीं छोड़ रही थीं। "आर्यन! वापस आ जाओ! मैं अकेले नहीं रह पाऊँगी! देखो, मैं मर जाऊँगी!" ​वह भागते-भागते प्लेटफॉर्म के उस आख़िरी किनारे पर लड़खड़ाकर गिर गई। उसकी हथेलियाँ खुरदरी ज़मीन पर छिल गईं, खून रिसने लगा, लेकिन उसे उस दर्द का एहसास तक नहीं था। वह धूल और धुएँ के बीच घुटनों के बल बैठी हाथ हवा में फैलाए चीखती रही, "एक बार पीछे देखो आर्यन! बस एक बार!" ​आर्यन दरवाज़े पर खड़ा था, उसकी मुट्ठियाँ लोहे की रॉड पर कस गई थीं। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसे पता था कि अगर उसने उस टूटी हुई, बिखरी हुई रिया को देख लिया, तो उसकी रूह उसी प्लेटफॉर्म पर निकल जाएगी। उसने अपना चेहरा अपने हाथों में छुपा लिया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसके कंधे बुरी तरह हिल रहे थे, और हर सिसकी के साथ एक पूरा संसार उजड़ रहा था। ​ट्रेन अंधेरे के उस काले शून्य में समा गई। पीछे रह गया तो सिर्फ भारी सन्नाटा, उड़ता हुआ काला धुआँ और ज़मीन पर पड़ी वो बेजान लड़की, जिसकी आवाज़ अब मर चुकी थी। उसकी उंगलियाँ अब भी ज़मीन पर उसी छुअन को ढूंढ रही थीं जो अब सिर्फ एक ज़हरीली याद बन चुकी थी। उस रात प्लेटफॉर्म नंबर चार पर कोई नहीं बचा था—वहाँ सिर्फ दो लोगों के अधूरे जिस्म थे और एक मोहब्बत, जिसने अपनी आख़िरी सांस वहीं कोहरे में छोड़ दी थी। ​— सुखविंदर की कलम से


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