शादी वाली चुगली
शादी वाली चुगली
आर्यन की ताई के बेटे की शादी थी। पूरे गाँव में रंग-बिरंगे टेंट लगे थे, और डीजे की धमक से कच्चे घरों की ईंटें तक काँप रही थीं। बाहर गद्देदार कुर्सियों पर बैठे लोग हंसी-मज़ाक कर रहे थे, लेकिन असली 'कुरुक्षेत्र' टेंट के पीछे वाले उस हिस्से में चल रहा था, जहाँ हलवाई की कड़ाहियों से उठता धुँआ और देसी घी की महक आपस में लड़ रहे थे। यह सिर्फ खाना बनने की जगह नहीं थी, बल्कि यह मिडिल क्लास परिवारों की इज़्ज़त, कूटनीति और सबसे गहरी राजनीति का गढ़ था। किचन के ठीक बाहर, जहाँ से खाने के स्टॉल की तरफ रास्ता जाता था, तीन लाल रंग की प्लास्टिक की कुर्सियां डली हुई थीं। इन कुर्सियों पर घर की सबसे 'ज़िम्मेदार' औरतें तैनात थीं—शांति बुआ, विमला चाची और दूर के रिश्ते वाली मासी। उन्होंने अपनी साड़ियों के पल्लू कमर में कसकर खोंसे हुए थे। उनकी नज़रें सामने बज रहे डीजे या नाचते हुए लोगों पर नहीं थीं, बल्कि उन स्टील की प्लेटों पर थीं जो किचन की चौखट के आस-पास मंडरा रही थीं। सामने से आर्यन का एक दूर का चचेरा भाई, जिसकी उम्र कोई पंद्रह साल होगी, अपनी प्लेट में चार गुलाब जामुन और पकोड़ों का एक ऊँचा पहाड़ लेकर निकला। शांति बुआ की आँखों ने रडार की तरह उसे स्कैन किया। उनकी भौंहें एक तीखे कोण में तन गईं। उन्होंने पास बैठी चाची की तरफ थोड़ा सा झुककर, मुँह पर हाथ रखते हुए फुसफुसाहट में कहा, "देख इसे... प्लेट देख इसकी! जैसे सात जन्मों का भूखा हो। इसके बाप ने लिफाफे में शगुन के नाम पर सिर्फ 101 रुपये डाले हैं, और ये अकेला ही 500 का राशन ठूंस गया। पेट नहीं फटेगा इसका?" बुआ की वह फुसफुसाहट इतनी भी धीमी नहीं थी। उस लड़के के कानों तक आवाज़ पहुँच गई। उसके कदम ठिठक गए। प्लेट पकड़े हुए उसके हाथ ढीले पड़ गए, चेहरे पर वो खौफ और शर्मिंदगी आ गई जैसे उसने खाना नहीं, कोई बहुत बड़ा जुर्म कर दिया हो। वह अपनी नज़रें चुराते हुए, प्लेट को सीने से छिपाकर अंधेरे कोने की तरफ खिसक गया। बुआ और चाची के चेहरों पर एक अजीब सी विजयी मुस्कान तैर गई। उनका काम हो गया था—मुफ्त का खाने वालों के ज़मीर में सुई चुभोना। लेकिन आर्यन, जो हलवाई के पीछे खड़े होकर सब देख रहा था, इस दोहरे चेहरे की असली हकीकत जानता था। महज़ एक घंटे पहले, जब बारात नहीं आई थी और डीजे की तारें ही जुड़ रही थीं, यही तीनों औरतें कड़ाही के बिल्कुल मुहाने पर खड़ी थीं। "अरे भैया, ज़रा नमक चखने के लिए एक पकोड़ा देना," शांति बुआ ने हलवाई से कहा था। और 'नमक चखने' के नाम पर उन्होंने और चाची ने मिलकर पनीर के उन बड़े-बड़े पकोड़ों की पूरी एक ट्रे साफ कर दी थी। उनके होठों पर तेल चमक रहा था और उंगलियां चिकनी हो रही थीं। 'पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा'—यह उनका अघोषित नारा था। खुद छक कर खाने के बाद अब वे बाहर पहरेदार बनकर बैठ गई थीं, ताकि कोई और उस खाने का मज़ा न ले सके। रात गहरी होने लगी थी। फेरे शुरू हो चुके थे और ज़्यादातर 'भुक्खड़' रिश्तेदार सो चुके थे। तभी हलवाई ने आवाज़ दी, "ताई जी! वो काजू कतली और पिस्ते वाली बरफी के डिब्बे कहाँ रखने हैं?" यह वो समय था जब शादी का सबसे बड़ा और खुफिया ऑपरेशन शुरू होता है। ताई जी, जिनके चेहरे पर दिन भर से 'हाय बड़ा कर्ज़ा हो गया' वाला रोना चिपका हुआ था, अचानक किसी कमांडो की तरह फुर्तीली हो गईं। उन्होंने चारों तरफ देखा कि कहीं किसी रिश्तेदार की नज़र तो नहीं है। ताई जी ने काजू कतली के उन भारी-भारी डिब्बों को उठाया। आर्यन को लगा वो उन्हें फ्रिज में रखेंगी। लेकिन नहीं, मिडिल क्लास औरतों के लिए फ्रिज बहुत 'आम' जगह होती है, जहाँ किसी भी घुसपैठिए रिश्तेदार का हाथ पहुँच सकता है। ताई जी ने उन डिब्बों को अखबार में लपेटा, फिर उसे एक पुरानी शॉल में बांधा। वो दबे पाँव घर के सबसे अंदर वाले उस सीलन भरे अँधेरे कमरे में गईं, जहाँ पुरानी रज़ाइयां और बक्से रखे जाते थे। कमरे के कोने में एक बहुत बड़ी, लोहे की भारी पेटी (संदूक) रखी थी। ताई जी ने काँपते हाथों से पेटी का कुंडा खोला। पेटी के कब्ज़ों ने 'चर्रर्र' की एक हल्की सी आवाज़ की। ताई जी ने झटके से पीछे देखा, जब यकीन हो गया कि कोई नहीं है, तो उन्होंने पेटी के अंदर रखी सर्दियों की भारी रज़ाइयों को उठाया और उनके बिल्कुल नीचे, तलहटी में उन बेशकीमती काजू कतली के डिब्बों को गाड़ दिया। लेकिन बात सिर्फ पेटी तक नहीं रुकी। कुछ डिब्बे जो बच गए थे, उन्हें ताई जी ने एक काले लिफाफे में डाला और पिछली दीवार के पास गईं। दीवार के उस पार उनकी पड़ोसन और सबसे खास सहेली, कमला खड़ी थी। "ये रख ले अपने घर में," ताई जी ने लिफाफा दीवार के ऊपर से पकड़ाते हुए हाँफती हुई आवाज़ में कहा। "ये जो मेरे मायके और ससुराल वाले टिड्डी दल आए हुए हैं ना, सुबह चाय के साथ सब चट कर जाएंगे। इनको तो मैं खाली बिस्कुट ही खिलाऊंगी। तू ये डिब्बे छुपा ले, जब ये सब चले जाएंगे, तब मैं आराम से ले लूंगी।" कमला ने सिर हिलाया और लिफाफा लेकर अंधेरे में गायब हो गई। ताई जी ने एक गहरी, सुकून भरी सांस ली और वापस अपने चेहरे पर 'गरीबी और थकावट' का वो मुखौटा पहन लिया। शादी खत्म हो गई। अगले दिन दोपहर तक सब रिश्तेदार अपने-अपने घरों को लौट गए। टेंट उखड़ने लगे थे और घर में बची-खुची पूड़ियों की बासी महक रह गई थी। दो दिन बाद, आर्यन किसी काम से अपनी उसी शांति बुआ के गाँव गया हुआ था। बुआ अपने घर के आँगन में चारपाई पर बैठी थीं। आस-पास पड़ोस की चार-पाँच औरतें और बैठी थीं, और कड़क चाय के साथ 'चुगली' का वो खौलता हुआ दौर चल रहा था, जिसके बिना भारत में कोई शादी पूरी नहीं होती। आर्यन खामोशी से दरवाज़े के पास खड़ा हो गया। "अरी क्या बताऊँ तुम्हें," शांति बुआ ने चाय का एक घूंट भरते हुए मुँह इस तरह सिकोड़ा जैसे कोई बहुत कड़वी दवा पी ली हो। "इतना गंदा खाना था कि क्या कहूँ! वो जो पनीर पकोड़े थे ना... हे भगवान! पनीर तो उसमें था ही नहीं, सिर्फ बेसन का गाढ़ा घोल तल कर रख दिया था। और गुलाब जामुन? अरे रबड़ की गेंद जैसे सख्त! मैंने तो मुश्किल से आधा खाकर ही प्लेट छोड़ दी। मेरे तो पेट में अभी तक दर्द है।" आर्यन ये सुनकर हक्का-बक्का रह गया। उसकी आँखों के सामने बुआ का वो चेहरा घूमने लगा, जब वो हलवाई के पास खड़ी होकर दोनों हाथों से पकोड़े ठूंस रही थीं। तभी बुआ की आवाज़ और धीमी और रहस्यमयी हो गई। उन्होंने अपनी गर्दन आगे की और बाकी औरतों के बिल्कुल करीब झुक गईं। "और सबसे बड़ी बात बताऊँ? ये जो मेरी भाभी (ताई जी) दिन भर रोती रहती थी ना कि 'बड़ा खर्चा हो गया, कर्ज़ा सिर पर चढ़ गया, कुछ नहीं बचा'... सब नौटंकी थी!" बुआ की आँखों में एक अजीब सी चुभने वाली चमक आ गई। "मैं तो खुद अपनी आँखों से देखकर आई हूँ। वो अंदर वाले कमरे में मेरा बैग रखा था। मैंने गलती से लोहे वाली पेटी खोल दी... तुम यकीन नहीं करोगी, रज़ाइयों के नीचे काजू कतली के डिब्बे दबा-दबा कर छुपाए हुए थे! और फ्रिज? फ्रिज तो ऐसे भरी पड़ी थी महंगी मिठाइयों से कि दरवाज़ा बंद नहीं हो रहा था। और हमें सुबह चाय के साथ क्या दिया? दो-दो रुपये वाले सूखे बिस्कुट! बड़ा रोना रोते हैं, पर असलियत में सब छुपा कर रखा हुआ है।" आस-पास बैठी औरतों ने भी आँच में घी डालते हुए 'हाय-हाय' और 'कितने लालची लोग हैं' का जाप शुरू कर दिया। आर्यन वहीं चौखट पर खड़ा-खड़ा सुन्न पड़ गया था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो ताई जी की उस चालाकी पर हँसे, या बुआ के इस भयानक दोहरेपन पर रोए। ये रिश्ते, ये शादियां, ये प्यार—सब एक बहुत बड़ा नाटक था। सामने 'जुग-जुग जियो' का आशीर्वाद देने वाले होंठ, पीठ पीछे छुरियां तेज़ कर रहे थे। एक तरफ वो औरतें थीं जो अपनी तिजोरी और पेटी में इज़्ज़त और मिठाई दोनों छुपा रही थीं, और दूसरी तरफ वो रिश्तेदार थे जो मुफ्त का खाकर भी गालियां दे रहे थे। आर्यन को महसूस हुआ कि असली शादी तो उस डीजे वाले टेंट में नहीं, बल्कि उन पेटियों के अंधेरे और इन चुगलियों के बीच कहीं दफन हो गई थी। सुखविंदर की कलम से
