आखिरी खामोशी
आखिरी खामोशी
कमरे में घुप्प अंधेरा था। सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर सड़क से गुज़रती गाड़ियों की धीमी आवाज़ आ रही थी। आर्यन ज़मीन पर, दीवार से पीठ टिकाए बैठा था। उसके सामने सेंटर टेबल पर रखा फोन लगातार वाइब्रेट कर रहा था। स्क्रीन की नीली रोशनी आर्यन के थके हुए और उतरे हुए चेहरे पर पड़ रही थी। स्क्रीन पर नाम फ्लैश हो रहा था— 'मेरी चुड़ैल ❤️'। आर्यन के हाथ कांपे। उसकी उंगलियां फोन की तरफ बढ़ीं, वो हरा बटन दबाकर बस एक बार रिया की आवाज़ सुनना चाहता था। लेकिन तभी उसने अपने होंठ सख्ती से भींच लिए। उसने गहरी सांस खींची और फोन को स्क्रीन की तरफ से पलट कर रख दिया। कमरा फिर से अंधेरे में डूब गया। आर्यन ने अपने घुटनों पर सिर रख लिया और अपने ही बालों को मुट्ठी में कस लिया। अगले दिन, रिया कैफे के बाहर उसी का इंतज़ार कर रही थी। आर्यन ने उसे दूर से देखा। रिया के चेहरे पर उदासी थी, वो बार-बार फोन चेक कर रही थी। आर्यन के कदम पल भर के लिए ठिठके, लेकिन फिर उसने अपने चेहरे पर एक झूठी सख्ती ओढ़ ली। जैसे ही आर्यन पास पहुँचा, रिया की सूखी हुई आँखों में जैसे जान आ गई। वो तेजी से आगे बढ़ी, "आर्यन! तुम कहाँ थे? मैंने तुम्हें सौ से ज्यादा कॉल किए... तुम मेरा फोन क्यों नहीं..." रिया ने आर्यन का हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन आर्यन ने अपना हाथ जैकेट की जेब में डाल लिया। रिया का हाथ हवा में ही रह गया। "आर्यन... क्या हुआ है?" रिया की आवाज़ कांप रही थी। आर्यन ने रिया की आँखों में नहीं देखा। उसने सड़क की तरफ देखते हुए एक बेहद ठंडी और सपाट आवाज़ में कहा, "कुछ नहीं रिया। बस मैं बिज़ी था।" "बिज़ी? इतने बिज़ी कि एक मैसेज का रिप्लाई नहीं कर सके?" रिया की आँखें डबडबाने लगीं। उसने आर्यन के कोट की आस्तीन को हल्के से पकड़ा, "मुझसे कोई गलती हुई है क्या? बताओ मुझे, मैं ठीक कर दूंगी... बस ऐसे चुप मत रहो।" आर्यन ने एक झटके से अपनी आस्तीन छुड़ाई। उसके अंदर जैसे कोई चीख रहा था कि 'रिया को गले लगा लो', लेकिन बाहर से उसकी आवाज़ किसी अजनबी जैसी थी। "प्रॉब्लम यही है रिया! तुम हर बात का तमाशा बना देती हो। मुझे स्पेस चाहिए... मुझे घुटन होने लगी है अब इस सब से।" 'घुटन?' यह शब्द सुनते ही रिया के चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी पलकें झपकीं और एक आंसू टूटकर उसके गाल पर बह निकला। आर्यन ने उस आंसू को देखा और उसे लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर घोंप दिया हो, लेकिन वो मुड़ा और बिना पलट कर देखे वहां से तेज़ कदमों से चला गया। रिया वहीं फुटपाथ पर खड़ी, धुंधली आँखों से उसे भीड़ में गुम होते देखती रही। यह उस सिलसिले की शुरुआत थी। धीरे-धीरे आर्यन ने रिया को पूरी तरह अपनी ज़िंदगी से काट दिया। वो उन रास्तों से नहीं गुज़रता था जहाँ रिया मिल सकती थी। और फिर वो दिन आया, जब रिया का सब्र टूट गया। आर्यन का फोन दो दिन से 'स्विच ऑफ' आ रहा था। घबराई हुई, बेहाल सी रिया भागते हुए आर्यन के फ्लैट पर पहुँची। सीढ़ियां चढ़ते हुए उसकी सांसें फूल रही थीं। लेकिन आर्यन के दरवाज़े के सामने पहुँचते ही रिया के कदम पत्थर के हो गए। दरवाज़े पर एक बड़ा सा, जंग लगा ताला लटक रहा था। बालकनी में जो गुलाब का पौधा आर्यन ने रिया के साथ मिलकर लगाया था, उसके पत्ते पीले पड़ चुके थे और मिट्टी पूरी तरह सूख कर चटक गई थी। रिया के हाथ कांपने लगे। उसने पास वाले फ्लैट की घंटी बजाई। "आर्यन? वो तो परसों रात ही अपना सारा सामान टेंपो में लादकर चला गया। चाबी मकानमालिक को दे गया था," पड़ोसी ने बिना किसी भाव के कहा और दरवाज़ा बंद कर लिया। रिया वहीं सीढ़ियों पर धम्म से बैठ गई। वो चला गया? बिना कुछ कहे? बिना कोई वजह बताए? रिया ने पागलों की तरह सन्नी और लकी को फोन मिलाया। "मुझे सच में नहीं पता रिया, उसने हमें भी कुछ नहीं बताया कि वो कहाँ जा रहा है," सन्नी की आवाज़ में भी हैरानी थी। महीने बीत गए। रिया आज भी उसी कैफे में जाती है। वो आज भी उस खिड़की के पास बैठती है। वो आज भी रोज़ आर्यन के नंबर पर एक मैसेज करती है— "लौट आओ ना..." और हर रोज़ वो मैसेज 'नॉट डिलीवर्ड' (Not Delivered) होकर रह जाता है। रिया रोती नहीं है, बस उसकी आँखों में अब एक ऐसा सन्नाटा है, जो किसी भी चीख से ज्यादा भयानक है। मौत इंसान को सिर्फ एक बार मारती है, लेकिन किसी अपने का बिना वजह बताए हमेशा के लिए गायब हो जाना, इंसान को हर रोज़, हर पल मारता है। दिल टूटने की आवाज़ नहीं होती, बस एक खामोशी छा जाती है, जो उम्र भर रूह को छलनी करती रहती है। — सुखविंदर की कलम से

