कागज़ की ज़ंजीर"
कागज़ की ज़ंजीर"
सूटकेस के पहियों की खड़खड़ाहट से घर की भारी खामोशी टूटी। आर्यन ने दरवाज़ा खोला। उसकी टाई ढीली थी और आँखों के नीचे थकान के गहरे काले घेरे थे। पूरे एक महीने बाद वो घर लौटा था। रिया ने दौड़कर उसके हाथ से बैग लिया, लेकिन आर्यन की नज़रें पूरे कमरे में किसी और को ढूंढ रही थीं। परी सोफे के एक कोने में घुटने मोड़े बैठी थी। आर्यन के कदम उसकी तरफ बढ़े, होंठों पर एक बड़ी मुस्कान थी। "मेरी राजकुमारी कैसी है?" आर्यन ने अपनी बाहें फैलाईं। परी ने नज़रें उठाईं। उसकी आँखें आर्यन के चेहरे से होती हुई उस भारी सूटकेस पर जाकर टिक गईं। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपनी ड्राइंग बुक उठाई और मुंह फेर कर दूसरे कमरे में चली गई। आर्यन की बाहें हवा में ही रह गईं। "नाराज़ है," रिया ने पानी का गिलास देते हुए धीमे से कहा, "हर रोज़ दीवार वाले कैलेंडर पर दिन गिनती थी।" दो दिन कैसे बीते, पता ही नहीं चला। रविवार की शाम घर में फिर से वही पुराना सन्नाटा पसर गया था। आर्यन का सूटकेस दोबारा बिस्तर पर खुला पड़ा था। कल सुबह की फ्लाइट थी। "रिया, मेरी नीली वाली लेदर डायरी कहाँ है? उसमें कल की मीटिंग के सारे फिगर्स और क्लाइंट की डिटेल्स हैं," आर्यन ने अलमारी छानते हुए आवाज़ लगाई। "यहीं टेबल पर तो रखी थी..." रिया कमरे में आई। आर्यन की नज़र बेड के किनारे पड़ी डायरी पर गई। उसने झपट कर उसे उठाया। डायरी खुलते ही आर्यन का चेहरा लाल हो गया। वो पन्ने जिन पर करोड़ों के प्रोजेक्ट्स की बारीक डिटेल्स और हिसाब-किताब लिखे थे, अब मोम वाले रंगों (Crayons) से बुरी तरह पुते हुए थे। लाल, काले और नीले रंगों से इतनी ज़ोर-ज़ोर से गोदा-गादी की गई थी कि कई पन्ने बीच से फट गए थे और लिखावट पूरी तरह मिट चुकी थी। "ये क्या है रिया?!" आर्यन की आवाज़ से कमरे की खिड़कियाँ तक कांप गईं। "ये मेरा काम है! कोई मज़ाक नहीं है! मैं महीने-महीने भर बाहर धक्के खाता हूँ, रात-रात भर जागकर ये रिपोर्ट्स बनाता हूँ... और इस लड़की ने सब खत्म कर दिया!" परी दरवाज़े के पीछे खड़ी कांप रही थी। आर्यन की तेज़ आवाज़ सुनकर उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े। वो भागकर रिया के पैरों से लिपट गई। "मैं तुम्हारे और इसके बेहतर भविष्य के लिए ही तो अपना खून-पसीना एक कर रहा हूँ! और इसे देखो... इसने मेरी मेहनत का क्या हाल किया है!" आर्यन ने गुस्से में डायरी ज़मीन पर पटक दी। डायरी का एक फटा हुआ पन्ना उड़कर आर्यन के जूतों के पास आकर गिरा। आर्यन ने गहरी सांस ली और अपना माथा पकड़ कर सोफे पर बैठ गया। अचानक उसकी नज़र उस ज़मीन पर पड़े पन्ने पर गई। गुस्से में उसने जिन लकीरों को सिर्फ 'गोदा-गादी' समझा था, करीब से देखने पर वो कुछ और ही लग रही थीं। आर्यन ने झुककर वो पन्ना उठाया। लाल और काले रंगों के बीच एक टेढ़ी-मेढ़ी सी तस्वीर बनी थी। तीन लोग—एक आदमी, एक औरत और एक छोटी बच्ची। आदमी के हाथ में एक सूटकेस था। लेकिन उस आदमी के पैरों पर काले रंग के क्रियॉन से बार-बार, बहुत ज़ोर से गोल-गोल लकीरें खींची गई थीं, जो एक मोटी ज़ंजीर जैसी लग रही थीं। और उस ज़ंजीर का दूसरा सिरा उस कागज़ पर बने घर के दरवाज़े से मजबूती से बंधा था। आर्यन की उंगलियां उस पन्ने पर जम गईं। उसने दरवाज़े के पीछे सिसकती परी की तरफ देखा। "परी..." आर्यन की आवाज़ अब बिल्कुल बदल चुकी थी। उसमें गुस्सा नहीं, एक अजीब सी घुटन थी। "ये... ये तुमने क्या बनाया है बेटा?" परी रिया के पीछे से थोड़ा बाहर आई। उसकी फ्रॉक का किनारा आंसुओं से भीग चुका था। उसने अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से आँखें रगड़ीं और रुंधे हुए गले से बोली, "मैंने जानबूझकर आपके गंदे कागज़ खराब किए हैं पापा..." कमरे में सुई गिरने जैसी शांति छा गई। "मम्मी कहती हैं कि आप ऑफिस के काम के लिए बाहर जाते हो।" परी ने हिचकियां लेते हुए आगे कहा, "अगर आपके काम वाले कागज़ ही खराब हो जाएंगे... तो आपका बॉस आपको वापस नहीं बुलाएगा। फिर आप हमें छोड़कर नहीं जाओगे... हमेशा के लिए हमारे पास घर में बंध जाओगे।" आर्यन को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर भारी पत्थर मार दिया हो। जिस कामयाबी और भविष्य के लिए वो घर से दूर भाग रहा था, उसका वर्तमान उसके सामने खड़ा सिसक रहा था। उस बच्ची को महंगे खिलौने या बड़ा घर नहीं चाहिए था; उसे बस अपना पिता चाहिए था। आर्यन घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गया। उसने दोनों बाहें फैला दीं। इस बार परी रुकी नहीं। वो दौड़कर आर्यन के सीने से लग गई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। आर्यन ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, लेकिन आंसुओं की एक गर्म बूंद परी के बालों पर गिर गई। "नहीं जा रहा... कहीं नहीं जा रहा तेरा पापा," आर्यन ने परी को खुद में भींचते हुए कहा। उसकी नज़र रिया पर पड़ी, जिसकी आँखों से भी आंसू बह रहे थे। आर्यन ने हाथ बढ़ाकर उस खुले हुए सूटकेस की ज़िप बंद की और उसे पलंग के नीचे धकेल दिया। — सुखविंदर की कलम से
