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Sukhwinder Singh Rai

Comedy

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Sukhwinder Singh Rai

Comedy

​काले लिफाफे का धमाका

​काले लिफाफे का धमाका

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गर्मियों की वो झुलसा देने वाली दोपहर थी। आसमान से जैसे आग बरस रही थी और पिंड (गाँव) की गलियों में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। सब लोग अपने-अपने घरों में कूलर और पंखों के सामने बेसुध सो रहे थे। लेकिन 11 साल के आर्यन की आँखों में नींद कहाँ? उसके दिमाग के किसी कोने में हमेशा खुराफात का एक कीड़ा कुलबुलाता रहता था। ​आर्यन के घर की एक पुरानी समस्या थी—चूहे। ये आम चूहे नहीं थे, बल्कि पिंड के वो 'पहलवान' चूहे थे जो रात के अँधेरे में रसोई पर कब्ज़ा कर लेते थे। कभी कनस्तर के ढक्कन गिरने की आवाज़ आती, तो कभी बोरी में रखे अनाज के कुतरने की। आर्यन की माँ सुबह उठकर हमेशा माथा पीटती थी। ​"इन मुओं ने तो जीना हराम कर दिया है! कल ही नई चुन्नी लाई थी, उसे भी कुतर दिया," माँ ने सुबह-सुबह झाड़ू लगाते हुए बड़बड़ाया था। ​बस, माँ के उन आँसुओं और गुस्से ने आर्यन के अंदर के शिकारी को जगा दिया। उसने मन ही मन कसम खाई कि आज वो इस घर को चूहों से आज़ाद करा कर ही दम लेगा। ​दोपहर के सन्नाटे का फायदा उठाकर आर्यन ने अपना 'ऑपरेशन' शुरू किया। उसने घर के हर उस कोने में पिंजरे सेट किए जहाँ से उन घुसपैठियों के आने की उम्मीद थी। पिंजरों में ताज़ी रोटी के टुकड़ों पर थोड़ा सा घी लगाकर फंसाया गया। ​अगले दो घंटों तक घर में अजीब सी खामोशी थी। और फिर... खट! पहली आवाज़ आई। आर्यन बिल्ली की तरह दबे पाँव स्टोर रूम की तरफ बढ़ा। पिंजरे के अंदर एक मोटा, काला चूहा फंसा हुआ था। आर्यन की आँखों में जीत की चमक आ गई। एक-एक करके, शाम होने तक आर्यन ने कुल सात चूहों का शिकार कर लिया था। उसने बड़ी सावधानी से उन सब को पिंजरे से निकालकर आंगन के एक कोने में इकट्ठा किया। सातों बेजान पड़े थे। ​आर्यन उन्हें बाहर गड्ढा खोदकर दबाने ही वाला था कि तभी उसकी नज़र पड़ोस वाले घर की उस दीवार पर गई, जो उनके आंगन से सटी हुई थी। वो घर था शकुंतला ताई का। ​शकुंतला ताई... इस नाम से ही मोहल्ले के आधे बच्चे कांप जाते थे। वो एक ऐसी महिला थीं जिनकी आवाज़ में हमेशा कड़कपन रहता था। उनकी डांट ऐसी होती थी जैसे कोई पुरानी मशीनगन बिना रुके गोलियां दाग रही हो। अगर किसी बच्चे की गेंद गलती से उनके आंगन में चली जाती, तो वो गेंद तो वापस नहीं मिलती थी, लेकिन बदले में गालियों का जो 'प्रसाद' मिलता था, वो हफ्तों तक कानों में गूंजता रहता था। कल ही ताई जी ने आर्यन को अपनी छत से पतंग उड़ाने पर बुरी तरह हड़काया था। ​आर्यन की नज़रें ज़मीन पर पड़े उन मोटे चूहों पर थीं, और दिमाग में ताई जी का वो गुस्सैल चेहरा घूम रहा था। अचानक, आर्यन के होंठों पर एक बहुत ही शैतानी सी मुस्कान तैर गई। ​उसने रसोई से एक बड़ा सा, मोटा काला लिफाफा (Polythene) निकाला। उसने एक लकड़ी की मदद से उन सातों चूहों को उठाया और उस लिफाफे के अंदर डाल दिया। लिफाफे को ऊपर से गोल घुमाकर उसने ऐसे बांधा कि वो बिल्कुल किसी गेंद की तरह गोल हो गया। चूहों का वज़न और उनकी गोलाई मिलकर उस काले लिफाफे को बिल्कुल वैसा ही रूप दे रहे थे, जैसे बाज़ार से ताज़े, मोटे पहाड़ी आलू खरीद कर लाए गए हों। ​आर्यन ने लिफाफे को हाथ में तौला। वज़न बिल्कुल परफेक्ट था। ​अब शुरू हुआ आर्यन का 'मिशन'। वह दबे पाँव उस खिड़की के पास पहुँचा जो सीधे ताई जी के आंगन में खुलती थी। खिड़की के उस पार, ताई जी चारपाई पर बैठी अपनी पुरानी ऐनक नाक पर टिकाए हुए ऊन का स्वेटर बुन रही थीं। ​आर्यन ने अपने चेहरे पर दुनिया की सबसे बड़ी मासूमियत ओढ़ी। उसने अपनी आँखें थोड़ी बड़ी कीं, आवाज़ में मिठास घोली और पुकारा, "ताई जी! ओ ताई जी!" ​ताई जी ने अपनी ऐनक के ऊपर से घूरते हुए खिड़की की तरफ देखा। "की है वे? अब क्या आफत आ गई? दोपहर को भी चैन नहीं लेने देता तू!" उनकी आवाज़ में वही चिर-परिचित कड़वाहट थी। ​आर्यन ने बहुत ही अदब से वो काला, फूला हुआ लिफाफा खिड़की के ग्रिल से बाहर की तरफ निकाला। "ताई जी, वो... मम्मी ने आपके लिए ताज़े आलू भिजवाए हैं। कह रही थीं कि मंडी से बहुत बढ़िया आलू आए हैं, ताई जी को दे आ, वो शाम को अपने लिए आलू-गोभी बना लेंगी।" ​'मुफ्त के आलू' सुनते ही ताई जी के चेहरे की लकीरें अचानक नर्म पड़ गईं। गुस्से की जगह लालच ने ले ली। उन्होंने स्वेटर किनारे रखा और चारपाई से उठकर खिड़की के पास आ गईं। ​"तेरी माँ ने भेजे हैं? चल, कोई तो अकल का काम किया उसने आज।" ताई जी ने बुदबुदाते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया। ​आर्यन ने पूरी सावधानी से वो 'आलू' वाला लिफाफा ताई जी के हाथों में थमा दिया। लिफाफा काफी भारी था। ताई जी ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और संतुष्टि से मुस्कुराईं, "बड़े भारी आलू हैं। ठीक है, जा कह देना अपनी माँ को कि मिल गए।" ​"हाँ जी ताई जी!" आर्यन ने कहा और तुरंत खिड़की से नीचे बैठ गया। वह वहाँ से भागा नहीं। वो बस दीवार से सटकर बैठ गया और अपनी दोनों हथेलियों से अपना मुँह कसकर दबा लिया ताकि उसकी हंसी की आवाज़ बाहर न जा सके। उसके दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे लग रहा था जैसे सीना फाड़ कर बाहर आ जाएंगी। ​खिड़की के उस पार, ताई जी लिफाफा लेकर अपनी रसोई की तरफ बढ़ीं। आर्यन अपने कानों को दीवार से लगाए हर आहट को महसूस कर रहा था। ​कदमों की आवाज़... रसोई का दरवाज़ा खुलने की आवाज़... लिफाफे को रसोई की स्लैब (काउन्टर) पर रखने की आवाज़... ​और फिर, ताई जी ने लिफाफे की गांठ खोली। ​एक सेकंड का खौफनाक सन्नाटा... ​और फिर जो हुआ, वो इतिहास बन गया। ​"हाय रब्बा!!!!" ​ताई जी के गले से एक ऐसी चीख निकली जिसने पूरे मोहल्ले की दोपहर की नींद को चकनाचूर कर दिया। वो चीख ऐसी थी जैसे किसी ने उनके नंगे पैर पर खौलता हुआ तेल डाल दिया हो। ​चीख के साथ ही रसोई में बर्तनों के गिरने की भयंकर आवाज़ आई— छन्न! धड़ाम! ताई जी ने जैसे ही लिफाफे के अंदर हाथ डालकर 'आलू' निकालना चाहा था, उनके हाथ में एक मोटी, ठंडी और बालों वाली पूंछ आ गई थी। जब उन्होंने घबराकर लिफाफे को स्लैब पर पलटा, तो उसमें से आलू नहीं, बल्कि सात खौफनाक, मोटे चूहों की लाशें स्लैब पर लुढ़कती हुई उनके पैरों के पास आ गिरीं। ​"ओए खोटे सिक्के! ओए बेगर्क हो जाए तेरा! ये की दे गया तू मेनू!" ​ताई जी की आवाज़ अब किसी फटे हुए लाउडस्पीकर की तरह गूँज रही थी। वो बदहवास होकर रसोई से बाहर भागीं। उनके पैरों की चप्पलें कहाँ रह गई थीं, उन्हें खुद नहीं पता था। वो सीधे उसी खिड़की के पास आईं जहाँ से आर्यन ने उन्हें वो 'तोहफा' दिया था। ​"ओए आर्यन! निकल बाहर! चूहों को आलू बताता है तू? तेरा तो मैं आज वो हाल करूंगी कि तेरी माँ भी नहीं पहचानेगी!" ताई जी दोनों हाथों से खिड़की की ग्रिल को ऐसे झकझोर रही थीं जैसे कोई कैदी जेल की सलाखें तोड़ना चाहता हो। ​आर्यन अपनी हंसी रोकने के चक्कर में फर्श पर लोटपोट हो रहा था। उसकी आँखों से पानी बहने लगा था। बाहर ताई जी की गालियों का वो बवंडर उठा हुआ था जिसने आस-पास के चार घरों के लोगों को अपनी छतों पर इकट्ठा कर दिया था। ​"मार दिया मेनू! मेरे रसोई में मरे हुए चूहे फेंक दिए इस चुड़ैल के बच्चे ने!" ताई जी छाती पीट-पीट कर पूरे मोहल्ले को आर्यन के 'पाप' के बारे में बता रही थीं। ​उस दिन आर्यन की माँ ने उसे जो डांट पिलाई, और पिता जी ने जो उसकी 'खातिरदारी' की, वो भी उसे बिल्कुल दर्द नहीं दे रही थी। क्योंकि जब भी वो आँखें बंद करता, उसे बस ताई जी का वो खौफनाक चेहरा और वो काले लिफाफे से गिरते हुए 'आलू' नज़र आते। ​आज जब वो बचपन याद आता है, तो आँखें भीग जाती हैं। वो शरारतें, वो डांट, वो गालियां... सब कुछ कितना अपना सा था। आज बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स की बंद दरवाज़ों वाली ज़िंदगी में वो 'काले लिफाफे' वाला सुकून और वो ठहाके कहीं बहुत पीछे छूट गए हैं। ताई जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आज भी जब घर में आलू की सब्ज़ी बनती है, तो आर्यन के चेहरे पर वही पुरानी, 11 साल के बच्चे वाली शैतानी मुस्कान लौट आती है। ​— सुखविंदर की कलम से


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