Arvina Ghalot

Tragedy


3.4  

Arvina Ghalot

Tragedy


रज्जो बुआ (स्त्री)

रज्जो बुआ (स्त्री)

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शादी वाले घर के आँगन में ढोलक के आसपास बैठी सभी महिलाएं हँसी ठिठोली कर रहीं थी । रज्जो की भतीजी सुनंदा की शादी में सभी आस पड़ोस की महिलाएं बन्नी गाने लिये‌ आई हुई थी। आँगन के किनारे पर बैठी पड़ोस के शम्भू चाचा की बहू अपनी जिठानी से बोली "जिज्जी ढोलक की पुजाई में और कितनी देर लगेगी सारा आँगन तो औरतों से भर गया है।"

"अरी सुमन ! रज्जो बुआ के बगैर किसी के घर आजतक गीत शुरू हुए हैं सो आज होंगे अरी ! आज तो रज्जो बुआ की अपनी भतीजी की शादी है।"

 "धीरज धर तू अभी नई नई आई है रज्जो बुआ के बारे में जानती नहीं है ।रज्जो बुआ तो सुनंदा की बुआ हे ही लेकिन साथ ही सारे गांव की बुआ है। उन्हें बच्चे बूढ़े सभी इसी नाम से बुलाते हैं ।हमारी रज्जो तो जगत बुआ है। देखने में सांवली बड़ी बड़ी आँखो वाली काम काज में सुघड़ मनमोहिनी सी हैं। गाँव में किसी को अस्पताल ले जाना हो किसी का बिजली बिल जमा करना हो गाँव वालों के हर सुख दुःख में रज्जो बुआ‌ खड़ी रहती हैं। जानती है , रज्जो बुआ हमारे गांव की सरपंच भी है । उन्होंने इस गांव की महिलाओं के लिए एक सिलाई केन्द्र खोल रखा है ।जहाँ खुद रज्जो बुआ दोपहर में सिलाई सिखाती है। अपने घर के सारे काम चटापट किसी रोबोट की तरह निपटाती है । घर में सुबह किसे गरम पानी चाहिए किसे क्या नाश्ता पसंद सब रज्जो बुआ ही देखती है। लेकिन कभी लगता है ,दूसरों को इतना सुख बाँटने वाली रज्जो बुआ की किस्मत में खुद के लिए सुख का एक टुकड़ा नसीब में नहीं लिखा है।"जिलानी की बात ध्यान से सुन रही देवरानी अचानक बोली ।

"जिज्जी मेरी तो उत्सुकता बढ़ती ही जा रही है ।आखिर ऐसा क्या हुआ इन की जिन्दगी में ?"

"सुनो बात तब की है जब मैं नई नई ब्याही कर आई थी इस गांव में एक सप्ताह बाद ही रज्जो बुआ की शादी थी ।तिलक फलदान हो चुका था । घर में शादी की तैयारी चल रही थी । रज्जो बुआ मेरी हम उम्र थी सो मैं उनसे मिलनेऔर साथ ही साड़ियों की पैकिंग में हाथ बंटाने चली जाती थी । रज्जो की खुशी उसके चेहरे से छलकी पड़ रही थी । वो दिन भी आ गया जिस दिन रज्जो बुआ की शादी थी । उन्हें तैयार करने की जिम्मेदारी मुझे सोंपी गई थी । मुझे याद है तैयार करने के बाद रज्जो बहुत सुंदर लग रही थी ।बाहर से कुछ लड़कियों ने आकर बताया बरात आ गई है

बरात आ गई रज्जो ने सुना तो उसके गाल और गुलाबी हो उठे । द्वाराचार की रस्म चल रही थी । दुल्हे पर चावल छिड़कने की रस्म को करने के लिए रज्जो को लेकर हम सभी महिलाएं बाहर गए लेकिन वहाँ का दृश्य कुछ और ही था । दुल्हे का पिता शराब की पिनक में रज्जो के पिता से कार की माँग कर रहा था । रज्जो के पिता इस अचानक की गई माँग से परेशान होकर अपनी पगड़ी लड़के के पिता के पैरों में रख दी पर वो बाप बेटे नहीं पिघले यह दृश्य देखकर रज्जो बुआ जो अब तक चुप खड़ी थी अचानक दोड़कर गई और पिता की पगड़ी उठा कर अपने पिता के सिर पर रख दी और सभी बरातियों के सामने शादी से इंकार कर दिया ।दुल्हा सहित बरात वापस जाने लगी यह सब पिता के लिए हृदय विदारक दृश्य था ।उनकी आँखों से आँसुओं का सैलाब उमड़ रहा था । रज्जो की आँखे मानो पत्थर की हो गई थी । अचानक भीड़ को चीरते हुए रज्जो बुआ अन्दर की ओर भागी कोई कुछ समझ पाता तब तक कमरे के किवाड़ बंद कर लिए ।उधर लडके के पिता को कुछ लोगों ने समझाने-बुझाने की‌ बहुत कोशिश की कोई फायदा नहीं हुआ । बरात वापस लौट गई

इधर कुछ देर बाद कमरे का दरवाजा खुला रज्जो ने कपड़े गहने सब उतार कर पुराने कपड़े पहन लिए थे । हाथों में शादी का जोड़ा ले जाकर माँ के हाथों में रख दिया माँ तो दहाड़े मार कर रो पड़ी । इस घटना से क्षुब्ध होकर रज्जो ने शादी ना करने का निर्णय सभी घर वालों को सुना दिया ।


उस दिन के बाद किसी ने रज्जो से शादी करने के लिए ज़िद नहीं की । कुछ साल बाद माता पिता भी चल बसे । रज्जो बुआ भाई भाभी के साथ ही रहती है।


रज्जो ने अपने आपको घर के काम और समाज सेवा के कार्यों में लगा दिया। रज्जो बुआ की भाभी रज्जो पर जान छिड़कती हैं ।रज्जो बुआ को उनकी भाभी ने सारा घर ही उन्ही के सूपूर्द कर दिया है। सुनंदा की परवरिश रज्जो बुआ ने ही की है।सुनंदा की एक बार तबियत खराब हो गई थी रज्जो ‌बुआ ने अपना खून देकर उसके प्रयाण बचाए थे । सारा घर उनका ऋणी हो गया इतनी अच्छी है जितनी तारीफ करो कम है।

"अररर ......लो वो देखो रज्जो बुआ आ गई अब गीतों का समां बंधेगा ।"

" जिज्जी मैं तो रज्जो बुआ के चेहरे में ही खो गई ।"

तभी रज्जो बुआ बोली "अरी लुगाइयों ये शादी वाले घर में छम छाम अच्छी नहीं लगती बजाओ री ढोलक मेरी सुनंदा की शादी में रोनक लागा दो ।" 

भाभी खिलखिलाकर बोली "रज्जो जीजी सुनंदा के ब्याह की ढोलक तो आप पूजेगी ।"

"अच्छा ! ऐसी बात है तो लो अभी पूज देते हैं ।" झट से रज्जो बुआ अंदर गई और बताशे ओर हल्दी ले आई और ढोलक पूज दी । फिर बैठ गई बन्नी गाने ज्योत से ज्योत जलाते चलो मेरी बरनी को सजाते चलो।


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