रीढ़ की हड्डी
रीढ़ की हड्डी
सर्दी की तो हद हो गई जाने का नाम नही ले रही है... कांपते हुए हाथों से तीन प्यालों में चाय भरते-भरते अम्मा जी खुद में बुदबुदा रही थी तभी बाहर से आई आवाज को सुनकर थोड़े देर के लिए वह घबरा गई, “अम्मा जी अम्मा जी...”
”आई बहू...” तीनों प्यालों को ट्रे में रखते हुए बाहर आते ही, “लो बहू गरम-गरम चाय।”
सरिता(बहू) - “अम्मा जी जानती हैं कि हम दोनों इस समय घर आ जाते हैं फिर क्यों सब दिन एक हीं बात बतानी होती है।”
राजेन्द्र (बेटा )- “अम्मा कुछ पकौड़े नहीं बनाई अभी इस मौसम में हीं तो अच्छा लगता है।”
अम्मा – “तेरी बचपन की आदत नहीं गई घर आते ही फरमाइशे शुरू! अभी बना देती हूँ।”
बहू – “नहीं नहीं कोई जरूरत नहीं है... नहीं तो कल जाकर सुनने के लिए मिलेगा कि पति – पत्नी बैठे रहते थे, बेचारी अम्मा को सारा काम अकेले करना पड़ता था। अम्मा जी अपनी चाय रसोई में हीं लेकर जाइए ठंडी हो जाएगी।”
राजेन्द्र – धीरे से बोला, “अम्मा का भी मन होगा हम लोगों के साथ चाय के बहाने दो बात कर लेने की, बेचारी दिन भर अकेली इस चार दीवारी में कैद रहती हैं।”
सरिता- “और मैं सुबह घर से दो पैसे कमाने निकलती हूँ, क्या मेरा मन नहीं करता कि दो पल सुकून से आप के साथ बैठूं। ठीक है, अम्मा जी के पास बैठिए। अम्मा जी-अम्मा जी आइए, बैठिए यहाँ आपके बेटे का मन नहीं लग रहा है।”
अम्मा जी सारी बातें सुन रही थी, लेकिन जाएँ की नहीं इस दूविधा में पड़ी बेचारी बाहर बरामदे में गई।
बहू (सरिता)- “अब तो मन की पूरी हो गई, ऑफिस से आते हीं बगल में बैठकर बातें करने का क्या शौक है, भगवान जाने।”
अम्मा जी आंचल से आंसू पोछते हुए बोली, “ए बहू मुझे क्या पता आजकल का रीति-रिवाज मै तो बस यही देखी थी जब तेरे बाबूजी ऑफिस से आते थे मेरी अम्मा जी, बाबूजी और तो और सारे बच्चे इस तरह घेर लेते थे कि जब तक मास्टर ना आ जाए पढ़ने नहीं जाते थे।”
सरिता- “अम्मा जी जमाना बदल गया है छोड़िए आप के समझ में नहीं आएगी।”
सरिता-रसोईघर चली गई बर्तनों की आवाज से मानो बर्तनों के बीच युद्ध छिड़ गया हो। अम्मा अपने लोटे में पानी भरी और बेटे से बोली, “बेटा राजेन्द्र...”
राजेन्द्र – “जी अम्मा।”
अम्मा – “बहू से कह देना मेरी तबियत ठीक नहीं है आज मै खाना नहीं खाऊँगी।”
राजेन्द्र – “अरे अम्मा वह तो यूँ हीं बोल दी, भूखे मत सोना। फिर आपकी दवाई छुट जाएगी और वह बेचारी भी क्या करे दिन भर ऑफिस की किचकिच और आपसे घर की हालात भी छिपी नहीं है।”
अम्मा – “नहीं रे पगले यह तो मै बताने वाली थी, लेकिन इन सब बातों में यह बता नहीं सकी... सच बेचारी परिवार के लिए बहुत करती है”
सरिता- “सुबह -सुबह यह कैसी आवाज़ आ रही है हे भगवान! ऑफिस से आकर घर का काम करो और छुट्टी के दिन भी चैन से सोने नहीं मिलता है, सभी जान के दुश्मन बने हुए हैं अम्मा जी, अम्मा जी क्या कर रहीं हैं।”
अम्मा जी- “कुछ नहीं बहू रात के कुछ बर्तन रखे थे पूजा का पानी भरूँगी तो सोची नहाने से पहले यह...“
अम्मा जी और कुछ बोल पाती सरिता बरसने लगी, “हाँ - हाँ मुझे तो कुछ आता हीं नही, जानती हैं कि मुझसे रोटी अच्छी नहीं बनती तो रात में बीमार हो गई।”
अम्मा जी बात को बढ़ाना नहीं चाहती थी चुपचाप अपनी पूजा पाठ में व्यस्त हो गई। पूजा के बाद जैसे ही चाय की प्याली उठाई ही थी कि सरिता की आवाज सुनाई दी, “अम्मा जी जरा सब्जी काट दीजिएगा।” बेचारी अम्मा जी बरामदे पर बैठकर सब्जी काटने लगी इसी बीच चाय भी पीना भूल गई।
सरिता – “अम्मा जी यह क्या ?”
अम्मा जी - “अब क्या हुआ बहू?”
सरिता – “जब चाय नहीं पीनी थी तब बनाई क्यों ? लाइए मैं सब्जी बना देती हूँ और आप...”
”कहने की कोई जरूरत नहीं बहू, रोटी मैं बना दूँगी,” अम्मा जी बात काटते हुए बोली।
सरिता – नाश्ता करके अपनी सहेलियों के साथ घुमने निकल गई। राजेन्द्र पहले अपने लैपटाप फिर अपने साथियों में इस तरह खोया कि उसे भी अम्मा जी के अकेले होने की सूदबूद नहीं रही। चाय-नाश्ता और घर का काम, साथ-साथ राजेन्द्र के साथियों का बार – बार का चाय।
दिन के बारह बज गए और सरिता का कोई पता नहीं। जब राजेन्द्र को अहसास हुआ तब गपशप मंडली को तोड़कर दौड़ते हुए आया, “अम्मा जी, अम्मा जी, कहाँ हो...” हाथ पकडकर बिठाया और खुद रसोई में जाकर काम करने लगा अम्मा जी को अच्छा ना लगा, “अरे राजू तू हट मैं बनाती हूँ।”
राजेन्द्र – “अरे आज मेरे हाथ का तो खाकर देखो अम्मा... मेरे दोस्त लोग तो दीवाने हो जाते थे जब मै कभी कभी होस्टल में बनाता था।”
अम्मा जी – “चल झूठा, देख सरिता भी आ गई।”
सरिता – “हटिए हटिए मेरे बिना तो इस घर में एक पत्ता भी नहीं हिलता।”
खाना खाने के बाद सभी थोड़े देर के लिए बिस्तर पर चले गए, लेकिन अम्मा जी को कहाँ चैन वो तो पोते-पोती की सिलाई उधडी हुई कपड़ों की तुरपाई में लग गई।
अब तो रोज की कहानी बन गई, ‘अम्मा जी सब्जी काट दो, अम्मा जी रोटी बना लीजिएगा’ और सरिता के आदत में एक और आदत जुड़ गई थी ऑफिस से आते हीं शाम में घुमने निकल जाती कभी इस सहेली के यहाँ तो कभी उस सहेली के यहाँ।
अब तो अम्मा जी का शरीर साथ देना छोड़ दिया, गठिया के दर्द ने तो अपाहिज-सा बना दिया... उस पर सरिता का हर बात पर कुछ ना कुछ सुना देना। आज तो हद हीं कर दी सरिता ने!
कुछ दिन पहले बच्चों की गलती से चश्मा टूट गया, इसके कारण अम्मा जी को ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी। छज्जा पर लटकते मनीप्लांट को देखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी, “राजू राजू घर में साँप घुस आया है” और बोलते बोलते घर से बाहर निकल गई, मानो डर के मारे सूदबूद खो गया हो।
”अरे बच्चों को बाहर भेजो...” पोते-पोती भी बाहर आ गए आस - पड़ोस के लोग जमा हो गए और अम्मा जी डर में बोले जा रही थीं दोनों कमाते हैं, लेकिन यह नहीं कि घर की मरम्मत करवा लें। साँप-बिच्छू तो निकलेंगेही!”
तब सबने जाकर देखा, साँप कहीं नही दिखा। लोगों ने कहा, “अम्मा जी हमने तो देख लिया है, अब आप हीं बताइए कि आप ने साँप कहा देखा?”
पहले तो अंदर जाने के लिए मान ही नहीं रही थी। फिर बाद में मानी। जैसे देखा कि फिर चिल्ला उठी, “दिखता नहीं है यह क्या है ?”
सरिता – चिल्ला उठी, “अम्मा जी आप भी हद करती हैं इस बुढ़ापे में भी यह ताकत, वैसे तो बिस्तर छुटता नहीं है, कभी घुटने में दर्द तो कभी पैर नहीं उठ रहा... पैसे तो पानी की तरह बहा रहे हैं आपके इलाज से पैसे बचे तो घर की मरम्मत हो ना, खुद तो डरती ही हैं मेरे बच्चों को भी डरपोक बनाकर रख दी हैं।”
सरिता कभी बोलकर इधर तो कभी बोलकर उधर। अम्मा जी अंत में हाथ जोड़ ली, “माफ कर दे बहू गलती हो गई।”
वहाँ खड़े लोगों को यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा। वे लोग धीरे - धीरे वहाँ से निकल गए, लेकिन सरिता कि बातों ने उतना आहत नहीं किया अम्मा के मन को, जितना आज राजेन्द्र का चुप रहना... उसके बाद जो अम्मा जी बिस्तर से लगी तो फिर कभी नहीं उठी।
अम्मा जी नहीं रही। राजेन्द्र के आँसू रुके नहीं, रुक रहे थे! शायद उस दिन सरिता को बोलने से रोक लेता तो कुछ दिन और अम्मा जी की छाया मिलती। सरिता ने भी आंसू के दो बूंद गिराए लेकिन उनके पोते-पोती का बुरा हाल हो गया। किसी ने कहा, “तुम्हारी दादी तो तारा बन गई।”
अब रोज शाम में दोनों भाई – बहन छत पर जाकर टिमटिमाते तारों से घंटों बातें करते हैं। अम्मा जी के जाने के बाद सरिता को अहसास हुआ माता-पिता कंधे पर बोझ नही, रीढ़ की हड्डी होते हैं जो हमें सदा सीधे चलने की ताकत देते हैं।
