रेलनामा एक संस्मरण
रेलनामा एक संस्मरण
बहुत समय पहले की बात है लगभग इस बात को पन्द्रह वर्ष हो गई होगी मैं अपनी माँ के इलाज के लिए दिल्ली गई थी वहाँ इलाज के पश्चात पता चला कि हृदय में कोई ज्यादा खराबी नहींं हैष औषधीय चिकित्सा से ठीक हो जाएँगी। यह सुनकर हमलोग अत्यंत प्रसन्न हुए लेकिन हम लोगों ने लौटने का टिकट नहीं लिया था क्योंकि चिकित्सा कितनी लम्बी चलेगी हृदय सम्बन्धित बात है अस्पताल के चक्कर में बीस पच्चीस दिन कैसे बीत गए पता हीं नहीं चला अब तो मेरे पापा और मेरे पति को अपनी अपनी कार्यालय की याद आने लगी।
हमलोगों ने मिलकर यह विचार किया कि अब यहाँ रहकर कोई फायदा नहीं है, अब कोई भी ट्रेन की टिकट मिल जाए तो घर पहुंचें। मेरी माँ भी इन परेशानियों से थक गई थी। जैसे -तैसे टिकट का इंतजाम हुआ और हमलोग घर के लिए निकले ट्रेन सुबह के पांच बजे थी लेकिन हमलोग डेरा को तीन बजे छोड़ने का विचार से सो गए लेकिन निकलते- निकलते सवा तीन तीन बीस हो गई थी। ट्रेन में बैठी तब दिल ने सुकून की साँस ली कि चलो कल शाम के सात –आठ बजे तक घर पहुंच हीं जाएँगे।
रेलगाड़ी चल तो पड़ी लेकिन हर दो घंटे आधे घंटे में बार- बार ट्रेन रुकनी शुरू हुई, तब हमलोगों ने पहले सोचा कि हमलोग समय पर अपनी मंजिल तक पहुंच जाएँगे। हमलोगों ने चलने से पहले बहुत सारा खाने का समान साथ में रख लिए थे इसलिए खाने की चिंता नहीं थी और रास्ते में खरीद कर खाना नहीं था क्योंकि अगर कोई कुछ मिलाकर कुछ खिला दिया तब क्या होगा समान ले जाएँगे उसका गम नहीं था लेकिन किसी को कुछ हो जाएगा तो कौन देखेगा कौन बचाएगा और अगर मेरे बच्चे को कोई उठा लिया तब क्या होगा यह बातें भी दिमाग में पहले से घर बनाई हुई थी और मेरे पापा तो साफ - साफ मना कर दिए थे कि बाहर की चाय तक नहीं पीना है।इस तरह रात हो गई हमलोगों ने खाना खाया और उसी बीच मेरे पति एक स्टेशन पर उतर कर पांच छह पानी का बोतल खरीद लिए उसके बाद हमलोग सो गए।
सुबह मेरे पापा की नींद खुली तो बड़े खुश होकर बोले अरे वाह हमलोग गंगा जी के ऊपर से गुजर रहे हैं शायद पटना आ गए हैं मैं भी खुशी से उठकर बैठ गई जैसे मेरी नींद हीं उड़ गई मैं फिर से सोने की कोशिश करने लगी कि शायद मेरे सोने से यह समय जल्दी जल्दी निकल जाएगा या फिर ट्रेन जल्दी से मंजिल पर पहुँचा देगी मेरी इस सोच को सोचकर मुझे आज भी हँसी आती है लेकिन जैसे जैसे अँधेरे को चिर कर जब सूर्य भगवान अपना उजाला फैलाएँ तब पता चला कि हमलोगों को पटना पहुँचने में अभी समय है मन तो अब थक गया था और एक चाय की तडप वैसे चाय की उतनी आदत तो नहीं थी लेकिन सुबह सुबह उसकी याद दस्तक दे हीं गई लेकिन पापा की हिदायत मन से दिमाग तक दौड़ लगा रही थी लेकिन ग्यारह बारह बजे तक बरौनी से निकल गए तब लगा नहीं अब हमलोग समय पर हैं और यह क्या बरौनी के बाद ट्रेन रूक गई जैसे अभी आसमान में थे और अभी तुरंत दलदल में फँस गए और दलदल भी कैसा जो ना हीं अपने में समेट रहा है ना निकलने के लिए ट्रेन कोई रास्ता हीं दे रहा है।
अब तो भूख है की सिर चढ़ कर बोल रही है लेकिन मन अब फिर वही खाने को तैयार नहीं था कभी पेड़े वाला तो कभी भूजे वाला हो अभी तो इस भूजे की सुगंध तो लजीज खाने को मात कर रही थी दूसरी ओर ट्रेन अपनी जगह डटी हुई थी कोई कहता अरे वह ट्रेन निकल जाएगी तब यह चलेगी देखते देखते कितनी ट्रेन बगल से होकर निकल गई लेकिन हमारी ट्रेन वहीं की वहीं खड़ी थी अब तो घर सात आठ बजे पहुँचने का सपना टूटता हुआ नजर आ रहा था और टूट हीं चुका था संयोग से केला बेचने वाले ने आवाज लगाई पापा जी ने केले खरीद कर सभी को दिए खाने का मन नहीं था लेकिन अपने को बचाना है तो खाना हीं पड़ेगा उस बीच एक व्यक्ति ट्रेन में चढ़ा जिसे आँख से दिखाई नहीं देता था हाथ में एक टेढ़ी -मेढ़ी थाली थी जिसे पिट पिट कर गाना गा रहे थे –गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा जीवन का यह रूप देखकर अभी मुझे अपनी परेशानी तो कुछ नहीं लग रही थी और कुछ पल चैन में गुजरी लेकिन फिर वही कशमकश इस तरह चलते रूकते रात के एक बजे जब कटिहार जंक्शन पहुंची तब चारो ओर कोहरा छाया हुआ था दूर दूर तक कोई नहीं मुश्किल से एक दो लोग चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था रौशनी तो कोहरे में गायब हीं हो गई थी।
बारह बजे की ट्रेन तो निकल चुकी थी लेकिन दो बजे खुलने वाली ट्रेन खड़ी थी क्या करें क्या नहीं। सभी का यही विचार हुआ कि पांच बजे की ट्रेन का इंतजार नहीं करते हुए अभी ट्रेन में बैठा जाए दो बजे खुल जाएगी और सोते सोते पांच बजे घर भी पहुंच जाएँगे उस कोहरे से घिरी रात में बाहर से लेकर ट्रेन के अंदर तक मुश्किल से दस बारह आदमी और अभी भी लम्बा सफर ओह अजीब डरावना वह मंजर था पापा और मेरे पति टिकट लेने चले गए डिब्बे के अंदर घोर अँधेरा मन डरा हुआ था लेकिन अपने घर के आस पास होने का अहसास एक अजीब सी शक्ति भी प्रदान कर रही थी ट्रेन में बैठने के साथ हीं मेरी नजर बाहर एक शूट बूट वाले आदमी पर गई जो हाथ में फाइल लेकर खड़ा था कुछ समय के बाद वह नजरों से ओझल हो गया और अचानक जिस डिब्बे में हमलोग बैठे थे आकर बैठ गया।
मैं अपनी माँ को देख रही थी और माँ मुझे और मन हीं मन लग रहा था चलो कोई और साथ तो है फिर दूसरे पल मन शंका से घिर जाता था क्योंकि उस समय ट्रेन में चौरी डकैती की सिलसिला चला हुआ था कि मन डर के मारे एक कोने में जाकर छिप जाना चाहता था और मेरा मन बार -बार यह कह रहा था अरे पापा कहाँ हैं आप ? मन बार बार पूकार रहा था उस व्यक्ति की आवाज में इतनी मधुरता थी कि जैसे लग रहा था न जाने कब से वह हमलोगों को जानता है अनजान व्यक्ति –लगता है आपलोग कहीं दूर से आ रहे हैं। मैं- हाँ, अनजान व्यक्ति - कहाँ तक जाना है।
मैंने जान बुझ कर एक स्टेशन आगे का नाम लिया। अनजान व्यक्ति –ओ अच्छा अच्छा। मैने हिम्मत करके उस अनजान व्यक्ति से पूछ हीं लिया आप कहाँ तक जाएँगे उसने पूर्णियां नाम लिया मैने बड़े आश्चर्य से उसकी ओर देखा उसने कहा मेरी मीटिंग है कल सुबह नौ-दस बजे मैने कहा आप क्या करते हैं और आप सुबह पांच बजे भी जाते तो एक घंटे में पुर्णिया पहुंच जाते उसने बड़े हीं मीठे स्वर में उत्तर दिया मैं इंजिनियर हूँ अभी जाऊँगा तो ठीक होगा और यह बात मुझे बड़ी अटपटी लगी। उसने फिर पूछा आपलोग कितने लोग हैं सिर्फ दो मैने हिम्मत करके कहा नहीं नहीं हमलोग दस ग्यारह लोग हैं ट्रेन खुलने में अभी समय होने के कारण और टिकट भी लेना था वेलोग थोड़ा बाहर तक गए हैं, आ रहे होंगे। अनजान व्यक्ति -अच्छा।उसके बाद वह थोड़ी देर बैठा रहा फिर अचानक उठा और बिन बोले ट्रेन से निकलते हुए उस कोहरे में खोता हुआ न जाने कहाँ गायब हो गया।
ओह ! अब तो और डर ने अपना डेरा बना लिया सारी जानकारी लेकर शायद वह बीच रास्ते में कुछ न करे।जब मेरे पापा और मेरे पति आए तब सारी बातें मैने बताई और अब तो नींद कहाँ एक डर बार बार दस्तक दे रही थी, कहीं कुछ हो न जाए मेरे पापा ने कहा सब सो जाओ मत डरो मैं हूँ मेरे पति भी नहीं सोए मैने माँ को सोने के लिए बोलकर खुद को भी दिलासा दे रही थी कुछ नहीं होगा लेकिन मन को भी अपने आप पर विश्वास नहीं था अपने बेटे को कलेजे से लगाए कभी आँख बंद तो कभी खोलकर इधर उधर देखती ट्रेन अपनी रफ्तार में चली जा रही थी और पापा यही बोलते सो जाओ मै हूँ रात के अँधेरे को चीरते हुए यह ट्रेन कहीं नहीं रुकी और अपने समय पर हमारी मंजिल तक पहुँचा दिया लेकिन इस घटना से यही सीख मिली कि कितनी भी जरूरत क्यों न हो जल्दी में आकर कोई गलत फैसला नहीं लेना चाहिए और जिस चीज की जानकारी नहीं हो वह काम नहीं करना चाहिए यह सफर एक सफर नहीं एक सीख थी जो जीवन को देते हुए रेलगाड़ी से उतर कर साथ चल दी कि जीवन के सफर में कोई ऐसी गलती फिर नहीं हो।
