पतझड़ -11
पतझड़ -11
ज्ञानवती को सास ने पूरे दिन काम में उलझाए रखा था। दिमाग शांत रहे, इसके लिए जरूरी है कि हाथ पैर हिलते रहे। दोनों ने मिलकर आलू के चिप्स बनाये और फिर चिप्स सूखने के लिए छत पर डाले। उस दौर में छतों पर जिंदगी झूमती थी, कूदती थी, नाचती थी, कुलाँचें भरती थी। कभी पापड़ सूखते थे, कभी चिप्स और मंगोड़ी, कभी अचार बनते थे, कभी बिस्तर लगते थे, कभी पतंग उड़ती थी और कभी महफ़िल जमती थी।
शाम को सासू माँ के आदेशनुसार ज्ञानवती ने गट्टे की सब्जी, धनिये की चटनी, सूजी का हलवा और रोटी बनाई। सिलबट्टे पर धनिया, टमाटर, अदरक और हरी मिर्ची की तीखी तथा खट्टी चटनी बनाई। ससुरजी के लिए भी चार रोटियाँ सेंककर कपड़े में अच्छे से लपेटकर डिब्बे में रख दी थी। ज्ञानवती, जगदीश और सासू माँ ने भी रात का खाना खा लिया था। थोड़ी देर तीनों बैठे;इधर -उधर की बातें की।
"जगदीश, लगता है तेरे बाबूजी तो कल ही आयेंगे। अंतिम बस भी आ चुकी है, लेकिन बाबूजी अभी तक नहीं आये।" सासू माँ ने कहा।
"हाँ अम्मा, मुझे भी यही लगता है।" जगदीश ने माँ की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा।
"रात भी खूब हो गयी है। सुबह नल जल्दी आ जाएँगे, पानी भी भरना होगा। अब हम सबको सो जाना चाहिए।" ज्ञानवती की सासू माँ ने सुझाव कहें या आदेश दिया।
"ठीक है अम्मा। मैं एक बार बाहर का दरवाज़ा देखकर आ जाता हूँ।" जगदीश ने उठते हुए कहा।
"बहू, तू भी जाकर अब सो जा। आज दिन भर खूब काम कर लिया है।" ऊँघती हुयी ज्ञानवती को सासू माँ ने कहा।
"जी अम्माजी।" ज्ञानवती ने कहा और अपने कमरे में चली गयी।
अपने कमरे का दरवाज़ा भेड़कर ज्ञानवती बिस्तर पर लेट गयी। बाहर बड़ी -बड़ी जम्हाइयाँ ले रही ज्ञानवती की नींद बिस्तर मिलते ही कहीं रफूचक्कर हो गयी थी। शरीर को भले ही नींद चाहिए थी, लेकिन मन सोना नहीं चाहता था। वह बार-बार बीते हुए कल की तरफ जा रहा था। ज्ञानवती सोच रही थी कि, अब तो उसकी सास के मायके वालों को भी उसके साथ हुए हादसे की खबर लग गयी होगी। मामी सास, ननदें, भाभियाँ आदि उसके चरित्र के बारे में कितने ही कयास लगा रही होंगी। सभी लोग उसी के बारे में बात कर रहे होंगे। वैसे भी औरतें हर किसी के लिए एक सॉफ्ट टारगेट होती हैं। औरतों की चाल -ढाल, हुलिए, बातचीत आदि सभी को तो लेकर लोग बात बना लेते हैं।
अगर कम बात करो तो घमंडी का तमगा दे देते हैं,
ज्यादा बात करो तो बेशर्म तक कह देते हैं,
वजन ज्यादा हो तो बहुत मोटी है कह देंगे,
वजन कम हो तो पतली पतंग कह देते हैं,
जल्दी शादी कर दो तो कहेंगे कि घर में खाने को नहीं था क्या,
देर से शादी करो तो कहेंगे कि कब तक घर में बिठाकर रखोगे,
अच्छे से सज -संवर कर रहे तो चरित्रहीन बता देंगे,
सादगी से रहे तो झल्ली कह देंगे
स्त्री को तो आज से क्या हमेशा से ही कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। स्त्री को कभी उसके स्वयं के लिए वकालत तक नहीं करने देते हैं। ज्ञानवती ने तो स्वयं के घर पर भी यही होते देखा था। उसके बाबूजी और बड़े भाईसाहब का घर पर एकछत्र राज्य था। ज्ञानवती कक्षा 10 के बाद आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन उसे नहीं पढ़ने दिया गया। उसके गांव में कोई स्कूल नहीं था और बाबूजी उसे घर से बाहर अकेले नहीं भेजना चाहते थे। कुछ ऊँच -नीच हो जाए तो उसकी शादी कैसे होगी ? बाबूजी छोटी -छोटी बात पर गुस्सा करते थे, गुस्से में थाली उठाकर फेंक देते थे।
जगदीश भी ज्ञानवती के बगल में आकर लेट गया था। लेकिन ज्ञानवती सोने का नाटक करके पड़ी रही। जगदीश से बात करने का उसका मन नहीं था या जगदीश का बार-बार सामना करना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। जगदीश ने धीरे से उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया। जगदीश के स्पर्श से उसके शरीर में बिजली सी कौंधी और उसने झटके से अपना हाथ वापस ले लिया।
जगदीश उसके हृदय की दशा समझ रहा था। वह तो उसके मन के घाव को भरना चाहता था। लेकिन ज्ञानवती के लिए किसी भी पुरुष का स्पर्श सर्पदंश जैसा था। इतने से स्पर्श से कल की घटना एक चलचित्र के समान उसके सामने घूमने लगी। वह पसीने -पसीने हो गयी थी और एकदम से बिस्तर पर उठकर बैठ गयी।
"क्या हुआ ?" जगदीश ने पूछा।
"कुछ नहीं।" ज्ञानवती ने कहा।
"तुम एकदम से उठ क्यों गयी ?" जगदीश ने फिर ज्ञानवती क हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। ज्ञानवती उसका हाथ छिटककर बिस्तर से उठकर, फर्श पर खड़ी हो गयी थी।
"आप आराम से बिस्तर पर लेट जाइये, मैं नीचे सो जाता हूँ।" जगदीश ने कहा।
"ऐसी कोई बात नहीं है। आप ऊपर ही सोइये, मैं नीचे लेट जाती हूँ।" ज्ञानवती ने कहा।
"नहीं -नहीं, आप ऊपर आराम से सोइये। वैसे भी आज आप बहुत थक गयी होंगी।" जगदीश ने कहा।
कुछ मिनटों तक ऐसा ही चलता रहा। फिर ज्ञानवती ने कहा, "हम दोनों ही ऊपर बिस्तर पर सो सकते हैं। किसी को नीचे फर्श पर सोने की आवश्यकता नहीं। "
"ठीक है।" ऐसा कहकर जगदीश बिस्तर के एकदम किनारे पर जाकर लेट गया था। जगदीश समझ गया था कि उसका स्पर्श ज्ञानवती को उस हैवान की याद दिला देता है।
ज्ञानवती दोबारा बिस्तर पर लेट गयी थी। दोनों के मध्य पर्याप्त दूरी थी। ज्ञानवती ने आँखें बंद करके सोने की कोशिश की ताकि सुबह समय से उठ सके। कल सुबह तो वैसे भी उसकी ज़िन्दगी में और कुछ नया भूचाल लाने वाली है। पुलिस वालों के सवालों का क्या जवाब देगी ? अम्माजी के मायके वालों ने अगर बाबूजी को अपमानित करके भेजा तो क्या होगा ? पता नहीं उन्होंने बाबूजी की बात का यकीन किया भी या नहीं।
ऐसे ही तमाम विचारों में घिरी हुयी ज्ञानवती की आँख लग गयी थी। नल आ गए हैं के शोर से सुबह ज्ञानवती की आँख खुली और वह दरवाज़ा खोलकर बाहर आ गयी थी। ज्ञानवती रोज़ के अपने काम निपटाने लगी, कुछ ही देर में सूरज बाबू भी आ गए थे। ज्ञानवती के कान और आँखें दरवाज़े पर ही थे। वह ही नहीं बाकी दोनों लोग भी बड़ी बेसब्री से बाबूजी का इंतज़ार कर रहे थे।
गेट पर खटखटाहट हुयी। जगदीश ने भागकर गेट खोला। बाबूजी आ गए थे।
