Dr.manju sharma

Tragedy Classics


4.9  

Dr.manju sharma

Tragedy Classics


प्रवासीघाट

प्रवासीघाट

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‘पंख होते तो उड़ आती रे ......’

इस गीत की कल्पना मानो आज पूरी हो रही थी, क्योंकि सुमी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। वह आसमान में उड़ान भर रही थी, जैसे ही उसकी नजर नीचे पड़ी, ऐसा लगा कि सागर ने धरती को आगोश में ले रखा है। यहाँ के चप्पे-चप्पे पर कुदरत का जादू छाया हुआ है। हवाई यान ने बादलों से लुका-छीपी करते हुए माॉरिशस की धरा पर कदम रखा तो शीतल बयार के झोंको ने स्वागत किया। समुद्र हिलोरें लेकर ख़ुशी जाहिर कर रहा था। दूर-दूर तक नीला साफ़ पानी पसरा हुआ था जिसमें आसमान उतरा हुआ सा नजर आ रहा था। सुमी बुदबुदाई कि हम धरती पर हैं या आसमानी चटाई पर। प्रकृति के इस अनुपम सौन्दर्य पर सब मंत्रमुग्ध थे। आँखें नैसर्गिक अद्भुत सौन्दर्य का रसपान कर तृप्त ही नहीं हो रही थीं। सुमी बॉर्डर फिल्म का गाना गुनगुनाने लगी... मेरे भाई ,मेरे हमसाये ..... यह तो एक अहसास था जिसे केवल संचय किया जा सकता था। ऐसा लगा कि यहाँ तो स्वर्ग ही उतर आया है। सुमी ‘स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम’ के सिलसिले में छात्रों संग मॉरीशस आई थी। वह प्रकृति मदमाते सानिध्य में लीन थी।

 मैम, उल्लास भरी आवाज़ ने उसकी तंद्रा भंग की। देखा तो लेबोदानी कॉलेज के शिक्षक उनके स्वागत में खड़े हैं, उन्होंने प्रेम सौहाद्र से स्वागत किया। फोटो और सैल्फी की रस्म के बाद सभी ने फ्रेश होकर नाश्ता किया। सुमी ने सभी छात्रों के साथ शिक्षकों का धन्यवाद किया, इतने में वहाँ के उपप्राचर्य श्रीमान देबीदास जी ने कार्यक्रम की रुपरेखा बताई जिसमें सबसे पहले प्रवासी घाट जाने का निश्चय किया गया था। हमारे छात्र मॉरीशस के छात्रों के साथ घुलमिल गए थे। यह उनकी निश्चलता ही है कि वे बहुत जल्दी परायेपन की दीवार तोड़ देते हैं, सभी खूब मस्ती करने लगे। वहाँ के शिक्षकों के रोम-रोम से आतिथ्य सत्कार तथा सौहाद्र की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी। क्रियोल,अंग्रेजी और हिंदी के मिले-जुले संगम में गोते लगाते हुए हम प्रवासी घाट पहुँचे।

वहाँ बड़े–बड़े जहाज मोटी-मोटी जंजीरों से बंधे थे, मन में विचार कौंधा कि अंग्रेजों ने जिन्हें रोटी के टुकड़े का लालच देकर सदा के लिए गिरमिटिया करार दे दिया था, उनके जीवन की पीड़ा का साक्षी है यह ‘प्रवासी घाट’।

सभी छात्र एक दूसरे से नई-नई जानकारी ले रहे थे। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ही था कि परस्पर जानकारी लें, पढ़ें, तथा एक दूसरे की संस्कृति को जानें और समझें। ग्लोबोलाइजेशन अर्थात वेदों की पुकार ‘उदारचरितानांतु वसुधैव कुटुम्बकम्’ यही तो है।

 कल सुमी यहाँ की कुदरती खूबसूरती की कायल हो रही थी पर आज यहाँ प्रवासी घाट पहुँच कर उसका मन कसैला सा हो आया। उसके होठ बुदबुदाए- अप्रवासी...घाट....

वह अप्रवासी घाट को ऐसे निहारने लगी मानो सोए हुए इतिहास को जगाने लगी हो। अचानक उसकी नज़र उन बंदियों की मूर्तियों पर पड़ी जो बेजान होते हुए भी फिरंगियों की क्रूरता की कहानी कह रही थीं। वह पास जाकर देखने लगी। ओह ! कितनी पीड़ा है इनकी आँखों में ....आखिर क्यों आए होंगे ये यहाँ ? फिर उसका ध्यान हाथ में गन्ने की पाली की ओर गया, सोचा चखूँ तो सही, सुना है, मॉरिशस का गन्ना बहुत मीठा होता है लेकिन यह क्या ? गन्ने से लाल रस निकल रहा है, हाथ चिपचिपासा गया।

मन में कुछ कुलमुलाया कि यह कैसा रस ...? तभी कुछ फड़फड़ाया .. और हलकी सी हँसी और फुसफुसाहट सुनाई दी। इतने में सांकल सरकी और दरवाज़ा चरमराया कि खिड़की खड़की। सुमी के माथे पर पसीना छलका, वह घबरा गई। उसने अपने चौड़े माथे पर छलके पसीने को रुमाल से पोंछा और चाँद से चेहरे की खूबसूरती का पैगाम देती उसकी काली लट जो गाल पर आ गई थी, उसे यों झटका कि सब भ्रम है और नीली साड़ी पर सफ़ेद फूलों को संभालती बेपरवाही से आगे बढ़ी ही थी कि एक मरी, गरीब फटी-सी फुसफुसाती आवाज़ उसके कानों से टकराई, जैसे कई बोरों तले दबा कोई बाहर निकलने को छटपटा रहा हो। सुमी ने गर्दन उधर घुमाई तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई, उसकी नीली आँखे फटी की फटी रह गई, कि चीथड़े में लिपटी एक मूरत बोल उठी .... “तुम छपरा से आई हो .... छपरा सारण जिला बिहार।”

सुमी को काटो तो खून नहीं उसकी घिघी बंध ग। उसके गुलाबी होठों पर पपड़ी सी जम गई, सारे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

काँपते हुए उसने हाँ में गर्दन हिलाई कि अगला प्रश्न अपनेपन की चाशनी में डूबा हुआ था ... तुम छपरा के दधिची आश्रम के पास रहती हो ना ? सुमी कुछ कहती कि हसरत भरी आवाज पर वह सम्मोहित थी। हाँ.. कार्तिक मास की पूर्णिमा को मेला भरे है, सब मिलकर गीत गाते हैं और तो और नाचे हैं, झूमे हैं, फिर थोड़ी सी चुप्पी और एक आह !.. सुमी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या है यह सब किंतु एक सम्मोहन था उस आव़ाज में जो उसे बाँध रहा था।

उसने फिर कहा, डरो नहीं आज सदियों बाद मैं तुममें अपने को देख रही हूँ। हाँ, तुम्हारे से मेरे गाँव की मिट्टी की सोंधी सुगंध आ रही है .. मैं अपने गाँव के गलियारे से मिल रही हूँ। अहा ! मेरा कोई आया है .... मैं कुछ सम्भली और पूछा .. लेकिन तुम क..कैसे जानती हो मुझे।

भारी जंजीरे सरकी लगा कि वह मेरे करीब आ रही है, और करीब... हलकी सी हँसी और वह फ़ुसफुसाई-

मैं भी छपरा गाँव की ही हूँ ना ! उस माटी की महक की चाहत रह गई है मुझे .... फिर आवाज़ कड़की, उसने कहा-

अरे ! तुम कल बाग़ बाग़ हो रही थी ना, यहाँ की धरती को देखकर। एक लम्बी सी साँस जैसे घायल साँप फुफ़कारा हो, इस बार आवाज़ रुआंसी सी हो आई और फिर कहने लगी ... इस पहाड़ को हमने, हाँ हमने चीरा है। भूखे-प्यासे रहकर और गोरों के कोड़े खाकर, दुनिया हमें गिरमिटिया कहती है, यह नाम नहीं है हमारा। यह तो अंग्रेजों का दिया हुआ वह घाव है जो आज भी सालता है हमें।

सुमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी वह अपनी सुध से परे बस सुन रही थी। हवा का एक झोंका कंटीली झाड़ी सा चुभता चला गया। मन में एक हूँक सी उठी कि क्यों आए आप लोग यहाँ ? इस पर उसकी आँखों में पीड़ा झलक आई मानों मैंने उसकी दुखती रग छू दी हो।

“अरे, दो जून रोटी की भूख घेर लाई यहाँ, गोरों ने हमें सब्जबाग दिखाया था। सोना पाने के जाल में फँस गए हम सब। सोना तो दूर चैन की नींद न सो पाए हम। अंधा क्या चाहे दो आँखें, हम भी रोटी की आस में छोड़ आए अपना घर-परिवार, खेत–खलियान, गली-गलियारा, पीपल की छइय्याँ सब कुछ। पेट की आग बहुत बुरी होती है भई ! गाँव के गाँव हो लिए पीछे इन काले पेट के गोरों संग। यहाँ कोरे कागज पर अंगूठे के निशान लगवा लिए हरामजादों ने। हर साल हजारों मजदूर अमीरी के सपने लेकर आने लगे अपनों को छोड़। शर्त यह कि पाँच बरस तक वापस नहीं जा सकते। फिर क्या था भूख प्यास से परेशान मज़बूरी ने हमें मजदूर बना दिया, गिरमिटिया मजदूर। गरीबी, लाचारी बेरोजगार हिन्दुस्तानी एक कौर रोटी और दो कपड़ों के लिए एक बार छल कपट के जाल में फंसे तो फंसकर यही के रह गए। हम गाँव के गाछ-बिरछ को तरस गए, मय्यर बाबा से बिसर गए। फिर एक लम्बी उसाँस ....

सुमी को लगा कि एक दुःख भरी दांस्ता है यह। उसने फिर कहा-

जानती हो भूख -प्यास से बैचेन हमारे कुछ लोग बीमार पड़ गए।

एक व्यंग्य भरी मुस्कान बीमार इनके किस काम के भला ? बस क्या था समुद्र में फेंक दिए गए।

उफ़ ! बस इतना ही निकला सुमी के मुँह से। उसकी बातों में अपने देश की फिज़ाओं को पाने की ललक साफ देखी जा सकती थी। सुमी सोच रही थी कि इंसान कहीं भी चला जाए वह अपने वतन की मिट्टी और अपने इतिहास के पन्नों को नहीं भूलता।

फिर .. ? अब सुमी ने पूछा।

बस काम, काम, काम। जरा सा सुस्ताई लो तो कोड़ों की बौछार। देखो ना आज भी लील छपी है हमारे बदन पर। कोई मजदूर मुँह खोले तो नगें बदन पर चीनी छिड़क चीटियों के बिल पर लिटा दिए जाते थे। सुमी सिहर उठी। अचानक उस कोठरी से बाहर नजर पड़ी तो देखा आसमान में लाली छा गई थी। समझना मुश्किल था कि यह सूर्यास्त का संकेत ही है या फिर आज गिरमिटियों की आत्माएँ क्रोधित है।

और क्या होता था ...? पता नहीं क्यों सुमी ने न चाहते हुए भी पूछ ही लिया।

वह कहने लगी, लड़कियों को हमार सामने छीन के ले जाते और दुर्गति कर नाला में फेंक देते और तो और यहाँ शादी पर पाबंदी थी, बोली पर पहरा था सोच पर चाबुक और वह अकुला उठी। सन्नाटा चीखने लगा।

 कुछ देर बाद जलते रेगिस्तान में पानी की दो बूंद पाकर हरी हुई तबियत से कहने लगी। हम सब अपने साथ रामायण लाए थे, तुलसी मैया का चौरा भी, रामजी का वनवास तो पूरा हुआ पर हमारा वनवास कभी पूरा नहीं हुआ।

बीमार होने का हक़ किसी को नहीं था, भूख प्यास से तड़पते रहो और काम करो। एक दिन काम नहीं किया तो दो दिन के पैसे कट जाते। इनाम में मिलता उपवास।

और आदमी की चाम सूख जाती तो उसे जंगली जानवर का निवाला बना दिया जाता था, वह बोले जा रही थी मानो अपनी पीड़ा अपनों संग बाँटना चाहती हो। उसकी आँखों में पैनापन था, जीभ पर तलवारी धार।

कहने लगी, “अरे मॉरिसस की खूबसूरती की दुनिया इतनी बात करे है ना ! ई हमारे (भारत) खून पसीना से सींची जमीन है। यहाँ की माटी के कण-कण में हमारे रक्त की बूंद है। पहाड़ों की छाती चीर कर हमने नदियाँ बहाई है। यह काले पानी की नदी हमारे खून पसीने का सबूत है।”

सुमी सदियों पुराने चीथड़े इतिहास के झरोकों में झाँक रही थी और भीतर और भीतर। फिर सुनाई पड़ा एक पैगाम ....

 बिटिया तुम छपरा जाओगी तो हमारी माटी, हमारे दरख्तों को हमारा परनाम कहना।

हाँ हैं.. कुछ कहते नहीं बना, जीभ तालू से चिपक गई, आवाज़ गले की दहलीज पर अट गई।

अचानक जोर से किसी ने हिलाया- अरे ! आप यहाँ हैं, कितनी देर से आपका इन्तजार हो रहा है, चलिए।

हैं, हाँ- हाँ... जैसे सपने से जागी हो।

और हवा का जोरदार झोंका आया, मानो कह रहा हो अलविदा !


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