प्रेम के रंग हैं अद्भुत
प्रेम के रंग हैं अद्भुत
ऋचा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं है आखिर उसने अपनी माँ के अधूरे जीवन में जिस साथी की कमी थी उसे पूरा किया था उसने। ये सब आसान नहीं था क्यूँकि, समाज एक जवान बेटी के होते हुए एक विधवा की शादी को कब स्वीकार करता है भला। लेकिन इन रूढ़ियों के विरुद्ध जाकर ऋचा ने बहुत ही सराहनीय काम किया था अपनी माँ के आने वाले भविष्य को तन्हा और अकेला गुजरने से बचाकर। एक ही जीवन मिलती है उसमें भी परिवार की मर्यादाओं का मान रखना फिर समाज की परवाह करना रिश्तेदारों के साथ बनाकर रखना किसी के लिए कितना मुश्किल हो सकता है यह एक बेरंग और अकेला पड़ जाने वाला अच्छी तरह समझता है। ऋचा ने अपनी माँ को उनके पसंद का या यूँ कहें उनका पहला प्यार दिलाया था।
ऋचा के मनाने पर ऋचा की माँ ने शादी तो कर ली मगर बेहद सादगीपूर्ण तरीके से कोर्ट में जाकर। ऋचा का दिल इस बेहद काश समय को अपने खाशमखास दोस्तों के साथ जश्न मनाने के लिए मचल रहा था। उसने अपनी खरीदी दो दोस्तों को इसके लिए बुलाया।
डॉ रेवा को फोन किया ऋचा ने और सारी खुशखबरी देने के बाद उसे जश्न में शामिल होने के लिए बुलाया। रेवा ने उसे मुबारकबाद के साथ ही शाबासी दी इतना हिम्मत भरा काम करने के लिए। और बोली जरूर आएगी।
ऋचा ने फिर मंजरी को फोन मिलाया। मंजरी पुलिस की नौकरी जॉइन कर चुकी है और अपने शहीद पति सुबोध का सपना पूरा कर रही है पूरी हिम्मत, जोश और लगन से। मंजरी भी बेहद खुश हुई ऋचा द्वारा लिए गए इस फैसले से। उसने भी बोला वो इस खास ख़ुशी के अवसर पर जरूर आएगी।
ऋचा चाहती थी उसके माता - पिता कहीं घूम आएं। मगर माँ ने कहा अब इस उम्र में शादी कर ली वही लोगों को राश नहीं आएगा। ऐसे में घूमने निकलना खटकेगा सबकी नज़रों में। जवान बेटी को घर पर छोड़ कर हम लैला मजनू बने घूमते फिर रहे हैं ऐसा ताना कसेंगे लोग। जुबान से नहीं तो नज़रों से जरूर देंगे ताना। हाँ, मगर ऋचा की शादी के बाद वो जरूर घूमने जायेंगे का वादा किया। ऋचा ने सोचा चलो ये नहीं निकलेंगे तो मैं ही इनको साथ में कुछ समय गुजरने दूँ घर पर ही। इसलिए ऋचा ने पार्टी एक अच्छे रेस्टोरेंट में रखी थी। जिसमें दफ़्तर के या रिश्तेदार कोई नहीं थे। सिर्फ उसकी दिल के करीब और पक्की सहेलियां रेवा और मंजरी थी।
अपने माता - पिता से इजाजत लेकर ऋचा रेस्टोरेंट पहुंची और केक, कोल्ड्रिंक्स और स्नैक्स का ऑर्डर देकर रेवा और मंजरी का इंतजार करने लगी। ऋचा रेस्टोरेंट के दरवाजे पर ही नज़र लगाए बैठी थी और दोनों साथ में आती हुई दिखाई पड़ी। उन दोनों के हांथो में तोहफ़े थे। दोनों को देखते ही ऋचा उछल पड़ी और भाग कर दोनों को गले लगा लिया। रेवा और मंजरी ने सच्चे मन से ऋचा को बधाइयाँ दी सराहना करते हुए ऋचा की। ऋचा ने बताया जिनसे माँ की शादी कराई वो माँ को बहुत चाहते थे इसलिए उनके सहयोग से ये मुश्किल काम सफल बन पाया। रेवा और मंजरी ने नव विवाहित जोड़ी के लिए तोहफ़े दिए और उनके सुन्दर भविष्य की दुआँ की।
तभी वेटर केक और खाने पीने की चीज़े लाता है और तीनों खाते - पीते हुए इतने दिनों बाद हुए इस मुलाक़ात का सुक्रिया करते हैं। रेवा और मंजरी बातों - बातों में अपने बीते जीवन को कैसे ना याद करते। जहाँ ऋचा ने अपनी गृहस्थी शुरू करने से पहले अपनी माँ का आने वाला समय संवार कर संतुष्ट होकर कर पायेगी।
रेवा अपने अधूरे रिश्ते के बारे में सोचने लगती है। आखिर क्यों राहुल ने आत्महत्या करने से पहले रेवा के बारे में नहीं सोचा... क्यों नहीं उसे ख्याल आया की उसके बिना, उसके प्यार और उसके साथ के बिना उसकी रेवा कैसे जियेगी... कैसे आगे बढ़ेगी अपने पहले प्यार को भुलाकर या किसी और का हांथ थामकर? उसकी वो बातें, उसका दिया बेसुमार चाहतों का ज़ेवर तोड़कर कैसे किसी और की उम्मीदों का वरमाला पहनेगी उसकी रेवा.. आखिर क्यों नहीं विचार किया उसने इतना बड़ा कदम उठाने से पहले एक बार भी। मैं तो हर हाल में, हर परिस्थिति में उसका और सिर्फ उसका साथ चाहती थी। ना बहुत महंगे सपने थे मेरे ना बहुत सारी तमन्नाओं का बोझ डाला उसपर फिर भी वो इतना स्वार्थी था की मुझे घुटने को छोड़ गया इस संसार में। मैं कामयाब होकर भी इस जीवन के सफर में उसकी कमी के साथ जी रही हूँ। प्यार क्यों इतना आजमाता है।।
तभी ऋचा ने रेवा के मुंह में केक का टुकड़ा खिलाते हुए कहा " अपने राहुल के बारे में सोच रही हो ना रेवा.. देखो उसने वाकई बहुत गलत उठाया आत्महत्या करने का। जीवन में एक रास्ता बंद होता है तो दूसरी उम्मीद की किरण जरूर आती है। लेकिन उसने बाकि सबकुछ को नकार दिया और चुनौतियों से लड़ने की जगह इस दुनियाँ को अलविदा कह गया। वो कमजोर था रेवा जिसने ना अपने परिवार की परवाह की ना तुम्हारे प्यार की कद्र की। उसने आसान रास्ता चुना जिंदगी की मुश्किलों को पीठ दिखा कर। तुम तो उसके दिए मोहब्बत के साथ जी सकती हो, उसकी इस गलती को माफ कर सकती हो रेवा मगर, कभी तुमने सोचा की उसे अपने इस फैसले का कितना प्राश्चित करना होगा मरने के बाद भी। दुनियाँ से दूर जाने के बाद भी और अपने शरीर को त्यागने के बाद भी। जानती हो रेवा अगर आज उसे एक मौका मिलता अपनी गलती को सुधरने का या उसे बदलने का तो वो जरूर तुम्हारे पास लौट कर आता। तुम्हारे हर सपने को पूरा करने के लिए। तुम्हारे साथ जीवन बिताने के लिए। तुम मानो या ना मानो वो तुम्हें इस तरह अपनी यादों में घुटता और रोता बिलखता देख कर बहुत पछताता होगा। खुदसे बेहद नाराज़ रहता होगा। इसलिए तुम उसके इस दर्द को हमेशा के लिए मिटा सकती हो अपने जीवन के इस खालीपन को भरकर। तुम्हारा क्या दोष था जो तुम इसे पूरी जिंदगी अकेले सहन करने के लिए तैयार बैठी हो रेवा। अपने लिए ही नहीं अपनों के लिए भी सोचना अब तुम्हारी जिम्मेदारी बन गई है। क्या जो चला गया सिर्फ अपने बारे में सोच कर तुम भी उसकी तरह बनना चाहती हो रेवा.. क्या तुम अपनों के साथ वही नहीं कर रही खुदको दुःखी रखकर जो उसने किया। नहीं रेवा ऐसा मत करो अपनी अनमोल जिंदगी के साथ तुम भी। वो जाकर भी तुम्हें उतना अकेला नहीं कर सकता जितना तुमने अकेले रहने का फैसला लेकर अपने और अपनी खुशियों के साथ - साथ अपने परिवार के उन अरमानों को पीछे छोड़ कर कर रही हो। मेरी इन बातों पर जरूर गौर करना ये मेरी विनती है तुमसे रेवा।
रेवा को ऋचा की बातों ने एक नई दिशा दी। नए विचार और नया नज़रिया दिया। जाने वाले के साथ जब ये जिंदगी नहीं रूकती, इसकी चुनौतियाँ नहीं रूकती, सांसों का आना - जाना नहीं रुकता फिर अहसासों को मृत क्यों बनाकर बैठ जाते हैं हम। उसका जाना उसके हांथ में था लेकिन उसे हमेशा के लिए पछतावे से दूर कर उसे माफ कर उसे नया मुकाम देना तो हमारे हांथ में होता है।
ऋचा की बातों का मंजरी ने भी सही ठहराया। क्यूँकि, मंजरी ने अपने शहीद पति का सपना बहुत ख़ुशी से अपनाया था। उसे देश सेवा के अलावा और कोई तमन्ना अभी नहीं थी। वो अपने पति के बताये रास्तों पर पुरे समर्पित भाव से चल रही थी।
ऐसी बातें चल ही रही थी की बगल की टेबल से एक लड़की की रोने की आवाज़ आती है। मुझे जाने दो अपने घर प्लीज। मेरे माता - पिता मेरा इंतजार कर रहे होंगे। मैं सिर्फ तुमसे यहाँ यही कहने आयी थी की, मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकती अपना घर छोड़ कर। अपने घरवालों की बेइज्जती करा कर। अगर तुम सामने से आकर मेरा हांथ नहीं मांग सकते मेरे पिता से फिर मैं क्यों तुम्हारे साथ भागूँ बताओ। तुम जो हो जैसे हो जब मैंने अपना लिया तो मेरे घरवाले भी अपना लेंगे। थोड़ी हिम्मत तो जुटाओ। लड़का कहता है " नहीं मेरे पास कोई नौकरी नहीं है और तुम्हारे बाप की तरह मेरे पास दौलत नहीं है इसलिए वो नहीं चढ़ने देंगे तुम्हारी दहलीज़ पर मुझे कभी। तुम्हे चुनना होगा मुझे या अपना मायका। बोलो अभी। लड़की बोली " बिना मिले मेरे घरवालों के बारे में जब तुम्हारे ये विचार हैं तो मैं नहीं समझती तुम पर यकीन करूँ और तुम्हारे साथ मेरा कोई अच्छा भविष्य हो सकता है। इसलिए मेरा जवाब अब सिर्फ ना है। चले जाओ यहाँ से, मेरी जिंदगी से हमेशा - हमेशा के लिए। लड़का गुस्से में आ जाता है और कैसे मेरे साथ नहीं चलोगी कहकर उसे जबरजस्ती खींचने लगता है।
यह सब देखकर मंजरी उठती है और टेबल पर रखे बटर नाइफ को उठाकर उस लड़के के पास जाकर कहती है। अगर दुबारा तुमने ऐसी हरकत की तो अंजाम सोच लेना। बटर नाइफ वो लड़की मंजरी के हांथ से लेकर उस लड़के को यही बात कहती है। और बोलती है मुझे कमजोर समझ कर आगे कभी मुझे धमकाने मत आना। वरना और भी तरीके हैं तुम जैसे जिद्दी से निपटने का। वो लड़का लड़की को हावी होता देख बड़बड़ाते हुए रेस्टोरेंट से निकल जाता है। मंजरी और रेवा के साथ ऋचा और बाकि रेस्टोरेंट वाले भी उस लड़की के लिए तालियां बजाते हैं।
इसी बीच एक लड़की खड़ी होती है और अपने साथ आये लड़के को एक जोरदार थप्पड़ मारती है और बोलती है आज एक बात इन तीनों दोस्तों की बातें सुनकर और जिसने अभी उस लड़के को अपनी जिंदगी से बाहर निकला उससे यही सीखा यही मैंने की, प्यार के लिए कभी गिड़गिड़ाना नहीं चाहिए, कभी सामने वाले के सामने बिखरना नहीं चाहिए। प्यार हर किसी की किस्मत में इसलिए नहीं होता क्यूँकि, हर कोई इसके लायक नहीं होते हैं। और हर ऐरे गैरे को प्यार मिल जाये तो प्यार की तोहिन होंगी। प्यार की इबादत में कमी आ जाएगी। यह कहकर वो लड़की ऋचा, रेवा और मंजरी का सुक्रिया अदा कर चली जाती है।
आगे भी जीवन में सबका साथ देने का वादा कर के अपने - अपने रास्ते चली जातीं हैं।

